सेवा में, श्री नीलाभ मिश्र, संपादक ‘आउटलुक’ नई दिल्ली 110029 श्रद्धेय! ‘आउटलुक’ के फरवरी 2010 के अंक में मनीषा भल्ला की रिपोर्ट एकांगी है. कुलपति का पक्ष रखने के बावजूद. रिपोर्ट अधूरी भी है. इस रिपोर्ट में पत्रकार अनिल चमडि़या की नियुक्ति, उनकी बर्खास्तगी का कोई जिक्र नहीं है. इस रिपोर्ट में यह भी उल्लेख नहीं है कि कुलपति के कथित दलित उत्पीड़न की आग में घी किसने डाला. जिस राहुल कांबले को आधार बनाकर ‘उत्पीड़न’ का सवाल उठाया गया है. उस कांबले का हश्र यह है कि वे राष्ट्रपति से ‘इच्छा मृत्यु’ की इजाजत मांग रहे हैं. ‘दलित संघर्ष’ के नाम को कलंकित कर रहे हैं श्री कांबले.
महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय हिन्दी विश्वविद्यालय के बारे में काफी कुछ लिखा-पढ़ा जाता है. विशेषकर कुलपतियों के बारे में काफी कुछ लिखा-पढ़ा जाता है. विशेषकर कुलपतियों की ‘दादागिरी’ या मनमानी के बारे में. अशोक वाजपेयी आए तो विश्वविद्यालय को ‘प्रकाशन संस्थान’ बना दिया. भारी-भारी बेमतलब किताबें छापी गईं. वितरित की गईं. ‘वाह-वाह’ जैसी वाहवाही लूटने के लिए देश के चुनिन्दा कवियों की सीडी बनाई गई. दिल्ली, लखनऊ केन्द्र बनाए गए. फिर आए प्रो. जी गोपीनाथन.
जिन्हें एक प्राध्यापक या शिक्षाविद् कम और मुरली मनोहर जोशी का आदमी ज्यादा समझा गया. ‘भगवा ब्रिगेड’ के सदस्य समझे गए कुलपति. उन्होंने ‘विश्वविद्यालय’ की गरिमा को मूर्त रूप देने का प्रयास किया. दकियानूसी कहलाए. मुर्दाबाद, हाय-हाय होता रहा. अब हैं, विभूति नारायण राय. उनके खिलाफ भी ‘हो-हो’ और ‘हाय-हाय’ चालू है. कोई कुलपति को ‘कोतवाल-कुलपति’ का फतवा दे रहा है तो कोई ‘दलित उत्पीड़क’ बता रहा है. और अब तो ‘चोर-छिनाल’ की भाषा में, उन्हें नाकाबिल ‘अफसर’ बना दिया है.
देश में विश्वविद्यालय की परिकल्पना में कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं. आमतौर पर यह आशा की जाती है कि इन्हीं मानकों और नियमों के तहत विश्वविद्यालय का संचालन होगा. अध्ययन-अध्यापन होगा. इन मानकों और नियमों को दरकिनार करके, अस्थाई व्यवस्था और कार्य संचालन के लिए कुलपतियों को कुछ ‘विशेषाधिकार’ दिए जाते हैं. इसी विशेषाधिकार का प्रयोग, पसंदगी-नापसंदगी के चक्रव्यूह में विभूति नारायण राय फंस गए हैं. अनिल चमाडि़या की बर्खास्तगी और कांबले का पीएचडी में नामांकन न होना, इसी विशेषाधिकार के प्रयोग और पसंद-नापसंद का चक्कर है. कहा जा सकता है- एक कुलपति नियमों और विश्वविद्यालय के मानकों का सहारा लेकर अपने विशेषाधिकार और पसंदगी को प्राथमिकता दी है ताकि शिक्षण संस्थान की शुचिता के अक्षुण्ण रहने का ‘भ्रम’ बना रहे.
