: अन्ना और सरकार के बढते द्वंद्व : अन्ना हजारे ने अपने हालिया बयान से जहां कांग्र्रेस को थोड़ा परेशान किया है, वहीं अनेक ऐसे लोगों को जो अन्ना के आंदोलन को पार्टी और सत्ता के सियासी जोड़तोड़ से अलग समाज में व्यापक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का वाहक समझते थे, उन्हें निराशा हुई है. अन्ना ने कहा है कि यदि जनलोकपाल विधेयक संसद के शीत सत्र में पारित नहीं हुआ तो वो अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का विरोध करेंगे. उनका मानना है कि चूंकि कांग्रेस पार्टी केंद्र की यूपीए सरकार की सबसे प्रभावी घटक है, इसलिए जनलोकपाल कानून के अमल में न आ पाने की जिम्मेदारी भी उसी पर है.
संभव है कि अन्ना की यह सोच सही हो. आखिर पिछले 42 साल में ज्यादातर कांग्रेस के साथ ही अन्य अनेक सरकारें भी आईं और गईं लेकिन यह कानून की शक्ल न ले पाया. हां, यह जरूर हुआ है कि अब संसद इस बाबत थोड़ी गतिशील और प्रयासरत हुई है, लेकिन अब भी लोकपाल को लेकर स्थायी समिति की कार्रवाई कितना अन्ना और आंदोलन समर्थकों को संतुष्ट कर पाती है- यह अलग बात है.
लेकिन इस सारे उहापोह के बीच अन्ना के बयान में इतिहास का दुहराव नजर आ रहा है. 1973-74 में जब जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने समाज परिवर्तन या संपूर्ण क्रांति का आंदोलन शुरू किया था तो आंदोलन किसी पार्टी या किसी एक सरकार के खिलाफ नहीं था. भ्रष्टाचार, बेकारी, महंगाई, अशिक्षा और भुखमरी जैसे मुद्दों पर युवाओं का आह्नान करता आंदोलन देखते-देखते सत्ता से टकराव के बाद महज तानाशाही बनाम लोकतंत्र में परिणित हो गया. संपूर्ण क्रांति आंदोलन की सीढियां चढे़ अनेक नौजवान बाद में मंत्री-मुख्यमंत्री बने- लेकिन समाज परिवर्तन का सपना महज आदर्श बन कर तिरोहित हो गया. दुख की बात तो ये रही कि सत्ता की कुर्सी पर बैठकर अनेक ने खुद वो सब किया जिसका उन्होंने कभी विरोध किया था. जेपी किसी एक पार्टी या पार्टियों या व्यक्ति और व्यत्तियों के विरोधी नहीं थे, लेकिन सच है कि आंदोलन मुद्दों से भटककर व्यत्तियों-पार्टियों पर केंद्रित हो गया. नतीजा हुआ कि जेपी ने भी निराशा में गांधी की तर्ज पर ही अंतिम सांसें लीं. उनकी मुहिम भी देखते-देखते ’हाईजॅक’ हो गई- पार्टियों और आंदोलन के कर्णधारों द्वारा, तथा संपूर्ण क्रांति एक टूटा सपना भर रह गया.
जेपी की तरह आज अन्ना के आंदोलन को समर्थन देते लोग सभी तबके, क्षेत्र, संप्रदाय, जाति, मजहब, धर्म के हैं. लेकिन जेपी के विपरीत अन्ना ने कोशिश की कि राजनीतिक लोगों और पार्टियों से दूरी रखी जाए. उन्होंने कपिल सिब्बल और चिदंबरम जैसे केंद्रीय मंत्रियों की तीखी आलोचना की तो साथ ही भाजपा और आरएसएस से दूर होने की घोषणा भी की. आडवाणी की रथ यात्रा को वोट बैंक और सत्ता की राजनीति भी कहा. यही संभवतः अन्ना की ताकत का मर्म भी रहा जो बिना किसी ओर झुके निस्स्वार्थ जनजागृति पर केंद्रित था, जिसके मूल में संभवतः यही भावना थी कि लोकशाही में सभी कुछ लोक द्वारा संचालित हो, न कि तंत्र और उस पर मठ बना कर बैठे चंद लोग उस लोक को संचालित करें- जिसके कि नाम पर संविधान है और जो सर्वोच्च शक्ति है. उसे उसकी सर्वोच्चता का अहसास गांधी और जेपी की तरह अन्ना ने भी कराया.
