सरकार भले ही कुछ न दे पर आमजन की मुश्किलें न बढ़ाए

बीपी गौतमयूपीए सरकार-टू में भी वित्तमंत्री के रूप में पारी खेल रहे प्रणव मुखर्जी एक बार फिर 28 फरवरी को देश और देशवासियों का भाग्य लिखेंगे। हमेशा की तरह ही सरकारी-गैर सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के साथ आम आदमी भी उनकी ओर टकटकी लगाये हुए है, लेकिन इस बार भी सबसे अहम देखने की बात यही रहेगी कि वह गांव, गरीब या देश के आम नागरिक का दर्द कितना महसूस कर पाते हैं और उसकी आशाओं पर कितना खरा उतरते हैं? वैसे उन पर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कंपनियों को खुश करने का ही दबाव इस बार भी अधिक है। आम आदमी को कागजी आंकड़ेबाजी या लुभावनी बातों या दावों से अब कोई मतलब नहीं रह गया है। वह चाहता है कि बाजार उसकी पहुंच में हो। रोटी, कपड़ा, मकान, दवा, खाद, बीज, पानी और शिक्षा के लिए भी उसे संघर्ष न करना पड़े।

भाजपा की बुद्धि पर तरस खाएं

बीपी गणतंत्र दिवस के मौके पर कश्मीर के लालचौक पर तिरंगा फहराने के निर्णय से भाजपा के रणनीतिकारों की बुद्धि पर तरस आ रहा है, क्योंकि मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर फजीहत झेल रही यूपीए सरकार का इस तरह बचाव ही करती नजर आ रही है, साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान भी भारत पर दबाव बढ़ा सकता है। कश्मीर के लालचौक पर तिरंगा फहराने से अगर परिस्थतियां बदल जातीं, तो सिर्फ भाजपा समर्थक ही नहीं, बल्कि किसी भी दल के समर्थकों के अलावा हर भारतीय सब कुछ छोड़ कर तिरंगा फहराने के लिए दौड़ पड़ता, पर सभी जानते हैं कि इससे कुछ नहीं बदलने वाला। इसके विपरीत भाजपा की इस चोचलेबाजी से मंहगाई व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरी चल रही यूपीए सरकार व कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक लाभ मिलता दिख रहा है, क्योंकि लोगों का ध्यान इस मुद्दे से हटाने में नाकाम रही यूपीए सरकार व कांग्रेस को भाजपा ही एक तरह से राहत देती नजर आ रही है।

सामान्‍य वर्ग के नागरिक क्‍यों मनाएं गणतंत्र दिवस!

बीपीगहन मंथन के बाद दो वर्ष ग्यारह महीना व अठारह दिन में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़े संविधान की रचना की गयी, जिसे 26 जनवरी 1950 को देश में विधिवत लागू कर दिया गया। संविधान का मूल स्वरूप वास्तव में उत्तम ही है, क्योंकि संविधान की रचना के दौरान रचनाकारों के मन में जाति या धर्म नहीं थे। उन्होंने जाति-धर्म दरकिनार कर देश के नागरिकों के लिए एक श्रेष्ठ संविधान की रचना की। तभी नागरिकों को समानता का विशेष अधिकार दिया गया, लेकिन संविधान में आये दिन होने वाले संशोधन मूल संविधान की विशेषता को लगातार कम करते जा रहे हैं। माना जा सकता है कि देश की आजादी के दौरान कुछ जातियों के लोगों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी, तभी डा. भीमराव अंबेडकर ने बेहद कमजोर सामाजिक या आर्थिक स्थिति वाले जाति वर्ग को एक दशक तक आरक्षण देने का सुझाव रखा, जिसे बेहद जरूरी मानते हुए मान लिया गया, लेकिन अब वही आरक्षण व्यवस्था घृणित राजनीति का शिकार होती जा रही है।

