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बौखलायी कांग्रेस का सच : विलासराव देशमुख और अहमद पटेल का पैसा भी स्विस बैंक में!

आखिर हो क्या गया है कांग्रेस को? वह असंयमित व असहज क्यों है? उनके नेता आपा खोते नजर क्यों आ रहे हैं?  क्या जाने-अनजाने किसी ने उसकी कमजोर नस पकड़ ली है? और अगर ऐसा है तो फिर क्यों नहीं वह खुद को उससे छुड़ा पा रही है? क्या किसी अनहोनी का डर है?  ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिसका जवाब फिलहाल न तो आपके पास है और न ही मेरे पास। हां, इससे जुडे कुछ क्लू जरूर हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि उन्हें आपस में जोडकर आप कहां तक पहुंच पाते हैं?   इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस बौखलायी है उसे बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। चाहे वह आजादी के बाद जनता की आवाज दबाने के लिए इमरजेंसी लगाने का मामला हो या फिर बोफोर्स घोटाले के उजागर होने के बाद की स्थिति। इन दोनों मामलों में उसने पावर दिखाने की कोशिश की और दोनों दफा पावरलेस (सत्ताच्युत) होना पड़ा।

आखिर हो क्या गया है कांग्रेस को? वह असंयमित व असहज क्यों है? उनके नेता आपा खोते नजर क्यों आ रहे हैं?  क्या जाने-अनजाने किसी ने उसकी कमजोर नस पकड़ ली है? और अगर ऐसा है तो फिर क्यों नहीं वह खुद को उससे छुड़ा पा रही है? क्या किसी अनहोनी का डर है?  ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिसका जवाब फिलहाल न तो आपके पास है और न ही मेरे पास। हां, इससे जुडे कुछ क्लू जरूर हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि उन्हें आपस में जोडकर आप कहां तक पहुंच पाते हैं?   इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस बौखलायी है उसे बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। चाहे वह आजादी के बाद जनता की आवाज दबाने के लिए इमरजेंसी लगाने का मामला हो या फिर बोफोर्स घोटाले के उजागर होने के बाद की स्थिति। इन दोनों मामलों में उसने पावर दिखाने की कोशिश की और दोनों दफा पावरलेस (सत्ताच्युत) होना पड़ा।

इमरजेंसी वाले मामले को तो कांग्रेस खुद सबसे बड़ी भूल मान रही है जबकि बोफोर्स मामले पर लीपापोती करती रही है। कांग्रेस इसे स्वीकार करने से बचती रही है। बचे भी क्यों नहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी पर कमीशन खाने के सीधे-सीधे आरोप जो लगे थे। इसके पक्ष में कई सबूत भी पेश किये गये थे। हालांकि मौजूदा कांग्रेस तो इससे भी बदतर स्थिति से गुजर रही है। कांग्रेस की राजीव सरकार को तो केवल बोफोर्स कांड लेकर डूब गयी थी जबकि अभी की सरकार पर तो बोफोर्स से काफी बडे़-बडे़ मामले (भ्रष्टाचार) 2जी स्पेक्ट्रम (1 लाख 76 हजार करोड़) , कामनवेल्थ गेम्स (17,600 करोड़), विदेशों में जमा काला धन (70 लाख करोड़) हैं। इन मामलों में कांग्रेस व उनके सहयोगी दलों के कई नेता सलाखों के पीछे जा चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उनके सिपहसलारों का नाम भी आ रहा है। काला धन जमा कराने वालों में केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल का भी नाम आया है। स्विस बैंकों में पैसा जमा करने वाले माफिया हसन अली से इनके गहरे रिश्ते के बारे में भी पता चला है।

आइये इन संबंधों को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं। एक रिपोर्ट की मानें तो स्विट्‌जरलैंड में भारतीयों का 70 लाख करोड़ रुपया पड़ा हुआ है। यह वहां सालों से पड़ा है। स्विट्जरलैंड के एक अख़बार इलस्ट्रेटेड ने तो दुनिया के 14 बड़े लोगों का ज़िक्र उनकी तस्वीरों के साथ बहुत पहले ही कर दिया था। इनमें हिंदुस्तान के एक व्यक्ति का भी नाम है। आप जानना चाहेंगे नाम। वह हिंदुस्तानी हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। उनकी तस्वीर के बाजू में कई मिलियन डॉलर लिखे हुए थे। कहा तो यहां तक जा रहा है कि यह हाईलेवल गोरखधंधा इतना फला-फूला कि इन विदेशी बैंकों को अपने यहां ही बुला लिया। पहले चोरी करके (काला धन) स्विट्‌ज़रलैंड भेजते थे, अब इन बैंकों को भारत ही बुला लिया गया। 2005 में स्विट्‌ज़रलैंड के चार बैंक यहीं बुला लिए। स्विट्‌ज़रलैंड ले जाने में जो दिक्क़त 97 होती थी उसका भी निदान हो गया। लेकिन स्विट्‌ज़रलैंड के साथ-साथ आठ बैंक इटली के लाए गये।