लेकिन ऐसे में फिर ऐसा बयान अन्ना द्वारा कैसे आ गया जब किसी पार्टी विशेष की मुखालिफत में चुनाव क्षेत्रों तक में जाने की बात अन्ना ने कह डाली? क्या जेपी द्वारा भी कुछ ऐसा ही तब नहीं हो गया था, जब इंदिरा विरोध और कांग्रेस पराजय की मुहिम ने न चाहते हुए भी समाज परिवर्तन की अवधारणा को ही अपदस्थ कर दिया था? क्या कांग्रेस विरोध की बात से अन्ना मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा और दूसरी अन्य पार्टियों को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा नहीं पहुंचाएंगे? माना कि केंद्र की यूपीए सरकार और कांग्रेस शासित या कांग्रेस समर्थित राज्य सरकारों में भारी भ्रष्टाचार है, लेकिन भाजपा शासित कर्नाटक की भ्रष्ट येदियुरप्पा सरकार और गुजरात में हजारों मुसलमानों के खून से नहाई सांप्रदायिक नरेंद्र मोदी सरकार को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? उत्तर प्रदेश की उस मायावती सरकार को कम भ्रष्ट कैसे कहा जा सकता है जिसने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं ही तोड दीं हों? खुद अन्ना ने क्या गुजरात में आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट के निलंबन और गिरफ्तारी को गलत नहीं माना है? तो क्या जेपी की तरह अन्ना की उंगली पकड़ कर डूबने से उतराने का प्रयास करती संघ समर्थित पार्टी की गुजरात सरकार ने अन्ना का कोई मान रखा? फिर यही पार्टी क्यों, गोवा की हालिया रिपोर्ट यही है कि वहां खदानों की बंदरबांट में भी सत्ता शीर्ष स्तर पर भारी भ्रष्टाचार हुआ है, जम्मू कश्मीर में पैसे के लेन देन को लेकर मुख्यमंत्री निवास में एक कार्यकर्ता को बुलाकर पीटे जाने और फिर उसकी अस्पताल में रहस्यमयी मौत का मामला भी देश में क्या अपने किस्म की पहली घटना नहीं है? तो ये है सत्ता का चरित्र, जिसने सभी को भ्रष्ट किया है. चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो – लेकिन चरित्र कमोबेश एक जैसा रहा है.
अन्ना को जो व्यापक समर्थन मिला, वो संकेत है कि लोग भ्रष्टाचार से निदान चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने एक गैरसियासी गांधीवादी को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी एकजुटता का प्रतीक बनाया. अन्ना ने जब पार्टियों से दूरी बरती तो उसे भी जनता का समर्थन ही मिला, क्योंकि उन्हें सत्तातंत्र और उस खेल में पारंगत पार्टियों से कोई आशा नहीं रह गई थी. तो ऐसे में क्या अन्ना को अब चुनावी परिदृश्य में किसी के भी विरोध या समर्थन में उतरना चाहिए? क्या इससे जनअभिव्यक्ति की वही पुरानी धार और साख बनी रह पाएगी? क्या यहां थोड़ा रुक कर यह मनन-चिंतन की जरूरत नहीं कि 1977 के चुनावी समर में कांग्रेस को धूल चटा कर विजयी बन कर उभरी जनता पार्टी की सरकार में हावी कलह और पदलोलुपता के बीच व्याथित जेपी के सपने कैसे और क्यों तार-तार हो गए? और क्यों आजादी के बाद बापू ने स्वातंत्रय संघर्ष की प्रतीक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उदार-परोपकारी संस्था- ‘लोक सेवा संघ’ में परिणित करने की इच्छा जताई थी? दरअसल गांधी मानते थे कि कांग्रेस परिवर्तन का औजार है, सत्ता के लिए नहीं है. आजादी के बाद वह कांग्रेस को भारत में गुणात्मक परिवर्तन का माध्यम बनाना चाहते थे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. ऐसे में क्या इतिहास ये सबक नहीं देता कि पार्टियों और व्यक्तियों का समर्थन-विरोध प्रायः हमें आदर्शों और मुद्दों से भटकाता रहा है?
ये तो रही आंदोलन और आदर्शों की बात, लेकिन इतिहास सत्ता तंत्र का भी लेखा-जोखा रहा है. क्या सिर्फ कुशल चतुराई से किसी भी तंत्र को दीर्घकालिक बनाया जा सकता है और वो भी जन भावनाओं की अनदेखी करके? जनता के मूल सवाल जब उसे जागृत और एकजुट करने लगें तो क्या महज तंत्र की तकनीकी बारिकियों में लगने वाले समय के ’टालू’ मरहम से उसके नासूर बनते घाव को ठीक किया जा सकता है? निश्चित रूप से आज केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के स्तर पर भ्रष्टाचार और जनता को व्यथित करते मुद्दों पर समग्रता में विचार की जरूरत है. लोग अब मुद्दों को टालने और लंबे समय तक लटकाने कि प्रवृत्ति से ऊब चुके हैं. जनाक्रोश को बार-बार उकसाने या भड़काने से भी बाज आना चाहिए. लेकिन यह भी समझा जाना चाहिए कि गांधी ने आखिर क्यों कांग्रेस को सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव से जोड़ने की बात कही थी. दरअसल, अन्ना जिस धरातल पर परिवर्तन का आह्नान कर रहे हैं- वो व्यक्ति और समाज के आंतरिक और बाहरी बदलाव की दीर्घकालिक प्रक्रिया है. यह वही प्रक्रिया है जिससे गांधी आजादी के बाद कांग्रेस को जोड़ना चाहते थे और जिस संदर्भ में जेपी संपूर्ण क्रांति का स्वप्न देखते थे. लेकिन ये सब तभी सार्थक हो सकता है जब अतीत के इन उतार-चढ़ावों को याद ही न रखा जाए, उनसे सबक लेने की कोशिश भी की जाए.
और अंत में –
इंतिहा से न डर, चिराग जला
रौशनी की है इब्तिदा सब कुछ.
लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

