बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की जब अचानक से दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था। मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर तक की प्लाइट लेनी थी जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे उड़ती थी। जाहिर तौर पर मुझे घर से तड़के साढ़े तीन बजे निकलना था। टैक्सी लेकर घर से निकला तो कार की लाइट और कोहरे के बीच संघर्ष में कोहरा जीतता नजर आ रहा था। इंदिरापुरम का इलाका कुछ खुला होने की नजह से कोहरा और भी ज्यादा था। एक जगह तो हमारी गाड़ी डिवाइडर से टकराते -टकराते बची। सामने कुछ दिख नहीं रहा था अंदाज से गाड़ी चल रही थी। लेकिन वर्धा के गांधी आश्रम को और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को देखने की इच्छा मन में इतनी ज्यादा थी कि वो कोहरे पर भारी पड़ रही थी।
किसी तरह चलते चलाते हम हवाई अड्डे तक पहुंचने वाले थे लेकिन ड्राइवर के सुझाव पर हम हवाई अड्डे के ठीक पहले चाहरदीवारी से घिरे गांव मेहरमपुर में घुस गए। हवाई अड्डे के पहले इतनी बड़ी बस्ती जिसका हमें आजतक एहसास भी नहीं था। लेकिन वो पूरी बस्ती तो सुबह चार सवा चार बजे पूरी तरह से जगमगा रही थी। कई चाय की दुकान और कूरियर कंपनी के कर्मचारी अपने काम में तन्मयता से लगे थे, उनको देखकर लग रहा था कि ना तो उन्हें ठंड का एहसास था और ना ही कोहरे का भय। हमने भी वहां रुककर चाय पी। उस हाड़ कंपा देनेवाली ठंड में चाय पीने का आनंद ही कुछ और था। इच्छा थी उस बस्ती को घूमकर वहां की जिंदगी को देखता लेकिन हवाई यात्रा की घंटे भर पहले पहुंचने की मजबूरी की वजह से संभव नहीं हो पाया।
लगभग सवा घंटे की उड़ान के बाद जब सुबह सवा सात बजे नागपुर हवाई अड्डे पर उतरा तो बेहद शांत हवाई अड्डा शहर के मिजाज का भी एहसास करा रहा था। थोड़ी देर वहां रुकने के बाद वर्धा के लिए रवाना हो गया क्योंकि सुबह ग्यारह बजे से वहां दो दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार होना था जिसमें भाग लेने के लिए वक्त पर पहुंचना जरूरी था। नागपुर से तकरीबन डेढ़ घंटे में वर्धा पहुंचा। विश्वविद्यालय कैंपस में घुसते ही सामने फादर कामिल बुल्के अंतराष्ट्रीय छात्रावास दिखा। वहीं हमारे रुकने का इंतजाम था और पत्रकारिता के उत्साही छात्र हमारे स्वागत के लिए खड़े थे। वहीं हमारी मुलाकात जनमोर्चा के संपादक और बुजुर्ग पत्रकार शीतला सिंह और वरिष्ठ लेखक गंगा प्रसाद विमल जी से हुई। विमल जी सुबह की सैर से लौटकर आए थे और शीतला सिंह छात्रावास के बाहर धूप सेंक रहे थे। सुबह वहां भी ठीक-ठाक ठण्ड थी लेकिन लोग बता रहे थे कि दिन में मौसम गर्म हो जाता है।
शीतला सिंह से गपशप करते हुए पुराने हिंदुस्तानी प्रदीप सौरभ से मुलाकात हो गई। खुले आकाश के नीचे बैठकर ठण्ड में धूप का आनंद लेना दिल्ली में तो कभी नसीब नहीं हुआ, इसलिए छात्रों के बार-बार कमरे में जाकर आराम करने की सलाह को नजरअंदाज करते हुए वहीं बैठा रहा। कुछ देर बाद पत्रकारिता विभाग के युवा और उत्साही प्रोफेसर और अध्यक्ष अनिल के राय अंकित भी आ गए जो इस कार्यक्रम के संयोजक थे। उनसे गपशप करने के बाद विश्विद्यालय के दिल्ली केंद्र प्रभारी मनोज राय के साथ मैं कैंपस घूमने निकल गया। हम वहां भी गए जहां बैरकनुमा चार कमरों से विश्वविद्यालय शुरू हुआ था। सड़क के आमने-सामने विश्वविद्यालय के दो कैंपस हैं। लेकिन अभी मुख्य कैंपस में ही ज्यादा हचलचल और चहल पहल थी क्योंकि विश्वविद्यालय के तमाम अधिकारियों के दफ्तर और आवास इसी कैंपस में है। पूरे विश्वविद्यालय कैंपस के चारो ओर रिंग रोड बन बनाकर उसे सुरुचिपूर्ण तरीके से एक आकार दिया जा रहा है । उपर एक जगह गांधी हिल है जहां पहाड़ी के हिस्से को एक छोटे पार्क के तौर पर विकसित किया गया है, जिसमें गांधी के तीन बंदरों की मूर्तियों के अलावा गांधी की घड़ी और उनका चश्मा भी है। पहाड़ी के उपर, पानी की कमी के बावजूद गांधी हिल पर तमाम फूल पौधे लहलहा रहे थे। छात्रों ने बताया कि कुलपति की व्यक्तिगत रुचि की वजह से ही यह हो पाया।
