
प्रमोद कुमार पांडेय
बडे़-बडे़ मीडिया घरानों के पत्रों एवं खबरिया चैनलों में पैसा दे दो खबर ले लो, खबर दो पइसा लो की पुरजोर चलन के खिलाफ वे लगातार लिख और बोल रहे थे। तभी तो ‘विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला हिन्दी दैनिक’ ने उनकी मृत्यु की खबर को दो-चार लाईन में देकर बदला चुकाया। कितना विश्वास है अपने पूंजी बाजार पर सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक का कि वह प्रभाष जोशी को सिर्फ दो तीन लाइन में निबटाकर पेड न्यूज के खिलाफ उनकी मुहिम का वह बदला लेता है। प्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक बाजपेयी के शब्दों में ‘प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे। पत्रकारिता और जीवन में नैतिकता और पारदर्शिता के मुखर प्रभाव समर्थक प्रभाष जी अपनी गांधीवादी सोच और निर्भयता के कारण ही खबर के धन्धे के खिलाफ प्रेस परिषद से लेकर जनता के बीच पत्रकारिता बचाने की मुहिम में लगे थे। उनकी चिन्ता के केन्द्र में था पत्रकारिता के वह मूल्य जो किसी भी प्रकार के शोषण, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की ओर से जुझता है।’
1983 में जनसत्ता के संस्थापक-सम्पादक के रुप में उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में भाषा और प्रस्तुति के नये संस्कार दिये। जनसत्ता के सुनहरे पृष्ठों पर प्रभाष जी के किये-धरे की छाप है। अंग्रेजी पत्रकारिता में सत्ता के विरूद्ध प्रतिरोध की जो अलख ‘इडियन एक्सप्रेस’ ने जगाई वही हिन्दी में जनसत्ता ने। प्रभाष जी इंडियन एक्सप्रेस के भी अहमदाबाद, चण्डीगढ, दिल्ली संस्करण के स्थानीय सम्पादक रहे। उनकी बेबाकी, निडरता और भाषा की शैली हर किसी को अपनी ओर खींचती है। ‘नई दुनिया’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले प्रभाष जी की भाषा मालवा की धरती से सिंचित थी। तभी तो वह जो कुछ लिखते थे उसमें जीवन की आहट थी। भूदान आन्दोलन से गहरे जुड़े प्रभाष जी जो कुछ लिखे साहस और बेबाकी से लिखें । सत्ता से टकराने का और जनता की ओर से सवाल करने का उनके पास साहस था। क्रिकेट प्रेम, सचिन तेंदुलकर प्रेम, सती-प्रथा, ब्राह्मणवाद आदि के मुद्दे पर काफी सवाल किये गये। साहित्य-पत्रकारिता के दिग्गजों एवं तेजस्वी पत्रकारों ने उन पर जोरदार बौद्धिक हमले किए। लेकिन प्रभाष जी कभी सुरक्षात्मक नही हुए और ना कभी डिगे। वे हमलों का जवाब ‘डिफेंसिव‘ होकर नहीं बल्कि तर्को एवं विचारों से देते थे। यह भी सच है कि हिन्दी पत्रकारिता को उन्होंने जनसता के माध्यम से कई तेजस्वी युवा पत्रकार दिये।
प्रभाष जी की परम्परा यह नहीं है कि उन्हें देवता बनाकर पूजा जाये। उनकी परम्परा सवाल करने की परम्परा थी। वे जीवन में घनघोर आस्तिक होने के बावजूद पत्रकारिता एवं बौद्धिकता की दुनिया में किसी को देवता बनाने के विरोधी थे, ‘हिन्दू होने का धर्म’ उनकी महत्वपूर्ण चिन्तन पुस्तक है जिसमें हिन्दू धर्म के मूल पक्षों को एवं इसकी गहराई को अभिव्यक्त किया गया है। ‘हद से अनहद गये’ प्रभाष जोशी स्मृति संचयन उन पर केन्द्रित है। जनसत्ता के रविवार अंक में उनके स्तम्भ ‘कागद कारे’ को खोज-खोज कर पढ़ा जाता था। ‘कागद कारे’ में देश-विदेश समाज के विविध पक्षों पर लिखा गया उनका आलेख काफी पढ़ा जाता था। राजेन्द्र यादव जैसा लिक्खाड़ साहित्कार भले ही प्रभाष जी के विचारों से सहमत न हो लेकिन उनके लिखे को नियमित पढ़ता था। साहित्य, कला संस्कृति सभी क्षेत्रों में प्रभाष जी का विशेष प्रभाव था। वे बहुत बड़े आलोचक थे। वे सत्ता शीर्ष पर आसीन शख्सियत की आंख में आंख डालकर बात करने वाले, लिखने वाले और बोलने बतियाने वाले पत्रकार थे। खबरों को जानने की उनमें एक अजीब सी भूख थी।अपने रिपोर्टर को तरासने वाले वे एक ऐसे सम्पादक थे जो खबर ही नहीं पूरे संदर्भ का नब्ज पकड़ना चाहते हैं। वह अपने रिपोर्टरों को खोजबीन के लिये दौड़ाते रहते थे। लेखनी ही नहीं उनके सोच में भी बड़ी गहराई थी। आज के डेढ़ दशक पहले वे दलित, नक्सली जैसे मुददों पर, व्यवस्था परिर्वतन पर रिर्पोटरों से मेनहत कराते थे। पुण्य प्रसून वाजपेयी को उन्होंने 15 साल पहले नागपुर में संघ, दलित, नक्सल को लेकर व्यवस्था परिवर्तन सम्बंधी काम भी दिया था। इस तरह वे अपने युवा दोस्तों से ठोक-बजा कर काम करवाते थे।
बाजारवाद के सच को बयां करने का उनका तरीका काफी सुचिंतित था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोंष्ठी में उनको बाजारवाद पर सुनने को मौका मिला था। ‘तीसरी दुनिया के देशों में ज्ञान एवं संस्कृति के समक्ष चुनौतियां’ विषयक संगोष्ठी में प्रभाष जी ने बाजारवाद के कई सवालों एवं संदर्भो को रोचक तरीके से रखा। प्रभाष जी ने कहा था कि बाजार की संस्कृति हमें मिल बैठकर रहने और किसी भी चीज की सामूहिक उपभोग से मना करती है। यह संस्कृति नहीं चाहती कि हम मिलजुल कर, आपस में बांट कर रहें, खायें क्योंकि इससे उनका सामान नहीं खपेगा। इस बाजार तंत्र में संबंधों की पवित्रता में भीतर देखने की मनाही है क्योंकि उनके यहां इसका का भी बाजार मूल्य है। ऐसे में संबंधो की पवित्रता को मानने के बजाएं पैसे आंकने का आग्रह बढ़ा है ब्रह्म की जगह पूंजी ने ले ली है और मोक्ष की जगह मुनाफे ने। उनका यह भी माना था कि आज के सिनेमाई और खेल जगत के रोल मॉडल जब ठण्डा मतलब कोका कोला और हर घर में कोला का गुणगान करते है और यह बच्चों में संदेश देते है कि हमेशा घर में ठण्डा रखो पता नहीं ब्रह्म की तरह कब महानायक घर में प्रकट हों जाएं। प्रभाष जी की जयंती पर उन्हें याद करने का अर्थ है कि उनकी निर्भरता, जनपक्षधरता और सरोकारों को जिन्दा रखा जाये। खबर लेना भी पत्रकारिता का काम है। यही तो उन्होंने सिखाया।
लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

