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नक्सली-व्यापारी मेल, गांजे का खेल

नक्सलवादियों का सबसे बड़ा आर्थिक स्रोत बना गांजा : आपरेशन ग्रीन हंट में गांजे की हरियाली बनी मुसीबत : हर साल दस अरब की तस्करी : जस्टिस पीके मोहंती कमीशन का खुलासा : दस हज़ार एकड़ में गांजे की खेती : बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक टीजे लोंग्कुमेर ने भी स्वीकारा : जगदलपुर (बस्तर), छत्तीसगढ़ : बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित वन क्षेत्रों में बसने वाले आदिवासी अगर नक्सलियों से भयभीत होकर उन्हें अपनी झोपड़ी में रात गुजारने की अनुमति दें, या फिर थोड़ी सी रसद उन तक पंहुचा दें तो उन्हें नक्सलियों का सहयोगी करार देकर प्रताड़ना दी जाती है और सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है. परन्तु नक्सलियों की शह पर उगाये जाने वाले 10 हज़ार एकड़ की गांजे की फसल को अरबों रुपये में तब्दील कर उन्हें आर्थिक मदद पहुंचा रहे प्रभावशाली लोग अपने पैसे और राजनीतिक पहुंच के कारण आज भी पुलिस की पहुंच से काफी दूर हैं.

नक्सलवादियों का सबसे बड़ा आर्थिक स्रोत बना गांजा : आपरेशन ग्रीन हंट में गांजे की हरियाली बनी मुसीबत : हर साल दस अरब की तस्करी : जस्टिस पीके मोहंती कमीशन का खुलासा : दस हज़ार एकड़ में गांजे की खेती : बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक टीजे लोंग्कुमेर ने भी स्वीकारा : जगदलपुर (बस्तर), छत्तीसगढ़ : बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित वन क्षेत्रों में बसने वाले आदिवासी अगर नक्सलियों से भयभीत होकर उन्हें अपनी झोपड़ी में रात गुजारने की अनुमति दें, या फिर थोड़ी सी रसद उन तक पंहुचा दें तो उन्हें नक्सलियों का सहयोगी करार देकर प्रताड़ना दी जाती है और सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है. परन्तु नक्सलियों की शह पर उगाये जाने वाले 10 हज़ार एकड़ की गांजे की फसल को अरबों रुपये में तब्दील कर उन्हें आर्थिक मदद पहुंचा रहे प्रभावशाली लोग अपने पैसे और राजनीतिक पहुंच के कारण आज भी पुलिस की पहुंच से काफी दूर हैं.

बस्तर से लगे उड़ीसा के मलकानगिरी जिले से हर साल 10 अरब रुपये का गांजा बस्तर के रास्ते होता हुआ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के बाद नेपाल और पकिस्तान जैसे देशों को भेजा जा रहा है. देश के एक बड़े हिस्से में फैल चुकी नक्सलवाद की आग को इन रुपयों से हवा मिल रही है और नक्सलवादी इन रुपयों से गोला बारूद और सरकार की बर्बादी का सामान खरीद रहे हैं.

जस्टिस पी.के. मोहंती कमीशन की रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद भी दोनों प्रदेशों की सरकारों ने सबक नहीं लिया और न ही इस पूरे संगठित ड्रग माफिया पर अंकुश लगाने का प्रयास किया. कभी-कभार 10-15 क्विंटल गांजे  की तस्करी करने वाले छोटे-मोटे तस्करों को पकड़ कर पुलिस अपनी पीठ थपथपाती रही है मगर मलकानगिरी के चित्रकोंडा और कालीमेला में लहलहाती गांजे की फसल तक बीज, कृषि उपकरण और नकद सहायता पहुँचाने वाले और नक्सलवादियों की सहायता से उसे बाहर निकाल कर देश के कोने-कोने तक पहुंचाने वाले बड़े तस्करों तक पुलिस अब तक नहीं पहुंच सकी है.