सुपर फ्लाप रहीं मायावती

बीपी: आखिर कैसे कोई लिख सकता है सक्‍सेज स्‍टोरी : उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गयीं योजनाओं की बात की जाये, तो अधिकतर योजनायें दलितों, शोषितों व गरीबों के हितों की ही नजर आती हैं। सभी योजनायें अगर पात्रों तक पहुंच जाती, तो इसमें कोई शक नहीं कि समतामूलक समाज की स्थापना होने में देर नहीं लगती, पर आश्चर्य की बात ही कही जायेगी कि दलितों, शोषितों व गरीबों का शुभचिंतक होने का दावा करने वाली बसपा सुप्रीमो व मुख्यमंत्री मायावती योजनाओं को पात्रों तक पहुंचाने में नाकाम ही रही हैं। सवर्णों को बसपा सरकार से हानि है या लाभ, इस पर चर्चा करना ही सही नहीं रहेगा, क्योंकि बसपा सुप्रीमो व सरकार की मुखिया मायावती ही स्वयं को सवर्णों का हितैषी नहीं मानती हैं और मनुवादी विचारधारा का आरोप लगाते हुए सवर्णों की आलोचना भी करती हैं, जिससे बसपा सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति व पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए चलाई जा रही कुछ प्रमुख योजनाओं पर ही एक नजर डालने का प्रयास करते हैं। प्रदेश में पहले से ही एक समाज कल्याण विभाग बना हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही मायावती ने प्रथम कार्यकाल में ही 12 अगस्त 1995 को समाज कल्याण विभाग से अलग अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग व उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक कल्याण विभाग बना दिये, जो सिर्फ सरकार, मंत्री व अधिकारी-कर्मचारी कल्याण विभाग बन कर ही रह गये हैं।

अभिनय के साक्षात देवता हैं दिलीप कुमार

गौतम: दिलीप कुमार के जन्म दिन पर विशेष : हिंदुस्तान के ट्रेजडी किंग और पाकिस्तान के निशान-ए-इम्तियाज दिलीप कुमार उर्फ युसूफ खान का जन्म 11 दिसम्बर 1922 को वर्तमान में पाकिस्तान के पेशावर शहर में हुआ था, जो विभाजन से पूर्व भारत का ही हिस्सा था। विभाजन के दौरान उनका परिवार मुम्बई आकर बस गया। उनका शुरुआती जीवन तंगहाली में ही गुजरा। पिता के व्यापार में घाटा होने के कारण वह पुणे की एक कैंटीन में काम करने लगे थे, यहीं देविका रानी की पहली नजर उन पर पड़ी और उन्होंने दिलीप कुमार को अभिनेता बना दिया। उन्होंने ही युसूफ खान की जगह नया नाम दिलीप कुमार रखा। यह नाम कुछ ही समय बाद स्वयं में एक ब्रांड बन गया। उनका फिल्मी कैरियर 1944 में ‘ज्वार भाटा’ फिल्म से शुरू हुआ, लेकिन 1949 में बनी महबूब खान की फिल्म ‘अंदाज’ से वह चर्चा में आये। त्रिकोणीय प्रेम कहानी पर बनी इस फिल्म में वह राज कपूर और नरगिस के साथ खूब पसंद किये गये। फिल्म अंदाज की कहानी भी प्रेम पर ही आधारित थी, पर इसमें उन्होंने एक ऐसे दु:खी व्यक्ति का किरदार निभाया, जो दर्शकों के दिल में समा गया और उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाने लगा। प्रेमी के दर्द का जिस तरह उन्होंने अहसास कराया, वैसा आज तक कोई नहीं कर पाया।

