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….तो इतने बड़े चोर हैं एमिटी यूनिवर्सिटी वाले!

यूजीसी-एआईसीटीई टीम ने किया निरीक्षण : कई गड़बड़ियों-घपलों का खुलासा : मान्यता का आवेदन ठुकराया : गोवा यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर बीएस सोंदे के नेतृत्व वाली 11 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने 16-17 जुलाई 2009 को किए गए एमिटी यूनिवर्सिटी के निरीक्षण से संबंधित अपनी रिपोर्ट को यूजीसी- एआईसीटीई को सौंप दी है। रिपोर्ट में एमिटी के खिलाफ काफी सारी बातें कही गई हैं। एमिटी के ढेर सारे खेल-तमाशों का पर्दाफाश किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक एमिटी यूनिवर्सिटी में दर्जनों प्रोफेशनल और टेक्निकल कोर्स संबंधित काउंसिलों से मंजूरी लिए बिना ही संचालित किए जा रहे हैं, जो बिलकुल गलत है। नंबर एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी होने का ढिंढोरा पीटने वाली एमिटी यूनिवर्सिटी की पूरी राम कहानी आप सुनेंगे तो दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे। सिर्फ चार साल में इस विश्वविद्यालय ने सेटिंग-गेटिंग के फार्मूले पर चलते हुए इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया। नियम-कानून बनाने वाले और उसका पालन कराने वाले एमिटी के गड़बड़-घोटालों की तरफ से आंख मूंदे हुए हैं। मीडिया वाले भारी-भरकम विज्ञापन लेकर एमिटी के गड़बड़घोटालों को छापने से परहेज करते हैं।

यूजीसी-एआईसीटीई टीम ने किया निरीक्षण : कई गड़बड़ियों-घपलों का खुलासा : मान्यता का आवेदन ठुकराया : गोवा यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर बीएस सोंदे के नेतृत्व वाली 11 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने 16-17 जुलाई 2009 को किए गए एमिटी यूनिवर्सिटी के निरीक्षण से संबंधित अपनी रिपोर्ट को यूजीसी- एआईसीटीई को सौंप दी है। रिपोर्ट में एमिटी के खिलाफ काफी सारी बातें कही गई हैं। एमिटी के ढेर सारे खेल-तमाशों का पर्दाफाश किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक एमिटी यूनिवर्सिटी में दर्जनों प्रोफेशनल और टेक्निकल कोर्स संबंधित काउंसिलों से मंजूरी लिए बिना ही संचालित किए जा रहे हैं, जो बिलकुल गलत है। नंबर एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी होने का ढिंढोरा पीटने वाली एमिटी यूनिवर्सिटी की पूरी राम कहानी आप सुनेंगे तो दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे। सिर्फ चार साल में इस विश्वविद्यालय ने सेटिंग-गेटिंग के फार्मूले पर चलते हुए इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया। नियम-कानून बनाने वाले और उसका पालन कराने वाले एमिटी के गड़बड़-घोटालों की तरफ से आंख मूंदे हुए हैं। मीडिया वाले भारी-भरकम विज्ञापन लेकर एमिटी के गड़बड़घोटालों को छापने से परहेज करते हैं।

सबसे बड़ा मजाक तो यह देखिए कि कथित नंबर एक प्राइवेट विश्वविद्यालय एमिटी अपनी स्थापना के चार वर्ष पूरे होने के बावजूद अभी तक यूजीसी और एआईसीटीई से मान्यता नहीं पा सकी है। प्रोफेसर बीएस सोंदे के नेतृत्व वाली 11 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के बाद तो एमिटी को निकट भविष्य में मान्यता मिलने की उम्मीद भी नहीं है। यूजीसी-एआईसीटीई की तरफ से गठित की गई इस समिति ने पिछले दिनों एमिटी यूनिवर्सिटी का जो दौरा किया, उसमें इस टीम को कई तरह के गड़बड़-घोटाले और खामियां मिलीं। इसी के चलते समिति ने एमिटी की मान्यता संबंधी अर्जी को प्रतीक्षा सूची में डालने का फैसला ले लिया। कमेटी की ओर से यूजीसी और एआईसीटीई से आग्रह किया गया है कि नियमों का कतई न पालने करने वाले और मनमाने तरीके से शैक्षणिक गतिविधियां संचालित करने वाले इस एमिटी विश्वविद्यालय के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि एमिटी को सिर्फ यूपी के केवल एक जिले में अपना कारोबार करने की मान्यता मिली हुई है लेकिन इसके प्रबंधक एमिटी नाम से दुनिया भर में धंधा कर रहे हैं, छात्रों को चूना लगा रहे हैं, मनमाने पैसे वसूल रहे हैं, करियर बर्बाद कर रहे हैं। वर्ष 2005 में बने एमिटी यूनिवर्सिटी एक्ट के अनुसार एमिटी विश्वविद्यालय का न्यायिक क्षेत्राधिकार केवल गौतमबुद्धनगर (नोएडा) जिले तक ही सीमित है और इसे सिर्फ इसी जिले में अपने कोर्स संचालित करने की छूट है। पर एमिटी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर बेंगलोर, लखनऊ, जयपुर और मद्रास में ‘ऑफ कैंपस’ और सिंगावर व इंग्लैंड में ‘ऑफ शोर स्टडी सेंटर’ खोल रखे हैं।

