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बातों बातों में

भ्रष्टाचार का अचार

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब 16 : यह एक बहुत बढ़िया विचार है। इस विचार में सब कुछ है सदाचार भी और कदाचार भी। जैसे राजपाट में वापसी के बाद मुख्यमंत्री ने तय किया कि भ्रष्टाचार का अचार बनाया जाए। अचार और खिचड़ी का बड़ा मधुर संबंध होता है। इसी मधुर संबंध पर तो कहावत है कि खिचड़ी के चार यार – दही, पापड़, घी और अचार। अब न बड़े-बड़े भ्रष्टाचार होने लगे हैं। पुराना भ्रष्टाचार तो जन वितरण प्रणाली ही हुआ करता था। किसी जमाने में इसका भी एक कार्ड होता था – राशन कार्ड। इस राशन कार्ड के बिना जीवन अधूरा-अधूरा सा लगता था। इस कार्ड पर सब कुछ मिलता था। सिर्फ वह नहीं मिलता था जो देने का वादा यह कार्ड करता था। अब कार्ड भी आसानी से नहीं मिलता। यह युद्ध क्षेत्र भी हो गया है क्योंकि यह आंकड़ा हो गया है। इस युद्ध क्षेत्र का सबसे बड़ा हथियार आंकड़ा होता है। यह शोध का विषय है कि आंकड़ा सदाचार है या कदाचार या भ्रष्टाचार। आपको तो पता है कि राजपाट ही नहीं, सरकार भी आंकड़े से ही चलती है। बिहार की सरकार भी आंकड़े से चलती है और भारत सरकार भी आंकड़े से चलती है। कभी-कभी भारत सरकार आंकड़े से नहीं चलती है। यह भी कह सकते हैं कि जैसे संसद नहीं चलती है, वैसे ही भारत सरकार भी नहीं चलती है। अभी बिहार सरकार और भारत सरकार में बड़ा भारी आंकड़ा युद्ध चल रहा है। इसमें से एक असत्यवादी है। ऐसा बहुत कम होता है कि सरकार दो हों और असत्यवादी एक हो। सरकार हमेशा असत्य का निर्वहन करती है। उसके पास आंकड़ों का सत्य होता है। यहां भी है। यह बड़ा ही गंभीर विषय है। इसकी गंभीरता के सामने राडिया टेपवाणी कुछ भी नहीं है।

जुगनू

जुगनू: कुछ बातें बेमतलब 16 : यह एक बहुत बढ़िया विचार है। इस विचार में सब कुछ है सदाचार भी और कदाचार भी। जैसे राजपाट में वापसी के बाद मुख्यमंत्री ने तय किया कि भ्रष्टाचार का अचार बनाया जाए। अचार और खिचड़ी का बड़ा मधुर संबंध होता है। इसी मधुर संबंध पर तो कहावत है कि खिचड़ी के चार यार – दही, पापड़, घी और अचार। अब न बड़े-बड़े भ्रष्टाचार होने लगे हैं। पुराना भ्रष्टाचार तो जन वितरण प्रणाली ही हुआ करता था। किसी जमाने में इसका भी एक कार्ड होता था – राशन कार्ड। इस राशन कार्ड के बिना जीवन अधूरा-अधूरा सा लगता था। इस कार्ड पर सब कुछ मिलता था। सिर्फ वह नहीं मिलता था जो देने का वादा यह कार्ड करता था। अब कार्ड भी आसानी से नहीं मिलता। यह युद्ध क्षेत्र भी हो गया है क्योंकि यह आंकड़ा हो गया है। इस युद्ध क्षेत्र का सबसे बड़ा हथियार आंकड़ा होता है। यह शोध का विषय है कि आंकड़ा सदाचार है या कदाचार या भ्रष्टाचार। आपको तो पता है कि राजपाट ही नहीं, सरकार भी आंकड़े से ही चलती है। बिहार की सरकार भी आंकड़े से चलती है और भारत सरकार भी आंकड़े से चलती है। कभी-कभी भारत सरकार आंकड़े से नहीं चलती है। यह भी कह सकते हैं कि जैसे संसद नहीं चलती है, वैसे ही भारत सरकार भी नहीं चलती है। अभी बिहार सरकार और भारत सरकार में बड़ा भारी आंकड़ा युद्ध चल रहा है। इसमें से एक असत्यवादी है। ऐसा बहुत कम होता है कि सरकार दो हों और असत्यवादी एक हो। सरकार हमेशा असत्य का निर्वहन करती है। उसके पास आंकड़ों का सत्य होता है। यहां भी है। यह बड़ा ही गंभीर विषय है। इसकी गंभीरता के सामने राडिया टेपवाणी कुछ भी नहीं है।

तो मुद्दा यह है – हालांकि मुद्दे इतने हैं कि किस मुद्दे को मुद्दा माना जाए, इस पर भी संसद के समान कीबोर्ड चलने से इनकार कर देता है। पर यह एक गंभीर मुद्दा है। इस मुद्दे से गरीब जुड़े हैं। सच पूछिए तो गरीब ही नहीं एक पूरी प्रणाली जुड़ी है। इसे जन वितरण प्रणाली कहते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि इसमें जन न के बराबर होता है। जब जन नहीं होगा तो वितरण कहां से होगा और जब वितरण ही नहीं होगा तो प्रणाली क्यों होगी। पर है जन वितरण प्रणाली। इस प्रणाली से रिश्ता जुड़ गया है गरीब का। इस गरीब के साथ एक अच्छी बात होती है कि यह जाति – धर्म – पार्टी से ऊपर होता है और भ्रष्टाचार से नीचे होता है।

तो सवाल यह है कि बिहार में किसने केंद्र सरकार को यह आंकड़ा दिया कि बिहार में केवल 65 लाख परिवार ही गरीब हैं। क्या गरीब पैदा करने का केंद्र सरकार का अपना आकंड़ा तंत्र है। जो भारत सरकार बिहार में 65 लाख गरीब ही मानती है। बिहार सरकार का बस चले तो वह बिहार में किसी को गरीब न माने। यह तो माने कि जो स्कारपियो वाले हैं, वह अमीर हैं और जिनके पास स्कारपियो नहीं है, वह गरीब है। बहरहाल बिहार सरकार मानती है कि बिहार में डेढ़ करोड़ परिवार गरीब हैं। 85 लाख परिवार का फासला है। इनका ही भ्रष्टाचार का अचार बनाया जा रहा है। आदतन मुख्यमंत्री सबको खाद्यान्न उपलब्ध कराने की योजना बना रहे हैं। योजना का मतलब तो पांच साल होता है। मुख्यमंत्री को एक सप्ताह के अंदर योजना चाहिए। अगले पांच साल तक उसका अचार बनाया जाएगा। सीएजी इस पर टिपण्णी कर सकता है कि बिहार में बनाया गया भ्रष्टाचार का अचार।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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