हिरोशिमा और नागासाकी पर हमले की बरसी पर बनाए गए एक पैकेज में पहली बार अशोक सर का वॉयस ओवर सुना था और फिर प्रशंसक बन गया. आवाज़ पहले सुनी थी नाम बाद में जाना. बात अक्तूबर 2004 की है. ट्रेनी के रूप में ईटीवी बिहार-झारखंड में ज्वाइन करने के बाद अशोक सर से पहला परिचय इसके कुछ दिन बाद हुआ. उम्र में मैं उनसे काफी छोटा था…इसलिए वे बड़े भाई जैसे थे. बॉस जैसे तो वे किसी को कभी लगे ही नहीं. ईटीवी राजस्थान से लेकर नेशनल हिन्दी डेस्क तक हर जगह वे सबके बड़े भाई या फिर दोस्त रहे. एक धीर-गंभीर और आम लोगों से जुड़े सवालों को पूरी शिद्दत से उठाने वाले अशोक सर एक बेहतरीन एंकर थे. मेकअप रूम में कई बार डेस्क से जुड़ी रोज़मर्रा की मुश्किलों पर खीझ निकालता….तो अशोक सर शांत करते. कहते,…यही सब कुछ नहीं है,..धीरे-धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा. मेकअप आर्टिस्ट से लेकर ईटीवी की दूसरी भाषाओं के चैनलों के लोग भी उनका काफी सम्मान करते थे. अशोक जी को सभी जानते थे और मानते थे.
ईटीवी में वो सबसे सीनियर एंकर्स में एक थे. बुलेटिन बनाने से लेकर एक चैनल को चलाने तक की उनकी क्षमता ग़ज़ब की थी. चारों हिन्दी चैनलों में तो उनके बराबर का ऐसा व्यक्ति शायद ही कोई था… जो सभी काम में दक्ष हो. लेकिन अपने को जताने की कभी कोशिश नहीं की. किसी को ना कहना उन्होंने जाना ही नहीं था. ईटीवी राजस्थान पर काम करने वाले दोस्तों के साथ कभी छुट्टी मनाने की बात आती तो मुश्किल नहीं होती. अशोक सर को फोन भर करने से उन्हें इजाज़त मिलनी तय थी. अशोक सर अपनी धुन में खोए रहते…काम से काम रखते. कोई भी फैसला लेने से पहले ये ख़्याल रखते,…कि बाक़ी लोगों की क्या राय है. इसके बाद वे नेशनल हिंदी डेस्क के प्रमुख बने…और वहां भी नए लोगों को आगे बढ़ने का मौक़ा दिया. जिसमें जो क़ाबिलियत थी उसे परखकर बड़ी ज़िम्मेदारी देने से भी नहीं चूके.
मार्च 2008 में अचानक एक दिन ऑफिस में ख़बर मिली कि अशोक सर वीओआई जा रहे हैं. तीन महीने बाद,..दिल्ली से जून में हैदराबाद लौटे और सेट्लमेंट के काम से ईटीवी ऑफिस आए….तब उन्हें देखकर सन्न रह गया. अशोक सर की तबियत अच्छी नहीं थी और वज़न भी काफी कम हो गया था..पूछा तो कहा…कि ये दिल्ली की जीवनशैली का असर है. बाद में मैं भी उनके पीछे वीओआई आ गया.
यहां अशोक सर हमारे लिए तो पहले जैसे ही रहे…लेकिन वो कुछ ज़्यादा ही अंतर्मुखी नज़र आने लगे थे. धीरे-धीरे उनकी चुप्पी बढ़ती गई. इसकी वजह नामालूम नहीं थी. वीओआई का माहौल बिल्कुल अलग था. अशोक सर ना तो दिल्ली सम्मान पाने आए थे और ना ही उन्हें ओहदे की चाहत थी…इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता में दिल्ली केंद्र था…इसीलिए यहां आए थे…वरना हैदराबाद में उन्हें किसी बात की कमी नहीं थी.
वीओआई में हर दिन बदलती स्थिति उन्हें असहज कर रही थी…सब कुछ ठीक होने की उम्मीद वो कभी नहीं छोड़ते थे… लेकिन यहां तो धैर्य की परीक्षा ली जा रही थी. बावजूद इसके अशोक सर सबके सामने खुलते नहीं थे. वे नहीं चाहते थे कि उनकी बातों से पहले से ही भारी माहौल और ज़्यादा नकारात्मक हो. पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि वे अपने छोटे से परिवार को भी कभी अपनी मुश्किलों के बारे में नहीं बताते होंगे. ये एक तरह का ज़हर था…जिससे वो अंदर ही अंदर घुटते गए. किसी से कुछ नहीं कहा… सब कुछ चुपचाप सहा. नतीजा सामने है.
किसी को दोष देने से अब क्या फायदा? अब अशोक सर वापस लौट कर नहीं आएंगे…लेकिन हमें सोचना होगा कि क्या तथाकथित पत्रकारिता में एक सहज, सरल और ईमानदार व्यक्ति का यही हश्र होगा? क्या किसी की मैय्यत पर मिलकर ही हम पत्रकारिता के माहौल पर चर्चा करेंगे? चैनलों के मालिकों को गाली देने की बजाय मौजूदा स्थिति के लिए हमें ख़ुद भी अपने गिरेबान में झांकना होगा.. वरना काफी देर हो जाएगी.
लेखक अमित कुमार ज़ी न्यूज़ उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं.

