राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
कविता लिखने वाले कवि होते हैं, ये आम धारणा है, लेकिन हमने जो पंक्तियां लिखीं हैं उसके लेखक पत्रकार थे, गीतकार थे, फिल्मकार थे, स्वतंत्रता सेनानी के साथ कवि भी थे। नाम है गोपाल सिंह नेपाली। वे देश की आजादी के साथ आम आदमी की आजादी के लिए कलम की आजादी के पक्षधर रहे। पत्रकार के तौर पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साथ “सुध” और बाद में रतलाम टाइम्स का संपादन, “पुण्य भूमि” और “योगी” के लिए संपादकीय विभाग का संचालन उनकी कलम और आम आदमी की आजादी की भावना का विस्तार ही था।
तन की स्वतंत्रता चरित्र का निखार है
मन की स्वतंत्रता विचार की बहार है
घर की स्वतंत्रता समाज का सिंगार है
पर देश की स्वतंत्रता अमर पुकार है
टूटे कभी न तार यह अमर पुकार का-
तुम साधना करो, अनंत साधना करो,
आजादी के लिए लोगों को भला इससे बेहतर कोई क्या ललकारता। उनकी कलम जब चली तो अंग्रेजों की सांसें फूलने लगी। फिरंगी हाथ धो के उनके पीछे पड़े। उनके लिखने से लेकर उनका लिखा पढ़ने तक को गुनाह घोषित कर दिया गया। लेकिन जिसकी कलम स्वाधीन हो उसे लिखने से कौन रोक सकता था।
शक्ति का दिया हुआ,
शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ,
यह स्वतंत्रता–दिया,
रूक रही न नाव हो
जोर का बहाव हो,
आज गंग–धार पर यह दीया बुझे नहीं,
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है ।
जिसके लिए स्वदेश का दीया प्राण के समान हो, उसको लिखने से रोकना भला संभव था क्या। कलम चलती रही, प्रकाशन बंद रहा, हस्तलिखित अपील की कॉपियां लोगों तक पहुंचनें लगीं।
तू चिनगारी बन के उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूं
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूं।
गोपाल सिंह नेपाली, की कलम नहीं रुकी वो चलते रहे, महसूस किया गद्दार तो घर के अंदर हैं, भेदिए तो आंगन में पल रहे हैं, हमें छल रहे हैं।
बदनाम रहे बटमार मगर घर को रखवालों ने लूटा
मेरी चांद सी दूलहन रातों को नौ लाख सितारों ने लूटा।
नेपाली अपने मन के मतवाले थे। देश को मिली आजादी के बाद उनका मन कचोटने लगा। वो संतोष से लबरेज नहीं हुए। उन्हे दूसरी गुलामी सामने दिखी, पूंजीवादी साम्राज्यवाद का खतरा, बाजारवाद का भय, सब सामने दिखने लगे। स्वाधीन कलम चलती रही।
दीवारों के प्रस्तावक थे
पर दीवारों से घिरते थे
व्यापारी की ज़ंजीरों से
आज़ाद बने वे फिरते थे
नेपाली लड़ते रहे। 1933 में उमंग का प्रकाशन कोई नया उमंग नहीं ला सका। पंछी, रागिनी, पंचमी और नवीन का प्रकाशन एक के बाद एक होते रहे। 1962 में चीनी आक्रमण ने नेपाली के मन को झकझोर कर रख दिया। “हिमालय ने पुकारा है” की रचना ने लोगों के हारे हुए मन को ताजा किया, एक बार फिर देश और सेना के प्रति प्यार को संचार हुआ। जिसकी तब शायद बहुत ही जरुरत थी।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा
हो जाय पराधिन नहीं गंग की धारा
गंगा के किनारों को शिवालय ने पुकारा
हम भाई समझते जिसे दुनियां में उलझ के
वह घेर रहा आज हमें बैरी समझ के
चोरी भी करे और करे बात गरज के
बर्फों मे पिघलने को चला लाल सितारा
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा
उत्तर छायावाद के जिन कवियों ने कविता और गीत को आम आदमी के लिए सहज बनाया उनमें नेपाली अहम थे। बाद में वो मुंबई गए। वहां लगभग चार दर्जन फिल्मों के लिए गीत लिखे। हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स की स्थापना के बाद उन्होंने नजराना, सनसनी और खुशबू फिल्मों का निर्देशन किया। समाज की गहरी खाई उनको टीसती रही। आजादी के वर्षों बाद भी हालात बदलते नहीं दिखे। वो दर्द उन्होंने बयां भी किया।
यह स्वतन्त्रता नहीं की एक तो अमीर हो
दूसरा मनुष्य तो रहे मगर फकीर हो
न्याय हो तो आर-पार एक ही लकीर हो
वर्ग की तनातनी न मानती है चाँदनी
चाँदनी लिए चला तो घूम हर मुकाम ले
त्याग का न दाम ले
दे बदल नसीब तो ग़रीब का सलाम ले।
बिहार के बेतिया से मैं होकर लौटा हूं। नेपाली की चर्चा तक नहीं सुनी। अगर कहीं चर्चा की भी तो किसी की दिलचस्पी नहीं दिखी। ये बात मैं खासतौर पर इसलिए लिख रहा हूं कि बेतिया नेपाली की जन्मभूमि और कर्मभूमि है, और गाहे-बेगाहे यहां के लोग उनका नाम लेकर अपने गौरवशाली इतिहास पर इतराते रहते हैं। उनका जन्म बेतिया के सागर पोखरा स्थित उनके पैतृक घर में 11 अगस्त 1911 को हुआ था। मैं हतप्रभ था, हतप्रभ हूं। चलते चलते नेपाली को नमन —-
दिन गए, बरस गए, यातना गई नहीं
रोटियां गरीबों की सिसकियां बनीं रहीं।
लेखक असित नाथ तिवारी मौर्य टीवी में रिपोर्टर और एंकर हैं.

