राहत इंदौरी
-आज के तवारीख में मुशायरों का कितना महत्व रह गया है?
—मुशायरों का जब आगाज हुआ तब ये आम आदमी से दूर दरबारों या महफिलों की चीज हुआ करती थी, लेकिन वक्त ने अपना करवट बदला तो मुशायरा भी खास लोगों से चलकर आम लोगों तक पहुंचा। वैसे आज के दौर में मुशायरा भी अन्य मनोरंजन माध्यम की तरह सिर्फ मनोरंजन का माध्यम बनकर रह गया है और कुछ नहीं। बड़ी बात तो यह है कि लोग आज इसका ब्रेसबी से इंतजार करते हैं। दिल्ली में पैदा हुआ मुशायरा दिल्ली में मर रहा है। लेकिन दूसरे इलाकों में अपने लिए नई जमीन तलाश रहा है। आज केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान से बाहर कनाडा, नार्वे में भी मुशायरों का आयोजन किया जा रहा है।
-उर्दू अदब को आगे बढ़ाने में मुशायरे कहा तक कारगर साबित हो रहे हैं?
—देखिए! आज के दौर में मुशायरे सिर्फ कारोबार बनकर रह गए है। इसे कारोबार बनाने की शुरुआत की थी जिगर मुरादाबादी ने। ऐसे में अगर हम इसमें मीर या गालिब को तलाश करेंगे तो सिर्फ मायूसी हाथ लगेगी। आज मुशायरों में शायरों के नाम पर नक्कालों, गवैयों और भाड़ों की भीड़ जुटती है। लोग उस्तादों से कलाम लिखवाकर मंच पर पढ़ते हैं। इन मुशायरों में बीस हजार से एक लाख रूपये तक लेकर लोग शिरकत करते है। ऐसे में मुशायरों में अदब को तलाशना बेमानी है।
-आपके बारे में कहा जाता है कि आप एक वर्ग विशेष की भीड़ देखकर अपनी शायरी का रूख मोड़ते हैं?
—कौन कहता है? मैंने जब 68-69 के करीब अपनी बात कहने की शुरुआत की थी तो मैने लिखा था, ‘जिन चरागों से तास्सुफ का धुंआ उठता है, उन चिरागों को बुझा दो तो उजाले होंगे।’ उस समय न तो मुल्क के नक्शे पर गुजरात जल रहा था और न ही अयोध्या, भिंवडी, मेरठ की काली छाया थी। बाद में मैंने देखा नफरत उगाई जा रही है। फिजाओं में नफरत का जहर खोला जा रहा है। मैं हिन्दुस्तानी हूं, जम्हूरी मुल्क का एक बाशिंदा, मुझे हर एक मुद्दे पर बोलने की आजादी है। एक बात ये जान लीजिए जब भी इंसानियत पर कोई जुर्म हुआ है सबसे ज्यादा मैं ही चीखा हूं। मैंने ही कहा है-
सबको रूसवा बारी-बारी किया करो,
हर मौसम में फतवे जारी किया करो,
या फिर
अगर राम वाले हो तो बनवास नजर में रखों
अगर कर्बला वाले हो तो प्यास नजर में रखो
ये फसादत मुल्क की तरक्की नहीं होने देते
मिट्टी की कच्ची दीवार को पक्की नहीं होने देते।
-सियासत की जुबां में तो इकरार भी इनकार हुआ करती है, ऐसे में शायरी की जुबां क्या होनी चाहिए?
—सिर्फ सच और सच। शायरी समझौतेवादियों की जुबां न लगे, वो सियासत की जुबां न लगे, शायरी को सिर्फ सच के हक में खड़े होने की जुबां लगनी चाहिए।
-एक शायर होने के नाते आपकी प्रतिबद्धता किसके साथ है?
—मैं तो दिल की बात कर रहा हूं दिल वालों के साथ। नफरत करने वालों को खिताब कर रहा हूं। और मोहब्बत करने वालों के साथ मोहब्बत कर रहा हूं। यही मेरी प्रतिबद्धता है।
-उर्दू के बदहाल होते हालात के बारे में क्या कहेंगे?
—ये सिर्फ अफवाह है। ये जान लीजिए जिंदा जुबानें हिलती रहती है। लफ्ज जरूर पैदा होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। कई जुबानें पैदा हुई और मर गईं लेकिन उर्दू जिंदा है। उसने सिर्फ अपनी शक्ल बदल ली है। आज से पचास साल पहले जो उर्दू थी वो आज नहीं है। लेकिन उर्दू है नई शक्ल में, केवल हिन्दुस्तान में नहीं बल्कि इससे बाहर न्यूर्याक, कनाडा, लंदन में भी उर्दू की रिसाले निकल रही है।
-एक शायर के तौर पर राहत इंदौरी की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही है?

भाष्कर
—एक बस्ती से निकल कर पूरी दुनिया में मेरे शेर तैर रहे हैं। मेरे लिए इससे बड़ी दौलत कुछ नहीं हो सकती, इससे बड़ी कमाई कुछ और नहीं हो सकती।
भाष्कर गुहा नियोगी युनाइटेड भारत, वाराणसी में कार्यरत हैं.

