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इरोम शर्मिला का संघर्ष : अंधियारे का उजाला

कौशलइस साल नवम्बर में मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला की भूख हड़ताल के दस साल पूरे हो गये। तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद उनकी भूख हड़ताल आज भी जारी है। इन दस वर्षों में उनका कृषकाय शरीर और जर्जर व कमजोर हुआ है। लेकिन कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छा-शक्ति बढ़ी है। यह अदम्य साहस से लबरेज मौत को धता बता देने वाली ताकत है। इसीलिए आज वे इस्पात की तरह न झुकने व न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं। इरोम शर्मिला सामाजिक कार्यकर्ता और कवयित्री हैं, भावनाओं व संवेदनाओं से भरी। उनके अन्दर खुले गगन में परिन्दों के विचरण जैसी भावना है। यह मात्र भावुकता नहीं है बल्कि यथार्थ की ठोस जमीन पर पका उनका विचार है, जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो-उत्पीड़ितों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है: ‘कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो/मैं और किसी राह पर नहीं जाऊँगी/ कांटो की बेड़ियाँ खोल दो’। यही वजह है कि आज वह सत्ता के दमन के विरुद्ध सृजन और संघर्ष की ही नहीं बल्कि हमारे जिन्दा समाज की पहचान बन गई हैं।

कौशल

कौशलइस साल नवम्बर में मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला की भूख हड़ताल के दस साल पूरे हो गये। तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद उनकी भूख हड़ताल आज भी जारी है। इन दस वर्षों में उनका कृषकाय शरीर और जर्जर व कमजोर हुआ है। लेकिन कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छा-शक्ति बढ़ी है। यह अदम्य साहस से लबरेज मौत को धता बता देने वाली ताकत है। इसीलिए आज वे इस्पात की तरह न झुकने व न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं। इरोम शर्मिला सामाजिक कार्यकर्ता और कवयित्री हैं, भावनाओं व संवेदनाओं से भरी। उनके अन्दर खुले गगन में परिन्दों के विचरण जैसी भावना है। यह मात्र भावुकता नहीं है बल्कि यथार्थ की ठोस जमीन पर पका उनका विचार है, जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो-उत्पीड़ितों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है: ‘कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो/मैं और किसी राह पर नहीं जाऊँगी/ कांटो की बेड़ियाँ खोल दो’। यही वजह है कि आज वह सत्ता के दमन के विरुद्ध सृजन और संघर्ष की ही नहीं बल्कि हमारे जिन्दा समाज की पहचान बन गई हैं।

बात नवम्बर 2000 की है। इरोम शर्मिला मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गई जिसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये। यह सब इरोम शर्मिला की आँखों के सामने हुआ। यह उनको आहत व व्यथित कर देने वाली घटना थी। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं थी जिसमें सुरक्षा बलों ने नागरिकों पर गोलियाँ चलाई हो, दमन ढाया हो पर इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था। इस घटना के बाद इरोम के लिए शान्ति रैली निकाल कर सत्ता की कार्रवाइयों का विरोध अपर्याप्त या अप्रासंगिक लगने लगा। लिहाजा उन्होंने एलान किया कि अब यह सब बर्दाश्त के बाहर है। यह तो निहत्त्थी जनता के विरुद्ध सत्ता का युद्ध है। उन्होंने माँग की कि मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम इरोम(आफ्सपा) हटाया जाय। इस एक सूत्री माँग को लेकर उन्होंने नैतिक युद्ध छेड़ दिया और मलोम बस स्टैण्ड पर भूख हड़ताल शुरू कर दी जो आज दस साल बाद भी जारी है।

वैसे इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल का पिछला दस साल अत्यन्त जद्दोजहद से भरा रहा है। आरम्भ में मणिपुर सरकार ने उनकी भूख हड़ताल को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन उनकी भूख हड़ताल की खबर पूरे मणिपुर में जंगल की आग की तरह फैल गई। सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता उनके समर्थन में जुटने लगे। इस भूख हड़ताल की वजह से इरोम शर्मिला की हालत खराब होने लगी। उनकी जान बचाने का सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। सरकार ने इरोम शर्मिला को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहाँ उन्हें रखा गया है, उसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन द्रव्य पदार्थ दिया जा रहा है। इस तरह इरोम शर्मिला को जिन्दा रखने का ‘लोकतांत्रिक’ नाटक पिछले दस वर्षों से चल रहा है।

उल्लेखनीय है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मिला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। इसलिए एक साल पूरा होते ही उन्हे रिहा करने का नाटक किया जाता है। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया जाता है और जीवन बचाने के नाम पर नाक से द्रव्य देने का सिलसिला चलाया जाता है। यह हमारे लोकतंत्र की विडम्बना ही है कि एक तरफ इरोम शर्मिला की जान बचाने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर उनके नाक से द्रव्य पदार्थ पहुँचाया जा रहा है, वहीं इरोम शर्मिला की माँग कि मणिपुर से आफ्सपा को हटाया जाय, इस कानून की वजह से जो पीड़ित हैं, उन्हें न्याय दिया जाय तथा जिम्मेदार सैनिक अधिकारियों को दण्डित किया जाय – जैसे मुद्दों पर विचार करने तक को सरकार तैयार नहीं।

