: कुछ बातें बेमतलब – 2 : अहा, आज का दिन कितना पवित्र है। पवित्र ही नहीं महान भी है। देश की प्रतिष्ठा बच गई है कि लाख घूसखोरी हो, हम अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाते हैं। हमारी भव्यता महान है। हम अपनी पुरानी पहचान को भी बनाए रखते हैं। कितने महान और पुण्य के भागी रहे होंगे वह लोग जिन्हें खेलगांव में नागराज के दर्शन हो जाते हैं। पुण्य प्राप्त करो। नोटो नहाओ, पैसा बहाओ। कभी भारत सांपों और मदारियों का देश माना जाता था। आओ देख लो, हमारे पास सांप भी हैं और एक से बढ़ कर एक मदारी भी हैं। अब इस पर कर लो बहस कि बड़ा मदारी कौन – सुरेश कलमाड़ी या शीला दीक्षित या संपूर्ण भारत सरकार या भारतीय सेना जो हफ्ते भर में बना देती है टूटा हुआ पैदल पुल। वह पुल ही क्या जो टूटे नहीं। पुल टूटने से ही पता चलता है कि हमारी गुणवत्ता कितनी महान है। टूटा पुल बनाना क्या है। असंभव को संभव बनाना। हम असंभव को संभव कर दिखा सकते हैं।
क्रिकेट के देश में खेल भी खेल कर दिखा सकते हैं। खेल भाव हमारा निराला है। हम करप्शन में आला हैं। आइए, इस पवित्र और महान दिवस को देश की परंपरा में करप्शन वेल्थ गेम दिवस के रूप में मनाएं। इसे दिल्ली के लोग मना भी रहे हैं। दर– दुकान–दफ्तर बंद। कल –कारखाना बंद। सबके ऊपर सुरक्षा का ताला। इसे कहते हैं खेल। कह सकते हैं कि पूरा देश इस खेल को देख रहा है। लेकिन यह खेल भाव के विरुद्ध है। खेल के बहाने दिल्ली बंद है। यह अन्याय है। क्या देश को खेल के बहाने छुट्टी नहीं दी जा सकती थी। खेल भाव तो यह कहता है कि संपूर्ण देश में छुट्टी होती। काम काजी दिन होता तो कहते कि एक श्रम दिवस नष्ट हुआ। आज तो रविवार है। माल –ताल बंद तो अच्छा है। फिजूलखर्ची नहीं होगी। अपने पैसे को बचा कर रखिए। बढ़ती महंगाई में दाल-रोटी-सब्जी खरीदने के काम में आएगी।
बहुत फिजूलखर्ची हो गई देश में खेल के नाम पर। इसे करने का हक सिर्फ सरकार को है। जनता को नहीं। यूं देश में जनता के भी न जाने कितने प्रकार हैं। अरबपति जनता से ले कर बीस रुपए रोज वाली भी जनता है। यह खेल नहीं है। यह पहचान है कि हम कितने अमीर लोग हैं। लाखों-करोड़ खर्च कर प्रतिष्ठा खरीद सकते हैं। इस प्रतिष्ठा की कसम देश वालों, हम वादा करते हैं कि जो कुछ भी हो जाए हम भ्रष्टाचार और दलाली का साथ नहीं छोड़ेंगे। साबित कर देंगे कि देश खेल भी सकता है। यह चुनाव का खेल नहीं है जहां पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। यह देश की प्रतिष्ठा है। हम इसे बचाएंगे।
तो आइए, हम गर्व से कहें कि यह कामनवेल्थ गेम है। इसे खूब आनंद से देखो। इतने आनंद से देखो कि मन मयूर नाच कर बोले आला रे आला करप्शन वेल्थ गेम दिवस आला!
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

