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साहित्य जगत

बड़ी घनघोर चुप्पी है

अमिताभयह कविता नीरा राडिया प्रकरण के बाद आम तौर पर मीडिया के स्तर पर अपनाई गयी नीति पर एक प्रतिक्रिया है. सच और झूठ तो बड़े गूढ़ शब्द हैं पर दो-तरफे मानदंडों और चुप्पी/ नाराजगी ने कुछ सवाल जरूर खड़े लिए हैं, जिन्हें मैंने अपनी दृष्टि से प्रस्तुत किया है. इसका उद्देश्य किसी भी तरह से स्वयं को विशिष्ट बताना नहीं है, क्योंकि कोई व्यक्ति कितना अच्छा या बुरा है, यह उसे दूसरा क्या बताएगा और वह भी कितने दिनों तक दूसरों को उल्लू बनाएगा।

अमिताभ

अमिताभयह कविता नीरा राडिया प्रकरण के बाद आम तौर पर मीडिया के स्तर पर अपनाई गयी नीति पर एक प्रतिक्रिया है. सच और झूठ तो बड़े गूढ़ शब्द हैं पर दो-तरफे मानदंडों और चुप्पी/ नाराजगी ने कुछ सवाल जरूर खड़े लिए हैं, जिन्हें मैंने अपनी दृष्टि से प्रस्तुत किया है. इसका उद्देश्य किसी भी तरह से स्वयं को विशिष्ट बताना नहीं है, क्योंकि कोई व्यक्ति कितना अच्छा या बुरा है, यह उसे दूसरा क्या बताएगा और वह भी कितने दिनों तक दूसरों को उल्लू बनाएगा।

अगर दिखा दिया होता, तो दिख गया होता,
न कोई झगड़ा, ना कोई लफड़ा, ना शक की कोई जरूरत,
जो बातें छुप रहीं थीं वो तैरती आसमां में थीं,
कई मतलब, कई बातें, कई रंगत, कई राहें.

ना जाने सच कहाँ बैठा, न जाने कौन कैसा हैं,
कि तुम हो भले प्यारे, या तू एक धोखा है,
तू कुछ कहता, वो कुछ कहता, कि बातें दो तरह की,
बड़ा परेशान सा मैं हूँ, तुझे चाहूँ पर सच चाहूँ.

कई ऐसी कहानी है सुनी, तेरी जुबानी से,
जब बातें सूंघ कर तुने उसे ढाला फ़साने में,
जब तू चीख कर कहता था ये आवाज़ उसकी है,
मांग करता था सज़ा-ए-मौत क्यों ना हो

वो दिन भी याद हैं मुझको, नहीं फ़रियाद सुनता था,
जो सच तू समझता था, उसी पे तू मचलता था,
वही बातें तू दोहराता, जब तलख रात ना आये,
या कुछ ऐसा हो जाए कि नयी कोई बात आ जाए.

यही सच का था पैमाना, यही इन्साफ तेरा था,
अगर कुछ बात निकली है, ज़माने में वो छा जाए,
नहीं सोचा कभी तूने, अगर वो बात झूठी हो,
कोई निरपराध मर जाए, बेचारा क्या जिए, कहाँ जाए.

यही वो बात है प्यारे, मुझसे बेचैन करती है,
जो घर तेरे चिरागाँ आ गयी तो आग बुझ जाए,
नहीं कहता तू दोषी है, नहीं जानू कि सच क्या है,
मगर इतना मैं कहता हूँ, आँखें एक सी पाए.

जो बातें झूठ हों शायद, वो बातें सच सी लगती हैं,
मगर चुप्पी, ये खामोशी, कहानी कई ये कहती हैं,
हरेक रातों का अफसाना, हरेक आँखों में आ जाए,
जिसे जो सोचना हो सोच लें, कोई उंगली ना उठ पाए.

लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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