हे राम
त्रेता से कलयुग तक के सफर में मूल्य बोध कितने बदल गए
और तुम एक बुत बनकर रह गए
और साथ उस बुत में कैद होकर रह गई
युग बोध की सारी सच्चाईयां
और न जाने उग आयी है कितनी लंकाए
देश के हर शहर, गांव, गली कूंचे में
तुम करो भी तो क्या!
अपनी सारी समर्थताओं के बावजूद तुम सिर्फ एक बुत हो
दरअसल तुम्हारे खिलाफ साजिश कुछ ऐसी चली
कि एक-एक कर तुम्हारे सारे आदर्शो को बुत में बदल दिया गया
वजह साफ थी वास्तविकता के धरातल पर
उन्हीं को तुमसे सबसे ज्यादा खतरा है
जो आज तुम्हारे जयकारों में बुन रहे हैं साजिशों का ताना-बाना
जिस सत्ता को छोड़ने में तुम्हें पल भर नहीं लगा
उसी को पाने के लिए तुम्हारा नाम सबसे ज्यादा उछाला जा रहा है
सच कह दूं तो तुम्हारें आदर्शो को पल-पल मारा जा रहा है!
तुम्हारी सम्पूर्ण जीवन यात्रा तो मनुष्य विरोधी नहीं
मानवता के पक्ष में खड़े होने की यात्रा थी
फिर तुम्हारे नाम पर ये कौन सी यात्राएं निकाली जा रही है
हर पल कहीं न कहीं आग लगाई जा रही है
लोग मंगल के नायक राम
इतना अमंगल होते देख ठिठक से क्यों गए हो
तुमने तो पाषाण में कैद अहिल्या को मुक्त किया था
आज तुम खुद एक बुत में कैद होकर रह गए हो
ऐसे में तुम्हे मुक्त कराने कौन आयेगा राम
हे राम!
मेरे आस पास जो एक दुनियां है और उस दुनियां में जो कुछ हो रहा है, न जाने क्यों लगता है वो ठीक नहीं है। 92 पीछे छूट चुका है, पर कहां जब-तब उसे सामने लाकर खड़ा कर दिया जाता है। मैं पूछना चाहता हूं क्यों! जाने क्यों ऐसा लगता है कि जितनी तादाद में इस मुल्क में मंदिर-मस्जिद बनती गईं, धर्म इंसान से उतना ही दूर होता गया। आखिर कब तक आदमी आदमी के हाथों घृणा, नफरत और हिसां का शिकार बनता रहेगा। कब तक…आखिर कब तक… कोई जवाब तो दे।
कवि भास्कर गुहा नियोगी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा शिव नगरी काशी के वासी हैं.