समिति का कहना है कि दलितों-गरीबों-पिछड़ों के बच्चों को सस्ते रेट पर यूनिवर्सिटी में एडमिशन देने की नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। शिक्षक और गैर-शिक्षक स्टॉफ में भर्ती के लिए आरक्षण नीति का पालन नहीं किया जाता। नंबर एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी बनने के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने बैचलर ऑफ फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट एंड एनालिसिस जैसे दर्जनों कोर्स तो शुरू कर दिए पर इन्हें यूजीसी और एआईसीटीई से कोई मान्यता ही नहीं है।

कैंपस में डिस्टेंस लर्निंग सेंटर की स्थापना करके एमबीए, एमसीए आदि दर्जनों प्रोफेशनल डिग्रियां बांटी जा रही हैं जबकि इस सेंटर को शुरू करने के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से यूजीसी-एआईसीटीई-डीईसी की ज्वाइंट कमेटी से मंजूरी नहीं ली गई। यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम तो विशालकाय हैं लेकिन उसमें पढ़ने लायक तत्व बेहद कम हैं। यूनिवर्सिटी में वसूली जाने वाली फीस के लिए कोई पॉलिसी नहीं है। न ही इसमें किसी प्रकार की कोई पारदर्शिता है। सीसीएस यूनिवर्सिटी से जुड़े बाकी लॉ कालेजों में एलएलबी के एक सेमेस्टर के लिए जहां 17 हजार रुपये लिए जा रहे हैं तो एमिटी में यह फीस 50 हजार रुपये प्रति सेमेस्टर है। एआईसीटीई के नियमों को ताक पर रख टेक्नीकल और प्रोफेशनल कोर्सेज में सीटों की संख्या मनमाने तरीके से बढ़ा दी गई है। एमबीए में करीब 800 छात्रों को दाखिला दिया गया, बीटेक बायोटेक में 500 छात्रों को रेग्युलर सीट पर पढ़ाई कराई जा रही है। यूनिवर्सिटी ने आज तक नैक और एनबीए से अपना एक्रीडिशन नहीं करवाया है जबकि यूनिवर्सिटी की गुणवत्ता जांचने के लिए ऐसा करवाना जरूरी है। यूनिवर्सिटी की एक्जीक्यूटिव और एकेडमिक काउंसिल मात्र दिखावटी हैं। इनका शायद ही कभी इस्तेमाल किया जाता हो। यूनिवर्सिटी परिसर में वीसी समेत किसी शिक्षक और गैर-शिक्षक के लिए आवास की कोई व्यवस्था नहीं है।

एमिटी यूनिवर्सिटी की स्थापना के चार साल बाद भी इसकी मल्कीयत रितनंद बलदेव फाउंडेशन के पास है जिसमें एक खास परिवार का दबदबा है। रितनंद बलदेव फाउंडेशन ने एमिटी शब्द को ब्रांडनेम की तरह इस्तेमाल करके देश भर में खुद से जुड़े कॉलेजों, इंस्टीटयूटों और यूनिवर्सिटियों को एमिटी नाम दे दिया है। एक ही कैंपस में एक जैसे मिलते-जुलते नामों वाले इंस्टीटयूट, उदाहरण के तौर पर ‘एमिटी बिजनेस स्कूल’ और ‘एमिटी स्कूल ऑफ बिजनेस’ खड़े कर दिए गए हैं। इससे छात्रों और अभिभावकों में भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

मीडिया हाउसों को भरपूर विज्ञापन देकर मुंह बंद रखने वाले एमिटी प्रबंधन की अराजकताओं और अनियमितताओं का विस्तार से उल्लेख किया है गोवा यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर बीएस सोंदे के नेतृत्व वाली 11 सदस्यीय हाई पॉवर कमेटी ने। इस कमेटी की सिफारिशों पर यूजीसी- एआईसीटीई के लोग क्या कार्रवाई करते हैं, यह तो वक्त बताएगा लेकिन पैसे के बल पर सरकारी संस्थाओं को खरीदने वाले एमिटी प्रबंधन अगर अपने खिलाफ कार्रवाई को फिर से पैसे के बल पर टलवाने में कामयाबी हासिल कर ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस पूंजीवादी व्यवस्था में बाजार के पास हमेशा से इतनी ताकत तो रही ही है कि वह पैसे के बल पर सरकारी नियमों को बदलवा दे या फिर किसी गड़बड़ी के खिलाफ कार्रवाई करने के मुद्दे पर सत्ताधारियों को, सिस्टम को, प्रशासन को चुप्पी साधे रहने को मजबूर कर दे। 

लेखक यशवंत सिंह मीडिया की खबरों के नंबर वन पोर्टल भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक हैं.

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