लादेन का मारा जाना, न्‍याय नहीं है यह!

प्रमोद पांडेय…नहीं। यह न्याय नहीं है। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने मात्र से आतंक या आतंकवाद का अंत हो गया यह सोचना जल्दबाजी होगी। ओसामा का मारा जाना किसी कथा का अंत नहीं, शुरुआत है। 11 सितम्बर, 2001 (9/11) को न्यूयॉर्क के जिन टावरों को गिराकर अलकायदा ने दुनियाभर में दहशत पैदा कर दी, वहां 01  मई की रात लादेन के मारे जाने से टावरों के स्थान पर बने जीरो ग्राउंड पर लोग जश्न में डूब गए। लादेन अमेरिका की मोस्ट वांटेड सूची में सबसे ऊपर था। इसीलिए अमरीकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने इसे एक उपलब्धि बताया है-‘अल कायदा के खिलाफ कार्रवाई में यह अमेरिका की सबसे बड़ी उपलब्धि है। …न्याय मिल चुका है।’

वैजयंती माला ने रचा भारतीय सिनेमा में इतिहास

प्रमोदभारतीय सिनेमा में वैजयंती माला नया इतिहास लेकर आती हैं। दक्षिण भारत का नमकीन पानी रग-रग में समाये वैजयंती माला नृत्य में थिरकते हुए पांव बंबई सिनेमा जगत में हौले-हौले रखती हैं और सिने-जगत उनके घुंघरुओं की आवाज से खनक उठता है। धीरे-धीरे यह खनक दर्शकों के बीच पहुंच जाती है। और दर्शक शास्त्रीय-नृत्य के मोहपाश में बंध-से जाते हैं। हमारे सामने और ख्‍वाबों में एक अकेला घुंघरू खनक उठता है। एक जोड़ी आँखों का नृत्यभरा अभिनय और दो थिरकते कदम हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करने लगते हैं। यह नई ऊर्जा हमारा रोम-रोम कंपा देती है और हम नृत्य संग झूम उठते हैं। सिनेमा को लय-ताल संग पिरोकर चमकती आंखों से देखने लगते हैं। वैजयंतीमाला के नृत्य में सधे हुए पांव नई बानगी लिखते हैं। उनके नृत्य को ध्यान में रखकर स्क्रिप्‍ट लिखे जाने लगे और हम फिल्मों संग झूमने के आदी हो गए। इस तरह वैजयंती माला एक नई परंपरा रच डालती हैं।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी ट्रेजडी किंग

प्रमोद सच! उनकी उड़ती हुई रेशमी जुल्फें देख कुंवारियों का दिल मचल जाता होगा। उनके अंदाज और अभिनय का कायल हर युवक देवदास और हर बाला पारो बन प्रेम रस में डूब जाना चाहती होगी। उनकी कहानियां, सिनेमाई अफसाने दुहराये गये। साधारण सी उनकी छवि में भारतीय जन-मानस झांक उठता। दर्शक गण बार-बार उनकी फिल्में देखते। फिल्मी अभिनेता उनके ही रंग-ढंग में ढल जाना चाहते। उनकी मोर चाल में चलना चाहते, नाचना चाहते। क्या पुराणों, महापुराणों, दंतकथाओं-लोककथाओं के नायक भी ऐसे ही होते होंगे? इतने ही आकर्षक, चित्तचोर, परिपक्व!! शायद नहीं, भला कौन सा साधारण नायक बहुआयामी अभिनय रचता होगा? कभी राजकुमार, कभी किसान, कभी जोकर तो कभी प्रेमी बन जाता होगा? ऐसा तो दिलीप कुमार जैसी अद्भुत क्षमता वाले अभिनेता ही कर सकते हैं। चंचलता, शोखी, खिलंदड़पने से भरपूर गंभीर और सशक्त अभिनय को जीते, कला को जीते- सच्चे अभिनेता, सच्चे कलाकार। अमिताभ बच्चन जहां दिलीप कुमार को प्रेरणा मानते हैं, उनके अभिनय को उतारते है वहीं भारत की आवाज लता मंगेशकर भी दिलीप साहब की पैर छूती हैं।

‘काबुलीवाला’ पर दिल कुर्बान

प्रमोद बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, ‘काबुलीवाला।’ तब काबुलीवाला किताब के पन्नों से निकलकर हमारे नन्हें मन पर छा गया था। अपनी नन्ही बच्ची को याद करता काबुलीवाला। उसकी धुंधली छवि जो हमने मन ही मन रची थी फिल्म ‘काबुलीवाला’ को देखकर साकार हो उठी। हाँ ऐसा ही रहा होगा दूर देश से आया वह आदमी! बलराज साहनी ऐसे ही अभिनेता थे, हर तरह के रोल के सांचे में फिट बैठने वाले। साम्यवादी विचारधारा के पक्के समर्थक, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को कई सशक्त रोल देकर गरिमा प्रदान की। बलराज साहनी सही अर्थों में जनमानस के अभिनेता थे। एक साधारण भारतीय और आम आदमी उनके दिल में बैठा था जो अभिनेता बनकर उनकी फिल्मों में उतर जाता। बलराज साहनी हिंदी सिनेमा के गरीब और आम आदमी थे। रिक्शा चालक थे, मजदूर थे। ‘दो बीघा जमीन’ में काम करने वाले शंभु महतो थे। बलराज साहनी एक लेखक थे, पत्रकार थे, रेडियो उद्घोषक थे, निर्देशक थे।

