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संकल्‍प लें, नहीं बनेंगे खाने-पीने वाले पत्रकार

बी पी : राष्‍ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष : परिवर्तन होना आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में जैसे परिवर्तन हुए हैं, वैसा ही परिवर्तन पत्रकारिता क्षेत्र में भी हुआ है। श्वेत-श्याम अखबारों से शुरु हुआ सफर रंगीन ग्लेज्ड पेपर तक आ गया है, जिसमें वक्त के साथ अभी और भी परिवर्तन आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे। हम स्वयं को गौरवशाली ही कहेंगे, क्योंकि उस दौर की धुंधली तस्वीर हमारे जेहन में है, तो इस दौर को साक्षात देख रहे हैं, लेकिन दु:ख और हैरत की बात यह है कि एक-दो संस्करणों के रूप में निकलने वाले श्वेत-श्याम अखबारों के बेहद सस्ते कपड़े पहने हुए और गले में लंबा थैला डाल कर पैदल विचरण करने वाले पत्रकारों की लेखनी में जो ताकत थी, वह अब हाई-फाई गाडिय़ों में घूमने वाले और मंहगी जींस-शर्ट आदि पहन पर लैपटॉप पर काम करने वालों की लेखनी में दिखाई नहीं दे रही। इसके पीछे तमाम कारण हो सकते हैं, जिनके बारे में पत्रकार चर्चा तक करने से बचते हैं, जबकि पत्रकारिता को बचाने का अभी वक्त शेष है, इसलिए सच्चे मन से कारणों को खोज कर पत्रकारिता को बचाने के प्रयास शुरु कर देने चाहिए, अन्यथा राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है।

बी पी

बी पी : राष्‍ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष : परिवर्तन होना आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में जैसे परिवर्तन हुए हैं, वैसा ही परिवर्तन पत्रकारिता क्षेत्र में भी हुआ है। श्वेत-श्याम अखबारों से शुरु हुआ सफर रंगीन ग्लेज्ड पेपर तक आ गया है, जिसमें वक्त के साथ अभी और भी परिवर्तन आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे। हम स्वयं को गौरवशाली ही कहेंगे, क्योंकि उस दौर की धुंधली तस्वीर हमारे जेहन में है, तो इस दौर को साक्षात देख रहे हैं, लेकिन दु:ख और हैरत की बात यह है कि एक-दो संस्करणों के रूप में निकलने वाले श्वेत-श्याम अखबारों के बेहद सस्ते कपड़े पहने हुए और गले में लंबा थैला डाल कर पैदल विचरण करने वाले पत्रकारों की लेखनी में जो ताकत थी, वह अब हाई-फाई गाडिय़ों में घूमने वाले और मंहगी जींस-शर्ट आदि पहन पर लैपटॉप पर काम करने वालों की लेखनी में दिखाई नहीं दे रही। इसके पीछे तमाम कारण हो सकते हैं, जिनके बारे में पत्रकार चर्चा तक करने से बचते हैं, जबकि पत्रकारिता को बचाने का अभी वक्त शेष है, इसलिए सच्चे मन से कारणों को खोज कर पत्रकारिता को बचाने के प्रयास शुरु कर देने चाहिए, अन्यथा राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है।

बदले वर्तमान दौर में हर वस्तु अर्थ के नजरिये ही देखी जाने लगी है। व्यक्ति का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ ऐश्वर्ययुक्त जीवन शैली पाना ही रह गया है। असलियत में पत्रकारिता का स्तर गिरने के लिए भी यही प्रमुख कारण है। इस बात को विद्धान कई तरह से या अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर सकते हैं, जबकि विद्धता का मतलब है कि वह इन सब वस्तुओं से दूर रहे, लेकिन आज कल के विद्धानों की प्रथम जरुरत ऐश्वर्ययुक्त जीवन शैली पाना ही दिखाई दे रही है। इसलिए पहले विद्वता पर चर्चा करनी सही रहेगी। विद्वता का मतलब गणित, भूगोल, सामाजिक या जीव-जंतु विज्ञान, अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी अथवा किसी भी विषय या भाषा का ज्ञाता होना ही नहीं है। इस सबके साथ उसे जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी होने के साथ अनुभव होने भी आवश्यक हैं। अगर हैं, तो ऐसा विद्धान सौ प्रतिशत कार्य के प्रति सजग और कर्तव्य निष्ठ रहेगा, अन्यथा वह किसी भाषा या विषय का सिर्फ ज्ञाता ही कहा जायेगा और योग्यता का प्रयोग अर्थ के लिए ही करेगा।