मोहंती कमीशन की रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है कि मलकानगिरी में नक्सली संरक्षण में हो रहे इस अरबों के कारोबार में समीपवर्ती बस्तर और आंध्र के करीमनगर के कुछ पूंजीपति शामिल हैं. सूत्रों के अनुसार करीमनगर, जगदलपुर और रायपुर से संचालित होने वाली इस तस्करी से नक्सलियों और और इन पूंजीपतियों को करोड़ों का मुनाफा हो रहा है. इतना ही नहीं, बस्तर और रायपुर के कुछ प्रभावशाली पूंजीपति इन इलाकों में हजारों एकड़ में अधिया पर गांजे की खेती करवाते रहे हैं. चित्रकोंडा-कालीमेला के गुन्थवाडा, नालिगुनठी, पाप्लूर और मनाम्कोंदा जैसे गावों में राजस्व और वन भूमि में एक हज़ार से अधिक परिवार इस खेती के माध्यम से नक्सलियों और तस्करों की चाकरी कर रहे हैं. इन परिवारों से ये गांजा नक्सलियों तक पहुंचता है और नक्सलियों से 500-700 रुपये प्रति किलो की दर से तस्करों द्वारा इसे खरीदा जाता है. इसे ये तस्कर तीन से चार हज़ार रुपये की दर पर देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचा रहे हैं. मलकानगिरी से सुकमा ,तोंगपाल जगदलपुर होते हुए रोजाना सैकड़ों क्विंटल गांजा उत्तर भारत की और भेजा जा रहा है.

कभी आलू से भरे ट्रकों में, कभी संतरों से भरे ट्रकों में गांजा जगदलपुर से होकर बाहर निकल रहा है. गत दिनों दंतेवाडा जिले के तोंगपाल और बस्तर के कोंडागांव और केशकाल में करोड़ों का गांजा परिवहन के दौरान पकड़ा गया और हर बार बस्तर के एक बड़े पूंजीपति का नाम आने पर करीमनगर के एक रहस्यमयी व्यक्ति की मध्यस्थता से इस पूंजीपति का नाम उजागर होने से रोक लिया गया. नाम उजागर न करने की एवज में लाखों के लेनदेन की चर्चा भी सुनी गयी परन्तु करोड़ों की तस्करी का ये सिलसिला आज तक जारी है. लोग परदे के पीछे से नक्सलियों की मदद से और उनको मदद पहुंचाते हुए तस्करी के इस धंधे को बदस्तूर कायम रखे हुए हैं.

साउथ एशिया इंटेलिजेंस रिव्यू के साप्ताहिक विश्लेषण में इंस्टीट्यूट फॉर कोंफिक्ट मैनेजमेंट के रिसर्च असिस्टेंट प्रशांत कुमार प्रधान ने लिखा है की 10 हज़ार एकड़ में होने वाली ये गांजे की फसल नेपाल और पाकिस्तान तक भेजी जा रही है. बस्तर के रास्तों और बस्तर के लोगों द्वारा होने वाली इस अरबों की तस्करी से मिलने वाली रकम से देश में फैले माओवाद को भरपूर मदद मिल रही है. पहले पहल नक्सलियों ने क्षेत्र के व्यापारियों को डरा धमाका कर गांजा बेचा, पर अब इसमें हो रहे करोड़ों के मुनाफे की लालच में लोग स्वेच्छा से नक्सलियों की साझेदारी में ये काम करने लगे हैं. ओपरेशन ग्रीन हंट के दबाव के चलते नक्सली अब गांजे के बदले रुपयों की जगह, हथियार और गोलियों की मांग करने लगे हैं. बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक टी.जे. लोंग्कुमेर ने भी गत दिनों एक पत्रकार वार्ता में इस बात को स्वीकारा है.

छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के घने जंगलों के बीच बहने वाली सिलेर और शबरी नदी के किनारों पर स्थित, इन दुर्गम भीमकाय पहाड़ों पर सुरक्षा बलों और पुलिस की दखलंदाजी नहीं के बराबर है. इसके चलते ये इलाका नक्सलियों और तस्करों का स्वर्ग बना हुआ है. इन्ही इलाकों से नक्सलियों को बीज, कृषि उपकरण, भारी मात्रा में नकदी और हथियार पहुचाये जा रहे हैं. नक्सलियों तक ज़रूरत के सामानों को पहुंचने से रोकना, उनके लिए आर्थिक नाकेबंदी करना, ये सब कुछ सरकार के नुमाइंदे कहते रहे हैं, परन्तु माओवादियों तक गांजे के बदले पहुंचने वाली अरबों की रकम और इस रकम को उन तक पहुंचाने वाले ये सफ़ेदपोश अब भी पुलिस की पहुंच से मीलों दूर हैं.

लेखक देवशरण तिवारी जगदलपुर के हिंदी दैनिक चैनल इंडिया के प्रबंध संपादक हैं.

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