नियत समय पर हमलोग विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागार में पहुंचे और बाबू विष्णुराव पराड़कर को नमन कर कार्यक्रम शुरू हुआ। बनारस से आए विद्वान प्रोफेसर राममोहन पाठक और कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की प्रोफेसर ताप्ती बसु का भाषण हुआ। बोझिल से कार्यक्रम में गर्मी आई जब हरिभूमि के संपादक हिमांशु द्विवेदी ने जोशीले अंदाज में ये साबित करने की कोशिश की पत्रकारिता भी कारोबार है और पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए पाठक भी जिम्मेदार हैं। हिंमाशु ने कहानियां, चुटकुले और शेर सुनाकर खूब तालियां बटोरी लेकिन बाद में जब गंगा प्रसाद विमल और कुलपति विभूति नारायण राय बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने हिमांशु के भाषण की धज्जियां उड़ा दी। जोश में विमल जी ने तो सारे संपादकों और पत्रकारों को बिचौलिया करार दे दिया। कुलपति ने भी डंके की चोट पर कहा कि पत्रकारिता और किसी व्यवसाय की तरह नहीं है, जब भी मीडिया की आजादी पर हमला हुआ है तो पूरा समाज उसके खिलाफ खड़ा हो गया। इस वजह से मीडिया से समाज की अपेक्षा भी है लेकिन जोश में कुलपति ने भी मीडिया संपादकों को भ्रष्ट करार दे दिया। जिसपर बाद में उन्होंने, अगले दिन जब ये मुद्दा उठा, तो सफाई देते हुए कहा कि उन्हें मिसकोट किया गया।
दो सत्रों में यह विमर्श हुआ। दोनों सत्रों में बजुर्ग प्रोफेसर और पत्रकारों ने विमर्श किया जिनकी बातें सुनकर मैं बहुत ज्यादा निराश हुआ, पत्रकारिता कहां से कहां चली गई लेकिन वो लोग अब भी मिशन की लकीर पीट रहे हैं। मुझे लगता है कि पत्रकारिता पर बात हो तो युवा पत्रकारों को ज्यादा मौका मिलना चाहिए, क्योंकि विश्वविद्यालय के बुजुर्ग प्रोफेसर ना तो नई तकनीक से अवगत हैं और ना ही मीडिया में पिछले दशक में आए बदलाव से। ऐसे में पत्रकारिता के छात्रों को हम नैतिकता और मिशन की घुट्टी तो पिला देते हैं लेकिन व्यावहारिकता छूट जाती है। अनिल के राय अंकित युवा विभागाध्यक्ष हैं और उम्मीद करता हूं कि भविष्य में इस तरह के सेमिनार में युवाओं को भी बराबरी का मौका देंगे, इससे एक तो छात्रों को नई तकनीक और माहौल में काम करने का तरीका और दबाव दोनों का पता चलेगा।
अगले दिन टीवी पर केंद्रित सत्र था, जिसकी अध्यक्ष कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष ताप्ती बसु थी और वक्ता थे वरिष्ठ पत्रकार और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एनके सिंह, जी न्यूज के एंकर और राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, आगरा विश्वविद्यालय पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष गिरिजा शंकर शर्मा और मैं। एनके सिंह ने बीज वक्तव्य में जोर देकर इस बात को कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी जा सकती है चाहे वो राजनीति हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका। एनके ने तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते हुए कहा कि मूल्यों के क्षरण की समस्या हमारे लोकतांत्रिक वयवस्था में खामी की वजह से है। मैंने पूर्ववर्ती वक्ताओं द्वारा पूरी मीडिया को भ्रष्ट और संपादकों को बिचौलिया कहे जाने पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि विभूति नारायण राय और गंगा प्रसाद विमल की समाज में एक अहमियत हैं और जब वो बोलते हैं तो समाज पर असर डालते हैं। इस वजह से उन्हें इस तरह के स्वीपिंग रिमार्क से बचना चाहिए।
प्रसून ने अपने अंदाज में बोलते हुए गूगल को पत्रकारिता का पर्याय ना मानने की सलाह दी। इसके बाद भी एक सत्र हुआ जिसमें प्रकाश दूबे, विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति अरविंदाक्षन ने अपनी बात रखी। कुल मिलाकर दो दिनों तक चला यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा। लेकिन जैसा कि मैं उपर भी कह चुका हूं कि ऐसे कार्यक्रमों में युवा पत्रकारों की भागीदारी इस विमर्श को एक अलग स्तर पर लेकर जाएगी। क्योंकि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की जो राय पुरानी पड़ चुकी है और वो अपनी विद्वता के बोझ तले इतने दब चुके होते हैं कि उन्हें जो कुछ नया हो रहा है उसको जानने की रुचि ही नहीं रहती है। दो दिनों तक वर्धा में रहने के दौरान मैं गांधी आश्रम भी गया, गांधी के कमरे हर चीज को देखा-छुआ। अपने स्तंभ में आश्रम के अपने अनुभवों को भी लिखूंगा।
लेखक अनंत विजय वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं तथा आईबीएन7 से जुड़े हुए हैं.

