: कुछ बातें बेमतलब 18 : आज कल देश में अमेरिका विरोध कम हो गया है। वरना जिस बात पर वामपंथी दल बंद करा देते थे, उस पर भारत सरकार औपचारिकता निभा देती है। संघ परिवार के लोग तो इसे देश की प्रतिष्ठा और महान भारतीय संस्कृति से जोड़ कर न सही दिल्ली, बंगलुरु – भोपाल तो बंद करा ही सकते थे कि भारत की प्रतिष्ठा की नाक कट गई। यहां हमेशा इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या भारत की प्रतिष्ठा की कोई नाक भी है। इस पर भी बहस हो सकती है कि वह सिर्फ नाक है या प्रतिष्ठा वाली नाक है। अगर नाक कट गई तो क्या प्लास्टिक की नाक नहीं लग सकती है। फिर असली नाक कटी है या मुहावरे वाली नाक कटी है। कोई यह भी कह सकता है कि अमेरिका में तो भारत की नाक न जाने कब से कट रही है। पर अबकी बार नाक कटने का बहाना साड़ी है। यहां यह भी कहा जा सकता है कि साड़ी स्त्रियां पहनती हैं, हम भारतीय स्त्री को कहां इस काबिल मानते हैं कि उसकी नाक कटने पर हमें तकलीफ हो, इस लिए कट जाने दो अमेरिका में नाक। हमारे यहां देखो हमने साड़ी की कितनी इज्जत बना दी है। हमारे यहां से मतलब मध्य प्रदेश है। यह भारत का हृदय प्रदेश है। यह हृदय प्रदेश भी नाक वाली ही बात है। वरना है तो यह बीमारु प्रदेश में से ही एक। अब तो इसके पास नाक भी नहीं है क्योंकि इसका एक नाक बाघ यहां बहुत खतरे में है।
पर यहां भारतीय संस्कृति का बहुत मान है। असल में यहां लोग संस्कृत की पुत्री संस्कृति को हमेशा साड़ी में ही देखना पसंद करते हैं। इसलिए इसकी राजधानी भोपाल के सरकारी कॉलेज में तय हुआ कि स्त्रियां सिर्फ साड़ी पहनेंगी। जाहिर है एक दिन नगरपालिका भी यह तय कर देगी कि भोपाल की समस्त नारियां केवल साड़ी ही पहनेंगी।
जैसे अमेरिका वालों ने मान लिया है कि जो साड़ी पहनते हैं, वह आतंकवादी होते हैं। अमेरिका है भी बड़ा महान देश। वह जो मानता है, उसे दुनिया को मानना चाहिए। उसे यह पता है कि भारत जैसा नाक कटा देश किसी अमेरिकी की तलाशी बदले में कभी नहीं लेगा। ज्यादा से ज्यादा नाक कटी के बदले में कुछ विज़ा मान लेगा। यह भिक्षा अमेरिका भारत ही नहीं दुनिया को हर साल देता है। इस बार कुछ ज्यादा दे देगा।
अमेरिका बड़ा बहादुर देश है। उसकी बहादुरी हॉलीवुड की फिल्मों में ही दिखती है। असली में वहां के नागरिक वैसे ही कायर होते हैं जैसे हमारे यहां के संघ परिवारी कायर होते हैं। हम समझते हैं कि अपनी नारी को साड़ी में बांध कर हम उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा कर रहे हैं। अमेरिका समझता है कि साड़ी में बंधी नारी उसके देश पर हमला कर रही है। साड़ी ने ऐसी हालत में साड़ी से कहा कि साड़ी से भला तो अमेरिकी मूर्खता है जो हृदय प्रदेश की सांस्कृतिक गरिमा से उतनी ही कम है जितना कम डालर से रुपया है। वसुधैव कुटुम्बकम, अमेरिका में साड़ी पहनना कम और भोपाल में साड़ी के सामने आंखें रखना नम।
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

