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बिहार राष्ट्र मंडल का खेल

जुगनू शारदेय : कुछ बातें बेमतलब 4 : बिहार को भारत राष्ट्र मानें या ना मानें–आपकी मर्जी। पर बिहार है तो राष्ट्र ही। यूं अपने राष्ट्र में एक ही महाराष्ट्र है। इसका मतलब यह नहीं होता कि बिहार राष्ट्र नहीं है। हमारे अत्यंत ही लोकप्रिय अध्यापकीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार कहते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारी विरासत है। सच भी है। हर अच्छे अध्यापक के समान हमारे मुख्यमंत्री वही कहते हैं जो उनके पहले के मास्टर लोग कह चुके हैं। करते भी हैं। अब जैसे हमारी विरासत में मगध साम्राज्य भी है। चूंकि मुख्यमंत्री इस साम्राज्य के सिंहासन पर विराजमान हैं, इसलिए उन्हें विरासत की चिंता सताती रहती है। इसलिए भी सताती है कि लोकतांत्रिक साम्राज्य में हर पांच साल के बाद वोटर का अनुमोदन लेना पड़ता है। आने वाले सालों में यह शब्द वोटर समाप्त होने वाला है। तब कहा जाएगा–स्टेक होल्डर।

जुगनू शारदेय

जुगनू शारदेय : कुछ बातें बेमतलब 4 : बिहार को भारत राष्ट्र मानें या ना मानें–आपकी मर्जी। पर बिहार है तो राष्ट्र ही। यूं अपने राष्ट्र में एक ही महाराष्ट्र है। इसका मतलब यह नहीं होता कि बिहार राष्ट्र नहीं है। हमारे अत्यंत ही लोकप्रिय अध्यापकीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार कहते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारी विरासत है। सच भी है। हर अच्छे अध्यापक के समान हमारे मुख्यमंत्री वही कहते हैं जो उनके पहले के मास्टर लोग कह चुके हैं। करते भी हैं। अब जैसे हमारी विरासत में मगध साम्राज्य भी है। चूंकि मुख्यमंत्री इस साम्राज्य के सिंहासन पर विराजमान हैं, इसलिए उन्हें विरासत की चिंता सताती रहती है। इसलिए भी सताती है कि लोकतांत्रिक साम्राज्य में हर पांच साल के बाद वोटर का अनुमोदन लेना पड़ता है। आने वाले सालों में यह शब्द वोटर समाप्त होने वाला है। तब कहा जाएगा–स्टेक होल्डर।

स्टेक होल्डर में अभी बिहार का वोटर नहीं आता है। उसका प्रतिनिधित्व जाति कर लेती है। जाति चूंकि एक आध्यात्मिक–दार्शनिक भाव है। अकसर यह प्रत्यक्ष होते हुए भी परोक्ष में रहती है। इसलिए प्रत्यक्ष के लिए इसने दो रुपक बनाए हैं। एक रुपक होता है समर्थक और दूसरा कहलाता है कार्यकर्ता। भारत नामक राष्ट्र में कुछ अजीब अजीब नियम कानून हैं। एक अजीबो गरीब संविधान है। 18 वीं सदी के सोच को 20 वीं सदी के बुजुर्गों ने 17 वीं सदी की मान्यताओं के आधार पर इसे बना दिया। उन्हें समझ ही नहीं आया होगा कि 21 वीं सदी में इसके आधार पर जो खेल होगा, उसका आचार संहिता होगा। यह बुनियादी तौर पर दिखाने की चीज होती है जैसे दिल्ली में हो रहा राष्ट्र मंडल खेल। बिहार में इस खेल 243 बिहारी राष्ट्र शामिल हैं। यह राष्ट्र कैसे बने, इस पर अलग से खोज बीन हो सकती है। यह कुछ कुछ ऐसा ही होता है कि कद्दू को लौकी नाम दे दिया जाए। जैसे इस खेल में किसी को खेल खेलने का टिकट नहीं मिलता तो वह कहता है कि इतने दिनों तक नेता की चरण वंदना की, मिला क्या कद्दू। अब उसे क्या पता कि इस बिहारी राष्ट्र मंडल खेल का मेडल ही कद्दू है। पर नहीं, उसे तो दिल्ली वाले राष्ट्र मंडल खेल का मेडल चाहिए।

नतीजा सामने है। बिहारी राष्ट्र मंडल के स्टेडियम में ताले पड़े हैं। तमाम क्षत्रप घरों में समाए हैं। 243 बिहारी राष्ट्र मंडलों में परिवार के लोग भरे पड़े हैं। असली लौकी-करेले की तरह कह रहे हैं कि हर जगह एक तो नीम दूजा करैला चढ़ा है। अब इन्हें कौन समझाए कि नीम और करेला सेहत को बढ़ाते हैं। इनब्रीडिंग यानी एक ही वंश के लोगों की संतान कमजोर होती है। इसीलिए अलग-अलग ब्रीड के लोग जमा किए जा रहे हैं। निश्चय ही अपना बिहारी राष्ट्र मंडल 24 नवंबर को चमत्कार दिखलाएगा। यह निराश होने की बात नहीं है कि हमारे आलू एक टिकट के लिए कितना संघर्ष कर रहे हैं। इतना संघर्ष तो मुख्यमंत्री ने बिहार के विकास के लिए भी नहीं किया। देखते जाइए बिहारी राष्ट्र मंडल का खेल!

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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