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ताजा बासी खाना

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब – 15 : देश की राजनीति ही नहीं मन और मानसिकता भी ताजा-बासी खाना हो गया है। यह सब कुछ बहुत सारी वजहों से हुआ। बहुत सारी वजहों की तलाश करेंगे तो वजहों तक तो नहीं ही पहुंच पाएंगे – हो सकता है कि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के विश्लेषक हो जाएं। यह बिरादरी ताजा-बासी खाना खाने और खिलाने में माहिर होते हैं। और क्यों न हों करोड़ों का धंधा है। खैर इस बिरादरी का लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का, बिहार के मामले में 24 नवंबर को रिजल्‍ट सामने आ जाएगा। उसके बाद भी, जब ताजा खाना सामने होगा – यह बिरादरी साबित करती रहेगी कि अभी भी बढ़िया होता है ताजा-बासी खाना। यह अच्छा नहीं लगता कि बिरादरी ने मुझे बिरादरी का नहीं माना है। फिर भी बिरादरी के गुण गाए जाता हूं। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि कांग्रेसियों के समान प्रधानमंत्री के ही गुण गाता हूं। या भ्रामक जनता पार्टी के समान कर्नाटक का मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को बनाए – बचाए – हटाए जाने के लिए भ्रामकता के गुण गाता हूं। जहां भी जाता हूं खाता हूं बासी-ताजा खाना।

जुगनू

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब – 15 : देश की राजनीति ही नहीं मन और मानसिकता भी ताजा-बासी खाना हो गया है। यह सब कुछ बहुत सारी वजहों से हुआ। बहुत सारी वजहों की तलाश करेंगे तो वजहों तक तो नहीं ही पहुंच पाएंगे – हो सकता है कि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के विश्लेषक हो जाएं। यह बिरादरी ताजा-बासी खाना खाने और खिलाने में माहिर होते हैं। और क्यों न हों करोड़ों का धंधा है। खैर इस बिरादरी का लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का, बिहार के मामले में 24 नवंबर को रिजल्‍ट सामने आ जाएगा। उसके बाद भी, जब ताजा खाना सामने होगा – यह बिरादरी साबित करती रहेगी कि अभी भी बढ़िया होता है ताजा-बासी खाना। यह अच्छा नहीं लगता कि बिरादरी ने मुझे बिरादरी का नहीं माना है। फिर भी बिरादरी के गुण गाए जाता हूं। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि कांग्रेसियों के समान प्रधानमंत्री के ही गुण गाता हूं। या भ्रामक जनता पार्टी के समान कर्नाटक का मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को बनाए – बचाए – हटाए जाने के लिए भ्रामकता के गुण गाता हूं। जहां भी जाता हूं खाता हूं बासी-ताजा खाना।

अब आप इसे नहीं मानेंगे कि बासी-ताजा खाना, हमारे देश की परंपरा भी है और प्रक्रिया भी। इस परंपरा और प्रक्रिया को सरकारी स्तर पर कार्य़ प्रक्रिया संचालन नियमावली भी कहा जाता है। इसी से तो जन्मा है लालफीताशाही या कहना कि ममाला ठंडे बस्ते में चला गया। दरअसल यह लालफीताशाही या ठंडा बस्ता भी कुछ नहीं होता। यह तो रास्ता है जिससे मिलता है ताजा-बासी खाना ।

ऐसी हालत में अगर हम केंद्र सरकार के संकटमोचक प्रणव बाबू होते तो कहते कि जो हो रहा है, वह इसलिए हो रहा है कि कुछ हो चुका है। अब हो चुका है तो हो ही चुका है। मगर यह भी तो समझना चाहिए कि क्यों कुछ हुआ। अगर हम यह जान जाएं कि क्यों कुछ हुआ तो हम जान सकते हैं कि होने की प्रक्रिया क्या थी। क्या प्रक्रिया ही गलत थी या गलत को ही प्रक्रिया मान लिया गया। जब तक हम इसकी पड़ताल नहीं कर लेते तो कैसे खा सकते हैं ताजा-बासी खाना।

लेकिन ऐसा नहीं मानते देश के असली मानव संसाधन मंत्री और वक्त काटू सूचना तकनॉलॉजी और संचार मंत्री कपिल सिब्बल। मंत्री होने के पहले सिब्बल साहब वकील हुआ करते थे। वकील तर्क का भंडार होता है। अपनी जिरह की ताकत के बल सत्यमेव जयते को असत्यमेव जयते बना सकता है। वकील खानदानी विशेषज्ञ होता है, भरी अदालत में माननीय न्यायमूर्ति को खिलाने का ताजा-बासी खाना ।

प्रधानमंत्री जी न जाने कितने सवालों पर अपने चूल्हा पर प्रक्रिया की धीमी आंच पर गर्म करते रहते हैं बासी, खाली बासी खाना प्रधानमंत्री के ओहदा का भी अपमान है। इसलिए बासी खाना ही नहीं सड़ा गला खाना को खिलाने के लिए गर्म-गर्म करते रहते हैं। यह गर्म-गर्म ही तो है ताजा-बासी खाना ।

अब देखिए न, आपने प्रधानमंत्री को बड़ा मान कर पत्र लिखा कि बिहार के मुख्यमंत्री विकास का ताजा-बासी खाना खिला रहे हैं। अब यहां प्रक्रिया की धीमी आंच पर उत्तर पकने लगा। प्रधानमंत्री ने खाद्य मंत्रालय से पूछा कि ताजा-बासी खाना खिलाना गलत है या सही। खाद्य मंत्रालय बहुत सोच समझ कर कहा कि यह विषय खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के तहत आता है। खाद्य मंत्रालय की इस राय के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय से फिर पूछा गया खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय से। मंत्रालय ने प्रधानमंत्री को समझाया कि यह तो सरकार की नीति है। प्रधानमंत्री ने शिकायतकर्ता को पांच साल के बाद पत्र लिखा कि सरकार की नीति है खिलाना प्रसंस्कृत ताजा-बासी खाना।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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