दिव्या नाम था उसका,
दिव्य थी ज्योति सी,
कक्षा छह की छात्रा,
अभी आगे लंबा भविष्य,
अपनी माँ का सपना,
अपने पिता की धरोहर,
औकात से बढ़ कर,
करते उसका लालन-पालन,
भेजा एक अच्छे स्कूल,
उम्मीद थी मिलेगा ज्ञान,
मिलेगा जीवन का मूल,
सुबह-शाम आते माँ-बाप,
छोड़ने बच्चे को साथ,
उन्हें क्या मालूम था कि,
बनेगा वही स्कूल एक शाप.
एक दिन मिली उसकी लाश,
वही स्कूल, वही सब आस-पास,
गर कुछ बदला तो बस,
मिट गयी उन दोनों की आस,
जीती जागती बच्ची की जगह,
चीर-निद्रा में मग्न,
अस्त-व्यस्त तन भग्न,
शांत, जड़ शरीर बर्बाद.
बहुत चीखे, बहुत दौड़े,
कहा दोषी है वह,
जो होना था रखवाला,
खुद उसी स्कूल का मालिक,
और उसका छोटा बेटा,
पड़ी उस कमीने की कुदृष्टि,
बन के छाया अतिवृष्टि,
मौत का साया था वह,
नन्ही सी जान को ले डूबा
कहते है इन्साफ की आवाज,
होती सबसे बुलंद, सबसे तेज,
बड़ी ताकत है इसमें,
खुदा तक जाती है फ़रियाद,
पर कुछ उलटा ही हुआ यहाँ,
घूमें माँ-बाप कहाँ-कहाँ,
क्या हुआ आप-हम जानते हैं,
शर्म से अपनी गर्दन झुका कर,
चुपचाप किसी गहरे सन्नाटे में,
अपने आप को देखते-पहचानते हैं.
जांच जारी है, न्याय होगा,
कहानी है तो अंजाम होगा,
नाटक होंगे, अभिनय होंगे,
कुछ सच्चे साथी भी आयेंगे,
सब कुछ होगा यहाँ जग में,
नहीं होगी तो बस वो आवाज,
उस नन्हीं सी बच्ची की आवाज,
लग गया जिसे नज़र,
इंसान की हैवानियत का,
गंदे दरिंदे, शैतानियत का
क्या सचमुच हम हैं इंसान,
यानी वैसी प्रजाति,
जिसका है कुछ धर्म, कुछ ईमान,
कुछ इंसानियत, कुछ मानवता,
या फिर धर्म हो चुका नीलाम,
अपने-अपने स्वार्थ, अपने-अपने घाट,
शरीर की भूख के लिए,
अपनी कुर्सी के लिए,
चंद पैसों के लिए,
चंद वोटों के लिए
सोचती होगी दिव्या,
चालों अच्छा हुआ जो बच गयी,
मिल गया छुटकारा जल्दी,
न जाने कब तक सड़ती,
जलती, मरती, गलती,
अब तो आज़ाद है वह,
मैं कहता हूँ ले बदला,
काश प्रेत होते इस जग में,
काश धर रूप प्रेतात्मा का,
हर उस शख्स को नंगा करती,
उन गंदे, घटिया इंसानों को,
जिन्हें दया भी नहीं आई,
अपने छोटे-छोटे फायदे के लिए.
शीलू और इन्साफ
आज पढ़ी हमने खबर,
नहीं हुआ कोई असर,
अब मैं हूँ बेशरम,
…बचा नहीं मेरा धरम,
सच झूठ से ऊपर हूँ,
अपने सुख का चाकर हूँ,
मेरी कुर्सी बची रहे,
बाकी दुनिया जिए-मरे
सारे हैं अधिकार मुझे,
मैंने उन्हें गिरवी रखे,
बदले में क्या-क्या पाया,
ऊँची गद्दी, ऊँचा पाया,
है मुझ पर प्रभु का साया,
इससे बढ़ कर क्या भाया
मेरा मन है हर्षाया
जो हुआ मुझसे क्या,
मैं तो गीता का कर्मन्या,
जानता हूँ यह ज्ञान,
चतुर, तेज सुजान,
जो हुआ अच्छा हुआ,
जो होगा अच्छा होगा,
जब जब जो जो होना है,
तब तब सो-सो होता है,
मुरख तू क्यों रोता है,
अपने सुख को खोता है
गयी इज्जत क्या आएगी,
बदले से क्या पाएगी,
पाप का नाश करो पगली,
पापी से क्यों करती घृणा,
गाँधी के वचन मनोहर थे,
क्यों उनका पालन ना करते
भूलो बिसरी बातों को,
अब तो आगे की सोचो,
क्या रखा बदला-बदली में,
सर्दी में या गर्मी में
ईश्वर का यह संसार है,
देखो इतना प्यार है,
उसने भी तो यही किया,
बस जीवन का तो सुख लिया,
फिर कैसा आक्रोश है,
यह नीति नहीं है जोश है,
अभी बच्ची हो बात समझो,
इस कदर मत अकड़ो
मिटटी में मिल जाओगी,
देखो फिर क्या पाओगी
जो चाहो मुझसे ले लो,
आनंद करो और मोद रचो
लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.

