संयोग ही कहा जायेगा कि चर्चित अयोध्या प्रकरण का फैसला और पितृ पक्ष साथ-साथ आ रहे हैं, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण हो गया है कि फैसले के बाद ऐसा कोई कुकृत्य न किया जाये, जिससे पितरों की आत्मा को किसी तरह का दु:ख पहुंचे, क्योंकि परलोक ही नहीं, इस लोक में भी सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए पितृ लोक में बैठे पितरों का आशीर्वाद बेहद जरुरी माना गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि पितरों को असंतुष्ट करने पर किसी तरह की कोई पूजा-अर्चना, लोक-परलोक में काम नहीं आती है। शास्त्रों के अनुसार अग्रजों या पूर्वजों को जीवित होने पर तो श्रद्धापूर्वक विशेष सम्मान दिया ही जाता है, लेकिन जब वह शरीर छोड़ कर चले जाते हैं, तो भी वह क्रम जारी रहता है, तभी सौर वर्ष में से एक पूरा अर्द्ध मास पितृ पक्ष के लिए आरक्षित कर दिया गया है और इस अर्द्ध मास में विशेष तौर पर पूर्वजों को खुश करने या तृप्त करने वाले कार्य किये जाते हैं।
मान्यता है कि खुश होकर पितर आशीर्वाद की वर्षा करते हैं, लेकिन आशीर्वाद की यह वर्षा पितर तब ही करते हैं, जब पूरा परिवार एकजुट रहे, परिवार में हर्ष और उल्लास का वातावरण रहे और महिलाओं का सम्मान किया जाये, तभी श्राद्ध के दौरान प्रयोग किये गये बर्तन महिलाओं के लिए धोने वर्जित हैं, क्योंकि ऐसा करने से पितृ लोक में बैठे पितर नाराज हो जाते हैं। पितर खुश होकर तभी आशीर्वाद देते हैं, जब उनके द्वारा बनाई परंपराओं, नियमों और दायित्वों का निर्वहन उनके अनुज कुशल पूर्वक करते हैं, कर्म से विपरीत कार्य करने वाले और श्राद्ध के दिन हजारों रुपये खर्च करने मात्र से पितर खुश नहीं हो सकते। संयुक्त परिवारों में जो लोग हंसी-खुशी रहते हैं या दूर रह कर भी एक-दूसरे का मान-सम्मान करते हैं, ऐसे परिवारों में की गयी पूजा-अर्चना ही पितरों द्वारा स्वीकार की जाती है, लेकिन अब देखने में ऐसा ही अधिक मिलता है कि सदस्य जवान होते ही अपना अलग आशियाना बसा लेते हैं। इतना ही नहीं, शराब और मांसाहार को भी दिनचर्या में शामिल कर लिया है, साथ ही महिलायें दुराचार का शिकार हो रही हैं, धन के लालच में उनकी बलि चढ़ाई जा रही है।
जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्रवाद के नाम पर लोग एक-दूसरे को मारने-काटने तक के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पितरों पर क्या बीत रही होगी? खैर, इन सब बातों को सामान्य बात मानते हुए लोग नजरअंदाज कर देते हैं और इस ओर ध्यान भी नहीं देना चाहते, पर इस समय चर्चित अयोध्या प्रकरण पर फैसला आने वाला है। जिस पर देश की शांति व्यवस्था टिकी हुई है। शासन-प्रशासन के साथ सद्पुरुष फैसले को लेकर बेहद चिंतित दिखाई दे रहे हैं, सभी की नजर फैसले पर टिकी हुई है, ऐसे में हर आदमी का दायित्व बनता है कि वह भी देशहित में आचरण करे। यह इसलिए भी अहम् हो गया है कि फैसला पितृ पक्ष में आने वाला है। ऐसे में वैसा ही आचरण करना चाहिए, जिससे पितृ लोक में बैठे पितर प्रसन्न हों, क्यों कि उनकी भावनाओं अथवा आत्मा को ठेस पहुंची तो पूरा जीवन ही निरर्थक होकर रह जायेगा। जीवन को सार्थक बनाये रखने के लिए देशहित और पितर हित में ही आचरण करें। शास्त्रों में कहा गया है कि विपन्नता की स्थिति में व्यक्ति अगर विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध नहीं कर पा रहा है, तो वह पितृ पक्ष में नियत दिन व समय गाय को श्रद्धा पूर्वक चारा खिला दे, जिससे पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देने से स्वयं को नहीं रोक पायेंगे।
अयोध्या प्रकरण में आने वाले फैसले को लेकर बात की जाये, तो विष्णु अवतार भगवान श्रीराम वैसे तो जीवन-मरण से ऊपर हैं, लेकिन उन्हें अगर भगवान न भी माना जाये तो भी उनके कर्मानुसार व आचरणानुसार पूर्वज तो माना ही जा सकता है। ऐसे में वह कब चाहेंगे कि उनका नाम जिस वस्तु या घटना से जुड़ा हो, उससे वैमनस्य की भावना फैले या अशांति का वातावरण उत्पन्न हो, उनके नाम का सहारा लेकर लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जायें। खास कर पितृ पक्ष की ही बात की जाये, तो उन्हें ऐसे वातावरण से बेहद कष्ट ही होगा, इसलिए अयोध्या प्रकरण पर आने वाले फैसले को लेकर लोगों को पितृ पक्ष का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि राम का आचरण अगर जीवन में नहीं उतार सकते, तो फिर अयोध्या में मंदिर बने या मस्जिद, इससे भी फर्क नहीं पडऩा चाहिए।
लेखक बीपी गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं.

