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क्या प्रतिभा केवल महिलाओं में होती है, पुरुषों में नहीं?

अम्बुजेश कुमार मीडिया और यौन शोषण, माजरा क्या है? :  हालत यह है कि किसी अच्छे घर की लड़की भी अगर मीडिया से जुड़ी हुई है, तो उसे लोग शक की निगाह से देखते हैं। अभी तक ये स्थिति दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों में ही थी, लेकिन कस्बाई और छोटे शहरों के स्तर तक ये गंदगी आना निहायत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इस सबमें एक बड़ा सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर इस सबका जिम्मेदार कौन है? इस स्थिति तक पहुंचने के लिए आखिर किसने इस विषबेल को सींचा और पल्लवित पुष्पित किया है? इस सबका एक ही जबाव सामने आता है। हालत यह है कि कुकुरमुत्ते की तरह खुलते मीडिया संस्थान और चैनल इस सम्पूर्ण विकृति के लिए जिम्मेदार हैं।

अम्बुजेश कुमार मीडिया और यौन शोषण, माजरा क्या है? :  हालत यह है कि किसी अच्छे घर की लड़की भी अगर मीडिया से जुड़ी हुई है, तो उसे लोग शक की निगाह से देखते हैं। अभी तक ये स्थिति दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों में ही थी, लेकिन कस्बाई और छोटे शहरों के स्तर तक ये गंदगी आना निहायत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इस सबमें एक बड़ा सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर इस सबका जिम्मेदार कौन है? इस स्थिति तक पहुंचने के लिए आखिर किसने इस विषबेल को सींचा और पल्लवित पुष्पित किया है? इस सबका एक ही जबाव सामने आता है। हालत यह है कि कुकुरमुत्ते की तरह खुलते मीडिया संस्थान और चैनल इस सम्पूर्ण विकृति के लिए जिम्मेदार हैं।

इसके अलावा मीडिया संस्थानों द्वारा दिखाये जाने वाले दिवास्वप्न भी इसके लिए कहीं ना कहीं उत्तरदायी हैं। मीडिया संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं सिर्फ एक ही सपना देखते हैं। पहला एंकर और दूसरा रिपोर्टर बनने का। यह मानसिकता ही इन्हें इन मीडिया की मंडियों में हजारों रुपये खर्चने को बाध्य कर देती है और फिर यहां से निकले नवजात पत्रकारों की पीढ़ी किसी भी हद तक जाकर सबसे पहले क्षतिपूर्ति करने के प्रयास में लग जाती है। आज तकरीबन हर चैनल पर दिखने वाले चेहरे कितने परिपक्व हैं, उनका कितना सामान्य ज्ञान है, इससे किसी को कोई मतलब नहीं है। आज छोटे चैनलों की प्रथम प्राथमिकता यही है कि टीवी पर दिखने वाला चेहरा सुन्दर होना चाहिए। अभी बस एक साल पहले एक चैनल की लांचिग पर एंकरो नें कैटवाक किया था। अब किसी भी चैनल को पत्रकार नहीं अपितु मॉडल्स चाहिए जो कि स्क्रीन पर चार चांद लगायें। उनका पत्रकारीय अनुभव क्या है, उनका सामाजिक सरोकार क्या है, इससे किसी को कोई भी मतलब नहीं है।

मुझे अक्सर हंसी आती है कई समाचार चैनलों की एंकर्स को देखकर। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की चर्चा हो या फिर देश की राजनीति की या फिर गली मोहल्ले के किसी खास घटना की। चैनलों के प्राइम टाइम तक में ऐसे चेहरे दीख जाते है। मेरा मतलब किसी का बुद्धिपरीक्षण करना कदापि नहीं है। लेकिन जिन विषयों को पूरी तरह जानने के लिए एक सामान्य छात्र किताबे खंगाल देता है उसे महज कुछ पैकेजों को आधार बनाकर उनका विश्लेषण करा देना कहां तक उचित है। यहां मैं यह भी जोड़ना चाहूंगा कि अभी भी कुछ बड़े और स्थापित चैनल इस बचपने से खुद को बचाते आये हैं मगर कब तक बचा पायेंगे इसका कोई ठिकाना नहीं है।

यहां आपको यह लग सकता है कि मैं विषयेतर हो रहा हूं। मगर ये सारी बाते उपर की पहली लाइनों से जुड़ी हुई है। चैनलों की बाढ़, कन्टेन्ट की कमी, बाजारू खबरों का बढ़ता प्रभाव, ये सभी ऐसे कारक हैं जो कि नई पीढी को जल्दी से जल्दी स्टार बनने का सपना दिखा देते हैं। पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों को हमेशा यही दिवास्वप्न दिखाया जाता है कि बस एक साल और उसके बाद तो स्टार बन ही जाना है। संस्था से निकलने के बाद जब उनका सामना जब कड़वी सच्चाई से होता है तो वे फिर कहीं भी कैसे भी काम करने को मजबूर हो जाते हैं। इसके अलावा माता पिता की अनन्त अपेक्षाएं, खुद के देखे सपने, संस्थान द्वारा बुना गया मायाजाल। ऐसे कितने ही छात्रों से मैं व्यक्तिगत तौर पर मिला हूं जो कि अपने घरवालों को वास्तविक स्थिति बताने का साहस नहीं जुटा पाते हैं क्योंकि उंचे सपने दिखा कर मीडिया मंडियों में एडमिशन लेने के वक्त जब घर से हजारों रुपये फूंकते है तो उस समय तो भविष्य उज्जवल ही दीखता है। जगहंसाई का डर और कुछ हद तक अपना झूठा स्वाभिमान को बनाये रखने की चाहत उन्हें वह सब कुछ करने पर मजबूर कर देती है जो कि पत्रकारिता के सिद्दान्तों के कत्तई अनुरुप नहीं है।