अब राहुल राग बंद करें कांग्रेसी और मीडिया

बीपी: अब तक देश के लिए कांग्रेस महासचिव ने किया ही क्‍या है : बिहार विधान सभा सदस्यों के चुनाव परिणाम लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और कांग्रेसियों की मंशा के एकदम विपरीत ही आये हैं, लेकिन नितीश कुमार, भाजपा नेताओं व बिहार की जनता के साथ देश के अन्य भागों के लोगों को भी लगभग ऐसे ही परिणामों की आशा थी, इसीलिए लालू, पासवान व कांग्रेसियों के अलावा कोई और हतप्रभ नहीं है। चुनाव परिणामों से लालू व पासवान सबक जरूर लेंगे और अगर नहीं लेंगे, तो उनके पास कहने व करने को अब कुछ बचा नहीं है, इसलिए उनके बारे में टिप्पणी करने से अब कोई राजनीतिक लाभ या हानि नहीं है, लेकिन कांग्रेसी अब भी राहुल राग अलापना बंद नहीं करेंगे, जबकि राहुल गांधी ने बिहार में जहां-जहां चुनावी सभायें संबोधित कीं, उन विधान सभा क्षेत्रों में भी एनडीए के प्रत्याशी ही जीते हैं, जिससे साफ जाहिर है कि राहुल की कहीं कोई आंधी नहीं है। यह बात मीडिया को भी समझ लेनी चाहिए और साफ हो गया है कि मीडिया भी नेहरू-गांधी खानदान का होने के कारण ही राहुल को हाथों-हाथ लेती है, इसलिए जनता से पहले ही मीडिया ने राहुल को भविष्य का प्रधानमंत्री घोषित कर रखा है।

कथनी और करनी में फर्क मिटाना होगा नेताजी को

बी पी गौतम: मुलायम सिंह यादव के जन्‍म दिन पर विशेष : समाजवादी विचारधारा की बात की जाती है तो वर्तमान में सबसे पहला नाम सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के रूप में ही उभर कर आता है। समर्थक उन्हें समाजवादी विचारधारा का एकमात्र नेता मानते हैं, तो मुलायम सिंह यादव भी स्वयं को कट्टर समाजवादी कहते हैं, पर हैरत की ही बात है कि मुलायम सिंह यादव स्वयं की विचारधारा व कार्यप्रणाली का संचार पूरी तरह पार्टी व कार्यकर्ताओं में नहीं कर पा रहे हैं, जिससे वर्तमान दौर के सर्वश्रेष्ठ समाजवादी नेता होने के बावजूद भी समर्थकों के अलावा कोई और उन्हें समाजवादी विचारधारा का नेता मानने को तैयार नहीं दिख रहा है। राजनीतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव के नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं, जिन्हें राजनीति के इतिहास में न चाहते हुए भी दर्ज करना ही पड़ेगा, पर कई ऐसे दाग भी हैं, जो उनके समाजवादी होने पर हमेशा सवाल उठाते रहेंगे। मुलायम सिंह यादव को उनके चाहने वाले नेताजी नाम से संबोधित करते हैं एवं जमीनी नेता होने के कारण उन्हें धरती पुत्र भी कहा जाता है। वास्तव में वह स्वयं में बेहद अच्छे इंसान भी हैं। पत्रकारों से तो वह और भी अच्छी तरह से पेश आते हैं। किसी भी सवाल पर वह निरुत्तर नहीं होते। जवाब न भी दें, तो भी वह पत्रकार को अपनी बातों से संतुष्ट कर ही देते हैं। उनकी कोई पत्रकार वार्ता ऐसी नहीं होती, जिसमें वह किसी पत्रकार को सवाल पर झिडक़ते न हों, पर उनके झिडक़ने का भी अंदाज इतना सरल व मजाकिया होता है कि वह पत्रकार उनका मुरीद हो जाता है।

गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लें

बीपी गौतमकार्तिक पूर्णिमा का पर्व आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। देश और दुनिया के लाखों गंगा भक्त ठंड के बावजूद गंगा किनारे प्रवास किये हुए हैं। भक्ति, ध्यान, साधना, जप, तप और पूजा-अर्चना कर लोक-परलोक सुधारने की कामना करते देखे जा रहे हैं। आस्था, श्रद्धा और परंपरा के चलते गंगा की प्रति दिन आरती भी उतारी जाती है, पर अकाट्य श्रद्धा और अटूट विश्वास के बाद भी लाखों-करोड़ों भक्तों की भीड़ में गंगा अनाथ ही नजर आ रही है। विकास के नाम पर गंगा को लगातार प्रदूषित किया जा रहा है, जिससे गंगा के अस्तित्व पर ही प्रश्र चिन्ह लगा हुआ है। आने वाली पीढिय़ां इस अवसर पर किस जगह एकित्र हुआ करेंगी? यह चिंता गंगा किनारे आये लोगों में नहीं दिख रही है। आम आदमी की बात छोड़ भी दी जाये तो संत भी प्रदूषित हो रही गंगा को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं, जबकि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की हुंकार भरने का अवसर ऐसे पर्व से बेहतर हो ही नहीं सकता।