सवाल उठता है कि इटली के आठ बैंक भारत में क्या कर रहे हैं? कहा जा रहा है कि ये इटली के वे बैंक हैं, जो घाटे में चल रहे हैं और जिन्हें वहां का मा़फिया चला रहा है। हसन अली के मामले में पिछले दिनों जो कुछ हुआ आप इससे वाकिफ होंगे ही। सब कुछ साफ हो जाने के बाद भी राजनीतिक रिश्ते की वजह से वह छुट्टे सांड की तरह घूम रहा था। उसकी गिरफ्तारी तक का साहस नहीं जुटाया जा पा रहा था। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद ही केंद्र सरकार हरकत में आयी। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार से पूछा कि हसन अली के ख़िला़फ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। हालांकि अब फिर वह रिहा कर दिया गया है क्योंकि जांच एजेंसी उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकी। समझ में नहीं आता कि इतना सब कुछ होने के बाद भी आखिर कैसे सबूत जुटाया नहीं जा सका। इस आधार पर तो जांच एजेंसी की कार्य क्षमता पर ही सवाल उठता है लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि यहां यह जुमला फिट बैठता है कि मुंसिफ ही कातिल तो डर काहे का। आप समझदार हैं, समझ गये होंगे।

चलिए कुछ और खंगालते हैं। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के पास क्या कुछ नहीं है। उसने पुणे में हसन अली के यहां छापा मारा था। छापे में एक लैपटॉप पकड़ा गया था जिसमें सत्रह नाम थे। एक नाम पढ़ा जा सकता था अदनान खशोगी का, बाक़ी सोलह नाम कोडेड थे, समझ नहीं आ रहे थे। आईटी अ़फसर थक गए। उन्होंने हाथ खडे़ कर दिये। स्विट्‌जरलैंड को चिट्ठी लिखी गयी कि इनके नाम बता दीजिए। उनकी तरफ से जवाब आया कि हम ये नाम आपको देने के लिए तैयार हैं, अगर आपके वित्तमंत्री हमें चिट्ठी लिखें। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने वित्तमंत्री चिदंबरम से संपर्क किया और उनहोंने तत्काल पत्र लिख भी दिया। उनके पास सत्रह आदमियों की लिस्ट आ गयी लेकिन उस लिस्ट को देखने के बाद मानों उन्हें सांप सूंघ लिया हो। आनाकानी करने लगे क्योंकि उसमें तीन राजनेताओं के भी नाम थे। एक विलासराव देशमुख का नाम था, जो कैबिनेट मंत्री है। उसके बाद घोड़े के व्यवसायी हसन अली का नाम आया,  जिसके खाते में 100 लाख करोड़ रुपया जमा था। तीसरा नाम अहमद पटेल का है। जी हां, सोनिया जी के राजनीतिक सलाहकार। विलासराव देशमुख के साथ हसन अली से मिलने पहले वह जाया करते थे। बॉम्बे पुलिस के पास उन तीनों राजनेताओं की वीडियो फुटेज है, जो रात को पुणे में मिलते थे। अब आप हसन अली से सोनिया गांधी तक इन क्लू के जरिये कैसे पहुंचते हो यह आप पर निर्भर करता है।

लीजिए एक और क्लू देते हैं और समझ-बूझकर आपस में इसे जोडिए। क्वात्रोची का नाम तो आपको याद होगा। किस तरह उन्होंने बोफोर्स मामले में देश को चूना लगाया। यह भी जानते होंगे ही कि उनके सोनिया जी से क्या संबंध थे। हालांकि उस समय इसको लेकर खूब बावेला मचा पर क्वात्रोची लापता हो गये। लेकिन यह जानकर आपको आश्‍चर्य होगा कि क्वात्रोची का बेटा तब भी सक्रिय रहा। उसके बेटे को 2005 में अंडमान निकोबार में तेल की खुदाई का ठेका तक मिला। इटली की कंपनी ईएनआई इंडिया लिमिटेड के नाम से खोला गया। उसके बेटे का दफ्तर मेरिडियन होटल के अंदर आज भी है। अब अगली किश्त का इंतजार करें। तब तक जुट जाइये इसे आपस में जोड़ने के लिए।

लेखक कुमार समीर पिछले दो दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्‍थानों के हिस्‍सा रह चुके हैं.

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