आवाज की फिल्‍मी दुनिया और बीएन का जादू

प्रमोद पांडेय सिनेमा पर्दे पर यथार्थ का मंचन है। फिल्मी पर्दे पर उभरती आवाजें हमारी अपनी ही आवाजें होती हैं। हमारे संवाद कला बनकर कलाकारों की भाषा बन जाते हैं। फिल्में हमारी बातों को औरों तक पहुँचाती हैं, औरों की बातों को हम तक पहुँचाती हैं। बातों ही बातों में हम दुनियाभर की बातें जान जाते हैं। दुनियाभर की बातें और आवाजें हमारे अंदर संवेदना का संचार करती हैं। सिनेमा की आवाजें यथार्थ का भ्रम कराती हैं। कभी-कभी सिनेमाई ध्वनियां सच से भी अधिक प्रबल हो जाती हैं। इस प्रबलता में हम बिंध से जाते हैं। ढिशूम-ढिशूम की आवाज सुन दर्शक उतावले हो जाते हैं। अपनी-अपनी सीटों से खड़े हो जाते हैं। शहनाई की आवाज आँखों में आँसू दे जाती है। दहशत भरी डरावनी आवाजें भूतों का अहसास दिला हमें कंपा जाती हैं। फिल्मों में हम सब सुन सकते हैं- सांय-सांय करती तेज हवा, नदी का कलरव, चिडिय़ों की चह-चह और पायल की मधुर मद्धिम छमकती ध्वनि। सच! फिल्मी कलाकारों और दृश्यों की सुरीली, रोबिली, सुंदर, छमकती, खनकती, गीत गातीं, रोती और हँसती ध्वनियां हमें यथार्थ और यथार्थ से भी परे ले जाती हैं। साउंड रिकॉर्डिस्ट ऐसा ही जादू करते हैं। उनके करिश्मे से हम बूटों की खटखट, थप्पड़ की झन्नाहट और कान-बालियों के घुंघरुओं की मद्धिम खनक तक सुन सकते हैं.

सिनेमा के पहले शहंशाह थे पृथ्‍वीराज

प्रमोद वह भारत में सिनेमा के पुनर्जन्म का युग था। भारतीय सिनेमा नये रंग-रूप में अवतार ले रहा था। अब फिल्में बोलने लगी थीं। दर्शक कलाकारों की आवाजें सुन सकते थे। उन आवाजों में अपनी चेतना में छाये पात्रों को सुन सकते थे। अब तक मूक अभिनय करते कलाकारों का बोलना सचमुच सुखद था। दर्शक विस्मित थे। भाव-विभोर हो नये कलेवर में बोलती फिल्मों के संवाद सुन सकते थे। उन संवादों को दोहरा सकते थे। अभिनेताओं की आवाजों का अभिनय अपनी भाषा में कर सकते थे। इन फिल्मों का भारतीय परिदृश्य में आगमन किसी रहस्य की तरह था। कला के किसी रूप या जनसंचार के किसी माध्यम ने इतने कम समय में इतनी बड़ी क्रांति नहीं की थी। इन फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को नया आयाम दिया। पृथ्वीराज कपूर ऐसे ही संवेदनशील समय के सशक्त अभिनेता थे। उन्होंने पहली ‘टॉकी’ फिल्म ‘आलम-आरा’ में अभिनय किया। सुंदर कद-काठी, आकर्षक व्यक्तित्व और रोबिली आवाज के साथ फिल्मों में छा गये। दर्शक उनके कायल हो गये।

मनोरंजन का विषय नहीं है किसान की मजबूरी

प्रमोद कुमार पांडेय: होरी और घीसू के जीवन में सवेरा अभी भी नहीं आया है : आमिर खान होम प्रोडक्शन की चर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’ में ग्रामीण जन जीवन के चित्रण की काफी चर्चा है। इस फिल्म में यथार्थ की जमीन को प्रभावी तरीके से फिल्माया गया है। सइयां के बहुत कमाने के बावजूद महंगाई द्वारा सताये जाने से लेकर किसानों की आत्महत्या तक का चित्रण किया गया है। आज खेती-किसानी, भूख-बेरोजगारी जैसे मुद्दे लगता है महज ‘वाद-विवाद प्रतियोगिता’ के विषय बन गये हों। क्योंकि पहल कहीं नजर नहीं आती और आती भी है तो राजनीतिक रणनीतियों तक ही सिमट कर रह जाती है। भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी, जो कि पत्रकार और फिल्म समीक्षक रहे हैं, उन्होंने कहा है कि पीपली लाइव में किसानों की आत्महत्या को इस तरह से चित्रित करने से बचना चाहिये था। उनका कहना है कि जिन परिवारों के लोग इस त्रासदी से गुजरे हैं, उनके लिए इस फिल्म का हंसी-ठिठोली वाला रूप कितना बेधता होगा। बात सही भी है कि यथार्थ की जमीन को मनोरंजन की चीज बनाने से बचना चाहिए। हां यह फिल्म हंसी-ठिठोली वाली परिणति से अलग हो सकती थी जब वह संवेदना उसी स्तर की होती जो वास्तविक समस्या है।

जीडीपी से कैसे भरेगा भूखे का पेट!

