बेईमानों श्रम अधिकारियों के हाथ मजीठिया की कमान, पत्रकारों का भविष्य अधर में

पत्रकारिता बिगाड़ रही युवाओं का भविष्य… देश में हर गली के कोने पर खुले पत्रकारिता संस्थान और मीडिया ग्रुप देश के युवाओं का भविष्य बिगाड़ रहे हैं। बुरे दौर से गुजर रही पत्रकारिता पर मनो शनीचर सा छा गया है। बड़े संस्थान बिना जुगाड़, रिफ्रेंस के लेना नहीं पसन्द करते तो छोटे संस्थान अठनी वांट कर युवाओं को पत्रकारिता के नशे का आदी बना रहे हैं। आलम ये है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकार खुद के साथ हो रहे अन्याय को नहीं रोक पा रहे है। मीडिया संस्थान पत्रकारिता छोड़ व्यवसाय में जुड़ गए हैं। पत्रकारिता की चका चोन्द में फस कर युवा इस ओर आकर्षित हो रहे है। लेकिन ऊंट के मुंह में जीरे के समान वेतन और बिना लेटर के जोइनिग युवाओं का भविष्य बिगाड़ रहा है। देश में पत्रकारों की दैनीय हालत किसी से छुपी नहीं है। कई संगठन पत्रकार हित की लड़ाई लड़ने का दावा भी करते है ,लेकिन धरातल पर बंजर जमीन के अलावा कुछ नही है। गिने चुने संस्थानों के पत्रकारों के अलावा अन्य मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की हालत भूखे मरने की है। जो ईमान बेच पाये है वही परिवार पाल रहे हैं।

हर साल देश में कई लाख खर्च कर पत्रकारिता पढ़ के अनगिनत युवा विद्यार्थी सड़कों पर आते है। लेकिन संस्थाओं के मालिकों की बदनीयती बढ़ती मंगाई और बेरोजगारी के बीच निष्पक्ष पत्रिकारिता  करने वाले युवाओं का मनोबल तोड़ रहे हैं। कम वेतन और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा इन युवाओं को धीमे जहर की तरह खा रहा है। पत्रकार जगत में 70 प्रतिशत विद्यार्थी आगे भड़ने की उम्मीद से कम वेतन से सुरुआत तो कर लेते हैं। लेकिन मालिकों की संक्रीन सोच न तो इनका वेतन भड़ाते है ह् इनका कद। ऐसे में पत्रकारिता को जीवन यापन का जरिया मानने वालों के सपने धरासाई ही हो रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि छोटे संस्थान मालिक गरीब है, देश में सातवाँ वेतन मान लागू होने के बाद भी सदियों से प्रकाशित स्वतंत्र भारत, आज जैसे अख़बार 3 से 4 हजार में पत्रकारिता करा रहे हैं। जो पत्रकारिता के माहौल और मायनों को बिगाड़ रहे हैं। आधिकारिक तौर पर छोटे संस्थान वेतन खूब दिखा कर टैक्सों में जम कर छूट पाते हैं, लेकिन युवाओं का हनन कर चब्बनी अठनी ही देते है। कुछ जुझारू भाइयों ने लड़ झगड़ कर मजीठिया तो बनवा दिया , लेकिन इस कुंद हथियार को चलाने वाले यौद्धा खुद ही घायल हो रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह है कि अब तक मजीठिया की मांग करने वाले पत्रकार वेरोजगार ही हुए है और अन्य संस्थान नौकरी देने से बच रहे है। बड़ा प्रश्न यह है कि लोग खुल कर अपने अधिकारों की कैसे मांग करें अधिकतर संस्थान जोईनिग का कोई प्रूफ नहीं देते। तो पत्रकार आवाज उठाये भी तो कैसे यूपी में ऐसे कई संस्थान है जो पत्रकारों को सेलरी के नाम पर चन्द अठनी ही पकड़ा रहे हैं। सबसे बड़ी बात आयोग में श्रम विभाग के उन अधिकारियों की भूमिका अहम है जो सरकार की योजनाओं में मंडवाली कर बन्दर बाँट करते हैं। ऐसे में चोर चोरी क्यों रोके, क्यों न उसी का हिस्सा बन जाये।

यूपी में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। मजीठिया की मांग करने वाले पत्रकार को या तो दबाया जा रहा है या हराया जा रहा है। आलम यह है कि जिम्मेदार गुप्त शिकायतों पर कार्रवाई नहीं कर रहे। ऐसी शिकायतों पर जिम्मेदार संस्थान से मोटी रकम वसूल जरूर कर रहे हैं। मजीठिया लागू करने वालों पर एक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि मजीठिया लागू होने से पहले भी मीडिया संस्थानों में श्रम कानून को पैरों तले रौंदा जा रहा था। इन्हीं जिम्मेदारों ने कभी अपना कर्तव्य नहीं निभाया। ऐसे में उन्हीं के हाथ में मजीठिया लागू कराने की कमान सौंपना सरासर बेईमानी हैं।

आशुतोष कुमार शर्मा
मान्यता प्राप्त पत्रकार
लखनऊ उत्तर प्रदेश
9760016202

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