संकल्‍प लें, नहीं बनेंगे खाने-पीने वाले पत्रकार

बी पी : राष्‍ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष : परिवर्तन होना आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में जैसे परिवर्तन हुए हैं, वैसा ही परिवर्तन पत्रकारिता क्षेत्र में भी हुआ है। श्वेत-श्याम अखबारों से शुरु हुआ सफर रंगीन ग्लेज्ड पेपर तक आ गया है, जिसमें वक्त के साथ अभी और भी परिवर्तन आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे। हम स्वयं को गौरवशाली ही कहेंगे, क्योंकि उस दौर की धुंधली तस्वीर हमारे जेहन में है, तो इस दौर को साक्षात देख रहे हैं, लेकिन दु:ख और हैरत की बात यह है कि एक-दो संस्करणों के रूप में निकलने वाले श्वेत-श्याम अखबारों के बेहद सस्ते कपड़े पहने हुए और गले में लंबा थैला डाल कर पैदल विचरण करने वाले पत्रकारों की लेखनी में जो ताकत थी, वह अब हाई-फाई गाडिय़ों में घूमने वाले और मंहगी जींस-शर्ट आदि पहन पर लैपटॉप पर काम करने वालों की लेखनी में दिखाई नहीं दे रही। इसके पीछे तमाम कारण हो सकते हैं, जिनके बारे में पत्रकार चर्चा तक करने से बचते हैं, जबकि पत्रकारिता को बचाने का अभी वक्त शेष है, इसलिए सच्चे मन से कारणों को खोज कर पत्रकारिता को बचाने के प्रयास शुरु कर देने चाहिए, अन्यथा राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है।

लाभ का सर्वश्रेष्‍ठ धंधा बना राजनीति

बी पी व्यापारिक दृष्टि से देखा जाये तो राजनीति सर्वश्रेष्ठ व्यापारिक क्षेत्र बनता जा रहा है। बात आश्चर्यचकित कर देने वाली है, लेकिन है एक दम सच, क्योंकि वर्तमान राजनीतिक वातावरण देखते हुए स्पष्ट नजर आ रहा है कि राजनेता राजनीति में धन को व्यापार की तरह ही इन्वेस्ट कर रहे हैं और किसी भी तरह तीन, चार या पांच गुना नहीं, बल्कि दस गुने से भी अधिक वसूलने में लगे हैं, इसीलिए जनप्रतिनिधि की परिभाषा बदल गयी है और इसीलिए शासन के साथ प्रशासन के भी हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। संवैधानिक ढांचा तैयार करते समय जनप्रतिनिधियों को निधि आरक्षित करने की जरुरत महसूस नहीं की गयी, तभी जनप्रतिनिधियों को निधि की व्यवस्था नहीं रखी गयी। निधि की व्यवस्था न होने तक विभिन्न स्तरों पर जनप्रतिधि प्रस्ताव देते थे, जिस पर शासनादेशों के अनुसार अमल होता था, लेकिन निधि की व्यवस्था न होने के कारण कई तरह की व्यवहारिक परेशानियां भी सामने आ रही थीं। छोटे-छोटे विकास कार्यों के लिए भी जनप्रतिनिधियों को लंबी प्रक्रिया तय करनी पड़ती थी, इसलिए बेहद जरुरी समझते हुए जनप्रतिनिधियों को निधि की व्यवस्था कर दी गयी, जो समय के साथ अब करोड़ों में हो गयी है।

राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं बाबा रामदेव

रामदेवविश्व प्रसिद्ध योग गुरू बाबा रामदेव इन दिनों उत्तर प्रदेश में युद्ध स्तर पर योग शिविर आयोजित करा रहे हैं, लेकिन साफ तौर पर योग के बहाने भीड़ जुटा कर वह राजनीति करते नजर आ रहे हैं। कपाल-भांति व अनुलोम-विलोम के साथ वह सरकारों और राजनेताओं को लताड़ते देखे जा सकते हैं, वहीं जनता को प्रभावित करने के लिए यह भी कहते देखे जा रहे हैं कि उन्हें सत्ता और सिंहासन नहीं चाहिए। बाबा रामदेव योग के लिए ही पहचाने जाते हैं, इसलिए शिविर में जनता अपेक्षा से कहीं अधिक पहुंचती दिखाई दे रही है, लेकिन बाबा सिर्फ योग ही नहीं सिखा रहे, वह योग से अधिक राजनीतिक चर्चा पर जोर देते दिख रहे हैं। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का सदस्य बनने का भी बार-बार आह्वान करते देखे जा रहे हैं। ज्ञान-मुद्रा, वायु-मुद्रा, धारणा शक्ति मुद्रा के साथ भस्रिका, ध्यान, भ्रामरी व उज्जायी करने के लाभ गिनाते समय ही वह प्रदेश व केन्द्र की सरकारों को कोसने लगते हैं।

 

ओबामा से भारत को कुछ मिलने वाला नहीं

बी पी गौतमआतंकवाद ऐसा भयावह सच है, जिससे अकेला भारत ही नहीं, बल्कि विश्व जूझ रहा है। दुनिया का खुद को बादशाह समझने वाला अमेरिका भी आतंकवाद से अछूता नहीं है। अमेरिका सहित विश्व के ज्यादातर देशों के नागरिक डर के साये में ही जीवन जीने को मजबूर हैं। ऐसे में अमेरिका भी आतंकवाद खत्म करने का पक्षधर है। वह भी चाहता है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो, पर यह सब करने व कहने में भी वह राजनीतिक और कूटनीतिक हित साध लेता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब अमेरिका गये थे, तब बराक ओबामा ने पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा। उल्टा चीन को एशिया का थानेदार बनाने का सुझाव और रख दिया, इसलिए भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा पूरी तरह विफल ही रही थी, लेकिन मनमोहन सिंह के तौर पर यात्रा बेहद सफल रही, क्योंकि ओबामा ने मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व को लेकर कई तरह के कसीदे गढ़े। राष्ट्र की बात को सर्वोपरि रखने के प्रयास करने के बजाय मनमोहन सिंह भी ओबामा के दिये भोज को अद्भुत बताते हुए और पहला राजकीय अतिथि बनने का गौरव पाकर खुशी-खुशी भारत लौट आये।

अरुंधति की नजर में कसाब व अफजल कौन हैं?

बी पी गौतमभारत मां को डायन कहा जाता है, तो कभी राष्ट्रपिता को शैतान की औलाद बता कर भारतीयों का अपमान किया जाता है, पर सरकार अपेक्षित कार्रवाई नहीं कर पाती, तभी अब देश के विरुद्ध ही खुलेआम जहर उगलना शुरु हो गया है, क्या यह सब अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में आता है? अगर, हां, तो अजमल कसाब या अफजल गुरु जैसों पर भी मुकदमा नहीं चलना चाहिए, उनका भी वही मकसद है, जो अफसर शाह गिलानी व अरुंधति राय कह रहे हैं, क्योंकि भारत के प्रति इन सब के विचार एक जैसे ही हैं। बस, देश को तोडऩे या नुकसान पहुंचाने के तरीके अलग-अलग हैं। हुर्रियत के कटटरपंथी नेता गिलानी के जहर उगलते भाषण सुन कर आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि गिलानी नेता हैं और उनकी राजनीति का आधार देशद्रोही नीति ही रही है, पर यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह अभिव्यक्ति की आजादी में और देशद्रोही गतिविधियों में फर्क समझते हुए तत्काल कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित कराये, ताकि देश की एकता व अखंडता के मुद्दे पर प्रहार करने का कोई और भी दुस्साहस न कर सके।

पंचायत चुनाव : मनरेगा ने बढ़ाया खर्च और भ्रष्‍टाचार

बी पी गौतम: चुनाव जीतने के लिए लाखों खर्च कर रहे हैं प्रत्‍याशी : यूपीए सरकार द्वारा बनाये गये महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट से ग्रामीण क्षेत्रों में कोई खास परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा है और न ही ग्रामीण बेरोजगारों का शहरों की ओर पलायन रुका है, लेकिन इस एक्ट के तहत मुहैया कराये जा रहे धन के लालच के चलते उत्तर प्रदेश में हो रहे पंचायत चुनाव में अप्रत्याशित बदलाव दिखाई दे रहा है। तीन-चार दशक पहले विधान सभा सदस्य का चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी प्रचार पर जितना खर्च नहीं करते थे, उतना खर्च गांव में प्रधान पद के प्रत्याशी करते देखे जा रहे हैं, साथ ही किसी भी हालत में जीतने की लालसा के साथ प्रत्याशी एक-दूसरे का खून भी बहाते देखे जा रहे हैं।