ऐसा ही कुछ पत्रकारिता से जुड़े बंधुओं के साथ भी हो रहा है। वर्तमान में पत्रकारिता की डिग्री शुरु हो चुकी है। मास्टर डिग्री वाले पत्रकार आम तौर पर दिखाई देने लगे हैं, लेकिन अधिकतर डिग्रीधारी पत्रकारों की खबर की प्रस्तुति, भाषा शैली या विषय वस्तु देख, डिग्री देखने का मन करता है कि इनके पास डिग्री है या नहीं। मतलब, डिग्री लेने के बाद भी भाषा पर पकड़ कमजोर हुई है, जो पत्रकारिता की गिरावट की कारण कही जा सकती है, क्योंकि विद्धानों की दुनिया में रंग-रूप, लंबाई-चौड़ाई, जाति-धर्म, वंश-खानदान, धन या कपड़े नहीं, बल्कि विद्धता का सम्मान होता है। इसलिए व्यक्ति चाहे जिस धर्म से जुड़ा है, उसे धर्म की प्राथमिक जानकारी होनी ही चाहिए, क्योंकि हर धर्म पाप कर्म से दूर रहने की प्रेरणा देता है। जीवन शैली में धार्मिक क्रियाकलापों की कमी राक्षसी प्रवृत्ति को जन्म देती है।

उदाहरण के लिए कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं है, क्योंकि अधिकतर पत्रकार साथी शराब, शबाब या मांसाहार के शैकीन दिखाई दे जायेंगे। शराब, शबाब या मांसाहार को बुरा कहने की मेरी जुर्रत नहीं है, पर कहने का आशय है कि इन सब कर्मों के लिए धन की जरुरत पड़ती है, धन न होने पर मन, आत्मा पर हावी हो जाता है और पाप कर्म करा ही देता है। इसलिए कर्तव्य से हट कर चाहे, जो कार्य किया जाये, वह सौ प्रतिशत पाप कर्म ही कहलाता है। पत्रकारों में ऐसी प्रवृत्ति बढ़ी है, इसीलिए गुणवत्ता में आश्चर्यजनक गिरावट दिखाई देने की बात की जा रही है। ऐसे भटके साथियों को ही सही बात बताने का दिन है राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस।

एक घटना याद आ रही है। बात लगभग ढाई वर्ष पुरानी है। अक्सर मैं नहीं जाता हूं, पर एक मित्र दिखाने के इरादे से एक पार्टी में साथ ले गये। जाकर देखा, तो अधिकतर साथी मस्त थे। एक मित्र ने मुझे भी सहभागी बनने के लिए आमंत्रित किया, तो मैंने यह कह कर हाथ जोड़ लिये भाई, मैं नहीं लेता हूं। मित्र मान गया, लेकिन उसने जो शब्द कहे, उन शब्दों का अर्थ मैं आज तक नहीं निकाल पाया हूं और कई बार कई वरिष्ठों से चर्चा भी कर चुका हूं, पर सब हंस कर टाल जाते हैं। उस मित्र ने कहा था कि कैसे पत्रकार हो कि खाते-पीते नहीं। मतलब, अगर पत्रकार हो तो खाना-पीना भी जरुरी है और नहीं खाते-पीते, तो अधूरे पत्रकार हो। इसी धारणा के विरोध में खड़े होने का दिन है आज।

सकंल्प लें कि स्वयं तो कर्तव्य का पालन करेंगे ही और जो भटके हुए हैं, उन्हें भी पत्रकारिता के सही मायने समझायेंगे। अगर ऐसा हो गया तो अगले वर्ष आज ही के दिन आश्चर्यजनक परिणाम दिखाई देंगे, क्यों कि ऐसा होते ही पत्रकार की कलम में पुन: सरस्वती का वास हो जायेगा और पत्रकार की कलम में सरस्वती का वास होते ही भ्रष्टाचारी, लापरवाह, उदासीन, जातिवादी और देश द्रोही फिर कांपने लगेंगे। पत्रकारिता क्षेत्र में व्याप्त सभी समस्याओं की जड़ ऐश्वर्ययुक्त जीवन शैली की लालसा ही है, इस लिए इस लालसा को त्यागने का ही दृढ़ संकल्प लेने का दिन है राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस।

लेखक बी पी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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