दरअसल, इरोम शर्मिला जिस ‘आफ्सपा’ को हटाये जाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं, उस कानून के प्रावधानों के तहत सेना को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है, जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाती है जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में लोकतंत्र सीमित हुआ है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा सामान्य विरोध को भी विद्रोह के रूप में देखा गया है।

गौरतलब है कि जिन समस्याओं से निबटने के लिए सरकार द्वारा ‘आफ्सपा’ लागू किया गया है, देखने मे यही आया है कि उन राज्यों में इससे समस्याएँ तो हल नहीं हुई, बेशक उनका विस्तार जरूर हुआ है। पूर्वोतर राज्यों से लेकर कश्मीर, जहाँ यह कानून पिछले कई दशकों से लागू है, की कहानी यही सच्चाई बयान कर रही है। 1956 में नगा विद्रोहियों से निबटने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पहली बार सेना भेजी गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में बयान दिया था कि सेना का इस्तेमाल अस्थाई है तथा छह महीने के अन्दर सेना वहाँ से वापस बुला ली जायेगी। पर वास्तविकता इसके ठीक उलट है। सेना समूचे पूर्वोत्‍तर भारत के चप्पे-चप्पे में पहुँच गई। 1958 में ‘आफ्सपा’ लागू हुआ और 1972 में पूरे पूर्वोत्‍तर राज्यों में इसका विस्तार कर दिया गया। 1990 में जम्मू और कश्मीर भी इस कानून के दायरे में आ गया। आज हालत यह है कि देश के छठे या 16 प्रतिशत हिस्से में यह कानून लागू है।

लोकतांत्रिक और मानवाधिकार संगठनों ने जो तथ्य पेश किया है, उसके अनुसार जिन प्रदेशों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ है, राज्य का चरित्र ज्यादा दमनकारी होता गया है, जनता का सरकार और व्यवस्था से अलगाव बढ़ा है तथा लोगों में विरोध व स्वतंत्रता की चेतना ने आकार लिया है। द्वन्द्ववाद का नियम है कि जब जनता के अधिकारों का हनन होता है और दमन चरम की ओर बढ़ता है तो प्रतिक्रियास्वरूप प्रतिरोध की शक्तियाँ भी गोलबन्द होती हैं तथा संघर्ष की चेतना का प्रस्फुटन होता है। एक तरफ अपमान, बलात्कार, गिरफ्तारी व हत्या तो दूसरी तरफ तीव्र घृणा, आत्मदाह, आत्महत्या, असन्तोष व आक्रोश का विस्फोट – मणिपुर के पिछले पांच दशक का यथार्थ यही है। इरोम शर्मिला इसी यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति हैं।

मणिपुर की खासियत यह है कि इस राज्य की महिलाएँ सामाजिक व राजनीतिक संघर्षों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। इनके अन्दर लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति काफी सजगता है। अतीत में अंग्रेजी साम्राज्य से लोहा लेना हो या सामाजिक अपराध, नशाबन्दी व मंहगाई के खिलाफ संघर्ष हो, मणिपुर की महिलाओं का अपना इतिहास है। आज के दौर में ये मानव अधिकारों की रक्षा के संघर्ष की अगली कतार में हैं। इस संदर्भ में 2004 में उनके द्वारा किये संघर्ष की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। उनके आक्रोश और चेतना का विस्फोट हमें देखने को मिला जब असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’।

महिलाओं का यह विरोध मणिपुर ही नहीं देश के महिला आंदोलन के इतिहास में अनोखा है जो उनके अन्दर की आग से हमें परिचित कराता है। ये महिलाएँ ‘मीरा पेबिस आन्दोलन’ से जुड़ी थीं। ‘मीरा पेबिस’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘मशाल थामें औरतें’। इरोम शर्मिला मणिपुर के इसी इतिहास और संघर्ष की परम्परा की कड़ी हैं। दस साल से जारी उनकी भूख हड़ताल वास्तव में जनता के प्रतिरोध की मशालें हैं जो एक तरफ क्रूरता और संवेदनहीनता को सामने लाती है तो दूसरी तरफ प्रतिरोध की उस क्षमता से हमें रु-ब-रु कराती है जो रक्त का एक बून्द भी नहीं बहाती परन्तु जिसकी मारक क्षमता असीमित है। इरोम शर्मिला के शब्दों में कहें तो यह ‘अंधियारे का उजाला’ है क्योंकि ‘इन्सानी जिन्दगी बेशकीमती है/इसके पहले कि मेरा जीवन खत्म हो/ होने दो मुझे अंधियारे का उजाला’।

लेखक कौशल किशोर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा ब्‍लॉगर हैं.

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