[caption id="attachment_2336" align="alignleft" width="71"]प्रमोद पांडेय प्रमोद[/caption]: संसद को चलाने में जो खर्च आता है वह देश का है : अमीर जनप्रतिनिधि को क्‍या मालूम क्‍या होती है गरीबी और महंगाई : लोकसभा में 60 फीसदी से ज्‍यादा है करोड़पति सांसद : खबर है कि तेज आर्थिक विकास के बलबूते हमारे देश की अर्थव्यवस्था दो हजार अरब डालर के आंकड़े को छूने को बेताब है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और वित मंत्री की उम्मीदों से हमारी बांछे खिल गई है। लेकिन आज तक तमाम प्रकार से गदगदाने, फूले समाने और फोर्ब्‍स मैगजीन के उजले पन्‍नों पर अरबपतियों के सूची में भारतीयों की लगातार बढ़त से अघाने के बावजूद सब्जी, दाल, दूध खरीदते समय हमारा अघाना हमें ही पता नहीं क्यों समझ में नहीं आता! ये जीडीपी और 9 फीसदी जैसे आंकड़ों का हमारे जीवन से कोई सम्बंध है क्या? हमारी रोजमर्रा की रोटी से इन आंकड़ों का कोई सीधा सम्बंध है ना ! संसद और रोटी की बात हो तो ‘संसद से सड़क तक’ के कवि धूमिल अक्सर याद आते हैं – ‘मुझसे कहा गया कि संसद / देश की धड़कन को /प्रतिबिम्बित करने वाला दर्पण /जनता को /जनता के विचारों का/ नैतिक समर्पण है/लेकिन क्या यह सच है? अपने यहां संसद /तेली का वह घानी है /जिसमें आधा तेल आधा पानी है।

लोकतांत्रिक जनभक्षियों की शिनाख्‍त आसान नहीं!

[caption id="attachment_2336" align="alignleft" width="71"]प्रमोद पांडेयप्रमोद[/caption]: राजनीति में भलमनसाहतों के लिए ‘नो एंट्री’ है : यह पंडित नेहरू थे। देश के पहले प्रधानमंत्री, बापू के ‘लेनिन’ और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘ऋतुराज’ तथा आधुनिक भारत के निर्माता। उन्होंने कहा था – ‘लोकतंत्र इसीलिए अच्छा है क्योंकि अन्य (शासन-पद्धति) इससे भी खराब हैं।’ हमारे जैसे लोकतंत्र में ‘लोक’ ही सर्वोच्च है और संविधान उसका संरक्षक और नियंता। विरुद्धों के सामंजस्य चरित्र को जीने वाले भारत की एकदेशीयता, एकता और आजादी के लिए न जाने कितने जाने- अनजाने महानायकों ने अपना बलिदान दिया। वे लोग आपस में वैचारिक रूप से जूझते हुए, लड़ते-झगड़ते हुए एक महान राष्ट्र के सपने को अपने दिलों में लिए हुए थे। जिसमें हर तरह की विषमता और खाई पट जाए। वे देश बनाने के लिए लड़ रहे थे। रास्ते अलग थे, विचार अलग थे, लेकिन लक्ष्य एक था, देश की आजादी और नवनिर्माण! वे सभी लोग देश और समाज-संस्कृति के लिए जीते-मरते थे।

देवता बनाकर पूजे जाने के खिलाफ थे प्रभाषजी

[caption id="attachment_2319" align="alignleft" width="88"]प्रमोद कुमार पांडेयप्रमोद कुमार पांडेय[/caption]: गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्‍ता थे : हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरूष प्रभाष जोशी एक शक्तिशाली और प्रमुख सम्पादक-पत्रकार थे। 15 जुलाई 1936 को जन्में प्रभाष जी पिछले वर्ष 5 नवंम्बर को हमारे बीच नहीं रहे। भारत आस्ट्रेलिया मैच देखने के दौरान हृदय गति रूकने से उनका निधन हो गया। 73 साल का वह नौजवान, जुझारू और सरोकारी पत्रकार हमारे बीच नहीं रहा। प्रभाष जी अचानक ही चले गए। उनका जाना हिन्दी भाषा-समाज क सभी क्षेत्र के सृजनकर्मियों के लिए आघात रहा। प्रभाषजी की अनुपस्थिति इसलिए भी काफी तकलीफ देह रही कि वे अपने आखिरी दौर में पैकेज पत्रकारिता के खिलाफ काफी मुखर थे।