दिल्ली में आज छोटे-बड़े तकरीबन दो हजार अखबार निकलते है। भारत में प्रसारित होने वाले सभी चैनलों के कार्यालय भी यहीं है। लेकिन क्या कभी जमीनी हकीकत पर आपने गौर किया है। दिल्ली के जन्तर मंतर पर रोज ही पचासों पत्रकार ऐसे मिल जाते हैं जो कि ऐसे ऐसे अखबारों से होते हैं जिनका किसी ने नाम भी ना सुना हो। एक हजार रुपये से पांच हजार रुपये तक की सेलरी पर नौकरी करने वाले ये पत्रकार बन्धु जहां से मौका मिलता है, बस झटक लेते हैं। हां एक बात जरूर है कि महिलाओं को थोड़ी सुविधा जरुर होती है क्योंकि चैनलों में कभी इन्टर्नशिप के नाम पर तो कभी ट्रेनी के नाम पर रखने के लिए मीडिया में घुस आये कुछ रसिक प्रवृत्ति के जीवों को काफी सहूलियत मिल जाती है। मैं यह आरोप तो नहीं लगा रहा मगर अपने दिल्ली के छोटे से प्रवास में मैंने जो महसूस किया है उसके आधार पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ऐसे रसिकों को चारा डाल कर काम निकालने की प्रवृत्ति काफी महिला पत्रकारो में देखी है। ऐसे में शोषण तो हमेशा होता है मगर जो थोड़ी बहुत खबरें छन कर सामने आती हैं उससे संभ्रान्त समुदाय काफी बैचेन हो जाता है। वरना ये सवाल तो सभी उठा ही सकते हैं कि छोटे चैनलों पर दिखने वाली ट्रेनी स्तर की महिला पत्रकारों में क्या कोई दैवीय शक्ति आ जाती है? कि महज छः महीना या फिर एक साल के करियर में स्क्रीन पर स्टार के तरह दिखने लगती हैं। जबकि वही काम करने वाले कई वरिष्ठ लोगों को दस पंद्रह साल के अनुभव के बाद भी यह मौका हाथ नहीं लगता। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या प्रतिभा केवल महिलाओं में होती है, पुरुषों में नहीं? मैं अपनी महिला पत्रकार पाठकों से माफी मांगते हुए यह लिखना चाहूंगा कि कहीं ना कहीं कोई ना कोई पूर्वाग्रह काम जरुर करता है। यौनशोषण की चर्चाएं या गाहे बगाहे उठ‌ने वाली खबरें तो बस इसलिए होती हैं क्योंकि ‌इनकी शिकार महिलाएं समझौता करने को तैयार नहीं होती। वरना बाजारवाद के दौर में करियर के लिए समझौतावादी होने वालों की कमी नहीं है।

कारण साफ है। मीडिया की मंडियों से हर साल निकलने वाली हजारों प्रशिक्षु पत्रकारों की फौज को समायोजित करने भर के लिए ना तो अखबारों में जगह है और ना ही चैनलो में। ऐसे में ये लोग जायें तो जायें कहां। छोटी सी मीडिया की दुनिया में जिसे जहां हाथ साफ करने का मौका मिलता है, कर लेता है। पुरुष पत्रकार जो कि दौड़ में पीछे रह जाते हैं, अपने भरण पोषण के लिए पत्रकारिता के नाम भर का सहारा ले लेते हैं। चाहे वह जिला स्तरीय अखबार ही क्यों ना हो। वहीं दूसरी ओर केबल टीवी से लेकर नेशनल चैनल तक में अगर थोड़े बहुत समझौते करने से ग्लैमर की दुनिया का हिस्सा बनना सम्भव होता है तो कुछ लोग समझौते भी कर लेते हैं। ऐसे में दोषी ना तो शोषित है और ना ही शोषक है बल्कि बाजार की लगी नजर इसके लिए सबसे ज्यादे दोषी है क्योंकि जिस दिन से पत्रकारिता ने अपने सेवाभाव का चोला उतारा, उसी दिन से विसंगतियों से इसकी दोस्ती हो गयी। वरना एक जिला स्तर या फिर कस्बे स्तर का पत्रकार कारों से घूमता है और बड़ी-सी कोठी बनवा सकता है। अफसर उसे सलाम करते हैं। जबकि दूसरी ओर उसी के आफिस का सीनियर गाड़ी और घर तो दूर, दिल्ली के अच्छे कालोनी में रहने के लिए तरस जाता है। वहीं दूसरे ओर छः महीने में एक महिला एक बड़े चैनल के प्राइम टाइम में दिखने लगती है जबकि वहीं दूसरी ओर समझौतों से भागने वाली उसी की हमउम्र और योग्यता रखने वाली महिला लोकल अखबार या फिर केबल टीवी तक ही सिमट के रह जाती है। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जबाव मीडिया के कर्ताधर्ताओं को ढूंढना ही होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब इस पेशे की पवित्रता और मर्यादा पूरी तरह बिखर जायेगी। और फिर पत्रकार, पत्रकार नहीं मार्केटिंग एजेन्ट भर बन के रह जायेगें। बची-खुची नैतिकता और मानदण्ड को बचाये रखने के लिए अभी से प्रयास होना निहायत ही जरुरी है।

लेखक अम्बुजेश कुमार पुरबिहा चैनल ‘हमार टीवी’ के पॉलिटिकल कॉरेस्पान्डेन्ट हैं.

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