: कुछ बातें बेमतलब 20 : नहीं लगता आपको कि देश का असली वाला शासन प्याज की परत की तरह है। असली वाला शासन केंद्र वाला होता है। राज्य वालों का शासन तो मुंबई महानगर पालिका से भी चिरकुट होता है। समझिए कि राज्यों का शासन प्याज की वह परत होता है जो खाई नहीं जाती, दिखाई जाती है। राज्य को कभी पता नहीं होता कि फसल खराब हो गई है। दरअसल, राज्य को पता भी होता है तो वह इंतजार करता है कि केंद्र सरकार कोई कार्रवाई करेगी। केंद्र सरकार इंतजार करती है कि प्याज की कीमत बढ़ती रहे। प्याज का निर्यात होता रहे। हमारा देश तो शाकाहारियों का देश है प्याज – लहसुन नहीं खाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है।
तो असली वाला केंद्रीय शासन बड़ा लोकतांत्रिक है। इसका एक मंत्री हवा की तरंग बेच कर पौने दो लाख करोड़ का घाटा कर देता है। हम मंत्री के भ्रष्टाचार के पीछे पड़ जाते हैं। प्याज की परत की तरह एक के बाद एक टेप बजता जाता है। धीरे-धीरे पता चलता है कि हवा की तरंग ही नहीं पूरे देश को बेचने की तैयारी चलती रहती है। वैसे यह एक सेमिनार का विषय है कि देश बिका हुआ है या नहीं। कितने खरीदार देश में लगातार आ रहे हैं। चलो भारत तो बेचारा है। बिलो प्रावर्टी लाइन का मारा है। इसका कोई खरीदार नहीं है। इंडिया को ही खरीदना होता है, इसी को बेचना होता है। सरकार की जिम्मेदारी भी नहीं है भारत की।
भारत की जिम्मेदारी का निर्वहन राज्य करते हैं। प्याज की कीमतों पर नियंत्रण केंद्र के कृषि मंत्रालय की होती है। कृषि मंत्रालय मानता है कि जब पेट्रोल की कीमत बढ़ सकती है तो प्याज की कीमत क्यों नहीं बढ़ सकती है। वाहन चलाने के लिए पेट्रोल चाहिए तो तरकारी बनाने के लिए प्याज चाहिए। अगर पेट्रोल का हम आयात करते हैं तो प्याज का निर्यात भी करते हैं। हमारा निर्यात सिर्फ कारोबार नहीं होता। यह तो वसुधैव कुटुंम्बकम होता है। इधर हमने प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी, उधर प्याज के नीरा राडियाओं ने प्याज की कीमत बढ़ा दी। अब जा कर प्याज की कीमत सम्मानजनक हुई है। वरना पहले, कह दिया कि प्याज रोटी खाया है – यूपीए 2 का गुण गाया है।
कृषि मंत्री, माने या ना माने, हैं वह सचमुच में ऋषि। देश के इकलौते राष्ट्र महाराष्ट्र को संत मुनि की दृष्टि से देखते हैं। महाराष्ट्र में प्याज भी होता है। आँध्र में भी प्याज होता है। वहां प्याज के साथ राजनीति भी होती है। सच पूछिए तो अपने देश में राजनीति कहां नहीं होती। राजनीति क्या है। प्याज की परत है। खोलते जाओ, रोते जाओ। जब आंसू सूख जाते हैं तो प्रधानमंत्री को याद आता है कि प्याज की कीमत बढ़ गई है। उन्हें अपना बचपन याद आता है, जब प्याज रोटी खा कर इकॉनॉमी सिख रहे थे। कृषि मंत्री ज्योतिषि नहीं होता कि बता सके कि प्याज की कीमतें कब कम होंगी। प्याज कोई भ्रष्टाचार नहीं कि कहा जा सके कि कम कर के रहेंगे। पर प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार से जूझते-जूझते यह समझ हो जाती है कि तीन महीने में प्याज की कीमतें कम हो जाएंगी। यह फर्क है प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री में। एक ज्योतिषि नहीं होना चाहता, दूसरा ज्योतिषि हो जाता है। प्याज सिर्फ महंगा हो जाता है क्योंकि उसकी एक परत में जमाखोरी भी होता है ।
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