अयोध्‍या 5 : अदालत ने न्‍याय नहीं किया, पीछा छुड़ाया

बीपी गौतम: कोई नहीं बनना चाहता खलनायक : करोड़ों लोगों की आस्था और श्रद्धा से जुड़े अयोध्या प्रकरण पर फैसला आ चुका है। न्यायालय के आदेश की चारो ओर सराहना की जा रही है और करनी भी चाहिए, क्योंकि भारत में न्यायालय और कानून ही सर्वोच्च हैं। जिसका पालन व सम्मान करना, सभी का दायित्व है, पर सबसे बड़ा सवाल आज भी सवाल ही है कि क्या समस्या का समाधान हो गया और अगर हो गया, तो सम्मान करते हुए, इसी पर अमल हो जाना चाहिए, जब कि दोनों ही पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कर रहे हैं। देश के वर्तमान हालात को देखते हुए इससे बेहतर फैसला और हो ही नहीं सकता, लेकिन समस्या का निराकरण न होने से डर बरकरार ही है। हो सकता है कि समस्या भविष्य में और भी विकराल रूप धारण कर सामने आये, मतलब जो डर है, उसका सामना एक न दिन करना ही पड़ेगा।

ईश्वर-अल्लाह के साथ भाषाओं का संगम भी कराया खुसरो ने

बी पी गौतमअबुल हसन यमीनुद्दीन खुसरो (अमीर खुसरो) किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के जनपद एटा व वर्तमान में जनपद कांशीराम नगर के कस्बा पटियाली में 1253 जन्मे अमीर खुसरो ने शुरु में फारसी में लिखना शुरु किया और कुछ ही दिनों बाद दिल्ली सल्तनत में राजदरबारी कवि नियुक्त हो गये। वह सात बादशाहों के साथ रहे। अमीर खुसरो हिंदी व खड़ी बोली के आदि कवि कहे जाते हैं। चिश्ती सूफी संत हजरत निजामुद्दीन के अच्छे मित्र एवं शागिर्द होने के कारण रुहानी अंदाज में लिखने के लिए भी पहचाने जाते हैं, लेकिन तमाम कारणों के चलते अमीर खुसरो को यथा स्थान नहीं मिल पा रहा है, जब कि उन्होंने किलिष्ट भाषा के साथ आम आदमी की भाषा में भी बहुत कुछ लिखा।

अयोध्‍या मामला : पितरों के खुशी का भी ध्‍यान रखें

बीपी गौतमसंयोग ही कहा जायेगा कि चर्चित अयोध्या प्रकरण का फैसला और पितृ पक्ष साथ-साथ आ रहे हैं, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण हो गया है कि फैसले के बाद ऐसा कोई कुकृत्य न किया जाये, जिससे पितरों की आत्मा को किसी तरह का दु:ख पहुंचे, क्योंकि परलोक ही नहीं, इस लोक में भी सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए पितृ लोक में बैठे पितरों का आशीर्वाद बेहद जरुरी माना गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि पितरों को असंतुष्ट करने पर किसी तरह की कोई पूजा-अर्चना, लोक-परलोक में काम नहीं आती है। शास्त्रों के अनुसार अग्रजों या पूर्वजों को जीवित होने पर तो श्रद्धापूर्वक विशेष सम्मान दिया ही जाता है, लेकिन जब वह शरीर छोड़ कर चले जाते हैं, तो भी वह क्रम जारी रहता है, तभी सौर वर्ष में से एक पूरा अर्द्ध मास पितृ पक्ष के लिए आरक्षित कर दिया गया है और इस अर्द्ध मास में विशेष तौर पर पूर्वजों को खुश करने या तृप्त करने वाले कार्य किये जाते हैं।

गरीब मुन्नी ही बदनाम क्यूँ हुई!