पत्रकार अनिल चमाडि़या की नियुक्ति विश्वविद्यालय के ‘प्रोफेसर’ पद पर सर्वथा ‘अनफिट’ थी. श्री चमाडि़या, श्री राय की व्यक्तिगत पसंद थे. कुलपति के विशेषाधिकार के तहत श्री राय ने विश्वविद्यालय के विभाग की ‘तरक्की’ के लिए अनिल चमाडि़या की नियुक्ति प्रोफेसर पद पर कर दी थी. श्री चमाडि़या को पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘श्रेष्ठ’ व्यक्तित्व करार देते हुए नियुक्त किया गया. लेकिन उनके नियुक्ति-पत्र में एक शर्त यह थी कि उनकी नियुक्ति तभी ‘औपचारिक’ मानी जायेगी जब विश्विद्यालय की एक्जीक्यूटिव कमिटि (ईसी) उसे मान्यता प्रदान कर दे. विश्वविद्यालय के पहले ही एकेडमिक काउंसिल की बैठक में अनिल चमाडि़या की नियुक्ति अवैध करार दे दी गई. कुलपति अपने विशेषाधिकार की रक्षा करने के बदले चुप रह गए. श्री राय की चुप्पी का राज यह था कि कुछ ही महीनों के कार्यकाल में अनिल चमाडि़या, कुलपति को उनकी पसंद के गलत होने का आभास करा चुके थे.
कुलपति विभूति नारायण राय ने अनिल चमाडि़या की नियुक्ति अपनी पसंद से, राष्ट्रीय पत्रकारिता के क्षेत्र में एक ‘श्रेष्ठ पत्रकार’ की हैसियत से ‘प्रोफेसर’ पद पर की. जबकि विश्वविद्यालय के नियमों-मानकों पर श्री चमाडि़या की योग्यता और अर्हता कहीं टिकती ही नहीं. पत्रकारिता के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में तो बिल्कुल नहीं. फिर भी वे नियुक्त हुए क्योंकि कुलपति के पसंदीदा थे. अपनी ‘हरकतों’ से जब श्री चमाडि़या, कुलपति के लिए झुंझलाहट का कारण बन गए तो बर्खास्त हो गए. यही किस्सा कांबले के नामांकन न होने को लेकर है.
सच तो यह है कि देश में उच्च शिक्षा की परिकल्पना ही ध्वस्त हो चुकी है. महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के खोले जाने के पीछे मूल उद्देश्य क्या है, यह सवाल अग पूर्व और वर्तमान कुलपतियों से पूछा जाए तो सबके जवाब ऐसे होंगे जैसे ‘अंधे और हाथी’ की कहानी. यूपीए की पिछली सरकार में मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने एक मुश्त देश भर में बारह केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की घोषणा कर दी. कुलपति भी नियुक्त हो गए. कुलाधिपतियों के नाम भी घोषित हो गए. एक वर्ष से अधिक का समय बीत गया, कुछ नहीं हो रहा है सिवा कुलपति महोदय की बैठकों और मनुहार-गुहार के अलावा.
चेन्नई में नव स्थापित विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी वी संजय परेशान हैं. भवन, जमीन, दफ्तर, बहाली और विश्वविद्यालय-गरिमा को लेकर. कर्नाटक के गुलबर्गा में खोला जाने वाला केन्द्रीय विश्वविद्यालय अभी कागज पर चल रहा है. दफ्तर किराए के भवन में है. विश्वविद्यालय के कुलपति को बैठने का अपना स्थान नहीं है. उड़ीसा के कोरापुट में खोला जा रहा केन्द्रीय विश्वविद्यालय और कुलपति श्रीमती सुरभि बनर्जी की हालत तो और भी हास्यास्पद है. कोरापुट केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अब तक 13 अध्यापकों की नियुक्ति हो चुकी है. वेतन चालू है. कुछ भी पूछने पर श्रीमती बनर्जी कहती हैं कि उनके हाथ में कुछ नहीं है. कुलपति महोदया कभी कोलकाता में रहती हैं, कभी भुवनेश्वर में तो कभी भुवनेश्वर से सुदूरवर्ती कोरापुट का चक्कर लगा लेती हैं. कोरापुट में कोई रहना नहीं चाहता. वहां स्कूल नहीं है. मकान नहीं है. नक्सलियों का आतंक है. कुलपति परेशान हैं. उनका ई-मेल तक हैक किया जा चुका है.
अजीब दास्तां है, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की. जिन राज्यों में केन्द्रीय विश्वविद्यालय खुले हैं उन राज्यों के खुद के विश्वविद्यालयों की वित्तीय स्थिति जर्जर है. शिक्षा जगत में ठेकेदारी-प्रथा का वर्चस्व है. बुनियादी सुविधाएं छिन्न-भिन्न हैं. राज्य और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों के बीच वैमनस्य और घृणा के भाव हैं. वेतनमान और आयु-सीमा में घोर असमानता है. उच्च शिक्षा के कंकाल बन गए हैं. राज्यों के विश्वविद्यालय. केन्द्रीय विश्वविद्यालय कोढ़ में खाज का काम कर रहा है.
भरत सागर
हैदराबाद.

