क्या ईश्वरीय सत्ता को विज्ञान के सहारे जाना जा सकता है?

संसार के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों में शामिल ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन विलियम हॉकिंग ने कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में कहा कि विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि ईश्वर जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं है। माना कि स्टीफन हॉकिंग अंतरिक्ष विज्ञान के एक अच्छे ज्ञाता हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं है कि वे अध्यात्म जैसे अति सूक्ष्म अन्तर्विज्ञान की भी जानकारी रखते हैं और वे इस पर अधिकृत रूप से कुछ भी कह सकने में सक्षम हैं। इसलिए ब्लैक होल पर किये अपने अनुसंधान तथा डॉक्टरेट वाले स्टीफन हॉकिंग का ईश्वरीय सत्ता के विषय में इस तरह की बात करना तो ऐसा है, जैसे प्राइमरी स्कूल का कोई छात्र हॉकिंग को अंतरिक्ष विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करे।

जिनेवा के निकट स्विट्जर्लेंड तथा फ्रांस की सीमा पर 10 अरब डॉलर की लागत से धरती के 175 मी. नीचे 27 किमी. लंबी ‘लार्ज हैड्रॉन कॉलाइडर’नामक एक गोलाकार बनाई गई सुरंग में 4 जुलाइ, 2012 को 115 देशों के 10,000 से भी अधिक वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अनुसंधान में इस ब्रह्मांड के मूल कण-‘हिग्स बोसोन’को वैज्ञानिकों द्वारा तैयार कर लिए जाने के दावे किये गये थे। जिसे संचार माध्यमों ने ‘गॉड पार्टिकल’अर्थात् ब्रह्म कण (बिन्दु) कहना प्रारंभ किया। इस उपलब्धि के बाद वैज्ञानिक जगत में यह चर्चा जोरों पर चली कि इस ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाला ईश्वर नहीं, बल्कि यह ‘हिग्स बोसोन’ही है। इसके साथ ही यदा-कदा यह दावे भी किये जाने लगे कि ईश्वर जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है। उसी शृंखला में स्टीफन हॉकिंग का वक्तव्य भी है।

यदि गहराई से विचार कर देखा जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि विज्ञान कभी भी अंतिम सत्य तक नहीं पहुँच सकता; क्योंकि जो बात एक अरब प्रयोगों से सही सिद्ध हो चुकी हो, वह अगले प्रयोग में गलत साबित हो सकती है। ऐसा अब तक अनेक बार हो चुका है और यह निर्विवाद है कि कोई भी वैज्ञानिक तथ्य तभी तक मान्य होता है, जब तक कि उसे किसी दूसरे तर्क, सिद्धांत तथा प्रमाण द्वारा काट नहीं दिया जाता अथवा उससे भी एक कदम आगे बढ़कर नये तथ्य प्रस्तुत नहीं कर दिये जाते।

विज्ञान सदैव कल्पनाओं व मान्यताओं के सहारे अपनी खोज प्रारंभ कर कब, क्यों, कैसे आदि प्रश्नों का तर्क-संगत उत्तर ढूंढ निकालता आया है। यह भी सत्य है कि संसार में अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियां अकस्मात् ही हासिल हुई हैं। फिर भी भौतिक अनुसंधान अथवा वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए यथोचित सामग्री, उपकरणों तथा अनुकूल वातावरण के अलावा कुछ नियमों, सिद्धांतों, क्रिया-विधियों, धैर्य व संयम के पालन की अनिवार्यता होती है। लेकिन पता नहीं क्यों निरे भौतिक दृष्टिकोण वाले लोग इन सबकी अनिवार्यता आध्यात्मिक साधना के लिए नहीं समझते। यहाँ उन्हें फटाफट मनमाना परिणाम चाहिए।

इसी तरह आध्यात्मिक क्षेत्र की अनुभूतियों को प्राप्त करने के लिए भी साधक को उचित वातावरण तथा अन्य तैयारियां करनी पड़ती हैं। जिनका सम्बंध भौतिक संसाधनों से नहीं वरन् भाव-जगत से है; क्योंकि यह प्रयोग व्यक्ति की भौतिक साक्ष्यविहीन प्राणिक ऊर्जा से भी अति सूक्ष्म चेतना के प्रकटीकरण से सम्बंधित है। आत्मानुसंधान का ऐसा महत्वपूर्ण कार्य किसी भी प्रकार के मनोविकारों के रहते नहीं हो सकता। यहाँ तक कि मनुष्य के मन की चंचलता भी इसमें बाधक है। जब तक मन का केन्द्रीकरण नहीं होगा, तब तक अभिलषित परिणाम मिल ही नहीं सकते। उत्कट इच्छा-शक्ति, ज्ञानोपदेश, तन्मयता, गुरु व ज्ञान के प्रति श्रद्धा, निरंतर साधना आदि जैसी अनिवार्यताओं के फलस्वरूप ही साधक को अपने हृदय में ईश्वर का साक्षात्कार होता है। अब यदि स्टीफन हॉकिंग जैसा कोई वैज्ञानिक ईश्वर को कोरे तर्क-वितर्क से या वैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर जानने-समझने का प्रयत्न करे, तो इसे सिवाय नासमझी के और क्या कहा जा सकता है।

ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व को लेकर सहस्राब्दियों से ज्ञानी आचार्यों तथा विद्वानों के मध्य होते आये तर्क-वितर्कों के फलस्वरूप अनेक प्रकार के विचार सामने आये और आगे भविष्य में भी आते ही रहेंगे, परन्तु यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के तथाकथित भौतिक विकास की वृद्धि के साथ-साथ उसकी चेतना का प्रवाह भी उसी गति से बहिर्मुख होता गया है। स्थिति आज यहाँ तक आ पहुँची है कि अधिकांश पढ़े-लिखे व्यक्ति परमात्मा के अस्तित्व को नकारने में अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं। जबकि ईश्वर को भौतिक इन्द्रियों, उससे भी सूक्ष्म मन तथा बौद्धिक चिंतन के माध्यम से कदापि नहीं जाना अथवा समझा जा सकता है, क्योंकि वह इनसे भी अधिक सूक्ष्म है। धर्म के मामले में आधुनिक मनुष्य अधिक पाखंडी होने के कारण विभिन्न धर्म-प्रवर्तकों को ईश्वरीय प्रतिनिधि अथवा अवतारी महापुरुष तो मान लेता है किन्तु उनकी शिक्षाओं तथा अनुभवों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं होता।

इसी कारण कुछ निरे भौतिकवादी दृष्टि वाले व्यक्ति कह सकते हैं कि आत्मा-परमात्मा का अस्तित्व है ही नहीं। जबकि प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित यह आत्मा इतना अधिक सूक्ष्म है कि इसे किसी भौतिक साधन से नहीं मापा जा सकता। अतः निःसंदेह व्यष्टिरूप आत्मा समष्टिरूप परमात्मा के साथ हृदय में स्थित है इसीलिए समस्त शारीरिक गतिविधियों की शक्ति यहीं से उद्भूत होती है। जो लाल रक्तकण फेफड़ों से सारे शरीर में ऑक्सीजन ले जाते हैं, वे हृदय-स्थित आत्मा से ही शक्ति प्राप्त करते हैं और जब आत्मा इस स्थान को छोड़ देता है तभी रक्तोत्पादक संलयन (Fusion) बंद हो जाता है। आधुनिक औषधि विज्ञान लाल रक्तकणों की महत्ता स्वीकार करते हुए यह अवश्य मानता है कि शरीर की संपूर्ण शक्ति का उद्गम-स्थल हृदय है; परंतु वह यह निश्चत नहीं कर पाता कि शक्ति का स्रोत आत्मा है। हृदय-स्थित आत्मा के तेजोमय स्वरूप की आंशिक तुलना सूर्य-रश्मियों से की जा सकती है।

इस प्रकार अणु-परमाणुओं से भी अत्यंत सूक्ष्म परमचैतन्य परब्रह्म से उद्भूत, उसी में स्थित और अंततोगत्वा उसमें ही विलीन हो जाने वाली इस सकल सृष्टि तथा इसके रचयिता परमेश्वर के रहस्य को तत्ववेत्ता ऋषियों ने किसी बाह्य भौतिक प्रयोगशाला में नहीं बल्कि अपनी हृदय-गुहा में बहुत गहरे पैठ कर अनुभव किया। उनकी ही आभ्यांतरिक अनुभूतियों से शेष विश्व को ज्ञात हो सका कि इंन्द्रियजन्य अनुभव के द्वारा इस रहस्य को कदापि नहीं जाना जा सकता। संपूर्ण ब्रह्मांड एकमेव परमसत्ता परमब्रह्म से प्रकट हुआ है और समस्त प्राणीमात्र में केवल मनुष्य ही उसका साक्षात्कार अपने अंतःकरण में कर सकता है। आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया एक तरह से अत्यधिक जटिल है; परंतु दुरूह होते हुए भी संकल्पवान साधकों के लिए अति सहज और सामान्य है। कबीर के शब्दों में ‘जिन ढूँढा तिन पाइंया, गहरे पानी पैठि’।।

अनेक उदाहरणों से पुरातन भारतीय वाङ्मय भरा पड़ा है जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि परब्रह्म परमेश्वर अणु-परमाणुओं से भी अत्यंत सूक्ष्म तथा महत् से भी महानतम—‘अणोरेणीयान महतो महीयान’ है। वैदिक काल के तत्ववेत्ता ट्टषि-महर्षियों ने अपने आत्मानुभव के आधार पर यह प्रतिपादित किया कि ईश्वर का प्रत्यक्षीकरण हृदय-गुहा में भावपूर्वक बहुत गहरे उतर कर ही संभव है। उसके लिए ‘प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्’तक कहा गया। इतना स्पष्ट निर्देश होने पर भी यदि मनुष्य इस ऋषिवाणी को हृदयंगम कर अपनाने की बजाय उसे तर्क-कुतर्क अथवा वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सत्यापित करने का व्यर्थ श्रम करे तो इसे किसी भी तरह समझदारी नहीं कहा जायेगा। जब यह स्पष्ट है कि ईश्वरीय सत्ता इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि की पहुँच से सर्वथा परे है, तो फिर उसे जानने-समझने के लिए इन बाह्य साधनों का आश्रय लेना बालहठ जैसा ही कहा जायेगा।

इसलिए, आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपने अंतःकरण में ऐसी भावभूमि तैयार करें जिसमें आत्मज्ञान का बीज अंकुरित और फूल-फल सके, हमारे अंदर-बाहर सर्वत्र आत्म-ज्योति का प्रकाश फैल सके। हम अपने जीवन को सार्थक बना सकें तथा यह समझ सकें कि परब्रह्म परमात्मा परमानन्द का अजस्र स्रोत है जिसको भौतिक संसाधनों, इन्द्रियजन्य अनुभूतियों अथवा आंतरिक संवेगों के माध्यम से कदापि नहीं जाना जा सकता है और न ही उसे वैज्ञानिक विश्लेषणों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

लेखक श्यामसिंह रावत की प्रकाशनाधीन पुस्तक—‘मृत्योर्मा अमृतं गमयः’ के प्राक्कथन पर आधारित. संपर्क : [email protected]

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