बी पी गौतम: किसी की मां, बेटी, पत्नी और बहन भी है मुन्नी : निर्माता अरबाज खान, निर्देशक अभिनव कश्यप, गीतकार जलीस अहमद, संगीत निर्देशक साजिद अली-वाजिद अली के साथ चर्चित कलाकार सलमान खान, नई कलाकार सोनाक्षी सिन्हा, सोनू सूद, माही गिल, विनोद खन्ना, डिंपल कपाडिय़ा, ओमपुरी, अनुपम खेर, टीनू आनंद और महेश मांजेरकर के अलावा फिल्म से जुड़े अन्य तमाम छोटे-बड़े कलाकर बेहद खुश हैं कि उनकी फिल्म दबंग ने आमदनी का एक नया रिकार्ड कायम कर दिया है। फिल्म से जुड़े लोगों से कम खुश दर्शक भी नजर नहीं आ रहे हैं, तभी सिनेमा घरों में एडवांस बुकिंग चल रही है। बात है भी खुशी और आनंद की, लेकिन इन सबको यह दु:ख कतई नहीं होगा कि अपनी आमदनी को लेकर उन्होंने देश की आम और गरीब तबके की एक महिला को उपहास का पात्र बना दिया है, जिससे वह घर से बाहर निकलने में सकुचाने लगी है।

भ्रम है जाति व्‍यवस्‍था के टूटने का दावा

बी पी गौतम: आज भी अठारहवीं सदी में जी रहे हैं लोग : पिछले दिनों हरियाणा के एक गांव समसपुर निवासी रणधीर सिंह को स्वगोत्र में शादी करने पर खाप पंचायत ने गांव छोडऩे व उसकी चल-अचल संपत्ति जब्त करने का आदेश दे दिया। पंचायत ने यह भी फरमान जारी किया कि जो उसकी मदद करेगा उसे भी इक्कीस सौ रुपये का दंड भुगतना पड़ेगा। इसी तरह महाराष्ट्र में अमरावती जिले के एक गांव मगरूर चौरा में प्रशांता नाम की एक महिला को शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने सार्वजनिक तौर पर पीट दिया। ऐसे अधिकारी के खिलाफ आवाज बुलंद करने की बजाय बिरादरी के ही लोगों ने महिला को जाति से इसलिए अलग कर दिया कि मारपीट के दौरान उसे एक गैर जाति के मर्द ने हाथ लगाया था। ऐसी जघन्य वारदातें किसी न किसी क्षेत्र में आये दिन घटती रहती हैं, पर उक्त दोनों घटनायें उन लोगों का भ्रम तोडऩे को काफी हैं, जो जातियों के खंडित होने का दावा करते हुए खुशी मनाने की बात कह रहे हैं।

क्‍यों करना पड़ता है ऑनर किलिंग!

बी पी गौतम: सोच और व्यवहार में तालमेल नहीं बैठ पा रहा है : वर्तमान में धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक वातावरण पूरी तरह बदल चुका है : ऑनर किलिंग के मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है। सरकार भी गंभीर नजर आ रही है और कड़ा कानून बनाने पर विचार कर रही है। ऑनर किलिंग को कुछ लोग सही ठहराने की कोशिश रहे हैं तो कुछ लोग जघन्य अपराध मानते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। दोनों ही तरह की मानसिकता के लोगों के अपने-अपने तर्क हैं, इसलिए दोनों तरह की मानसिकता वाले लोग सही हो सकते हैं, पर सवाल यह नहीं है कि कौन सही है या कौन गलत? सवाल यह है कि ऐसे हालात ही उत्पन्न क्यों हो रहे हैं, जिससे ऑनर किलिंग जैसा अपराध सामने आ रहा है। चर्चा अपराध की पृष्ठभूमि को लेकर होनी चाहिए, पर उस पर चर्चा करने से सभी बचते नजर आ रहे हैं, जबकि ऑनर किलिंग जैसे अपराध को अपराध की पृष्ठभूमि में जाये बगैर या उस पर अमल किये बगैर नहीं रोका जा सकता।