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कांशीराम ने तब नरेंद्र मोहन की बेटी मांगी थी, अब इनको दयाशंकर सिंह की बेटी बहन दोनों चाहिए

भाजपा के दयाशंकर सिंह ने मायावती के लिए जो कहा, निश्चित रूप से आपत्तिजनक है। किसी भी सूरत उसे जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। लेकिन जो अभी कुछ दिन पहले से दुर्गा को सेक्स वर्कर कहा जाने लगा है वह भी किसी सूरत सही नहीं है। सहमति या असहमति की बात अलग है लेकिन मर्यादा तो सभी की होती है। लेकिन इस मुद्दे पर एक खास पाकेट के लोग न सिर्फ़ खामोशी अख्तियार करते हैं बल्कि इस का भरपूर मज़ा भी लेते हैं। इस मानसिकता की भी पड़ताल ज़रूरी है। क्यों कि दोनों ही सूरत शर्मनाक है। हालां कि यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि चुनाव कोई भी हो मायावती पैसे ले कर ही अपनी पार्टी का टिकट किसी को देती हैं। यह बात इतनी बार, इतने सारे  लोग, कितने सारे तरीके से कह चुके हैं कि वह बेहिसाब है। दयाशंकर सिंह ने भी उसी बात को दुहराया है। लेकिन उन का बात करने का तरीका निहायत ही गंदा और शर्मनाक है। देखिए क्या है कि महाभारत में दुर्योधन की मांग कहीं से भी नाज़ायज़ नहीं थी कि अगर मेरा बाप अंधा था तो इस में मेरा क्या कसूर ? लेकिन दुर्योधन के लाक्षागृह जैसे तरीके गलत थे। इसी लिए वह खलनायक  हो गया। दयाशंकर सिंह यहीं दुर्योधन हो गए। नहीं अभी-अभी कुछ दिन पहले ही यही आरोप स्वामी प्रसाद मौर्य और आर के चौधरी भी बसपा छोड़ते समय लगा गए हैं मायावती पर। लेकिन तब  इस बात पर हंगामा नहीं हुआ। क्यों कि यह तथ्य था और रूटीन भी। लेकिन दयाशंकर सिंह मां को बाप की बीवी कह गए। सच कहा लेकिन सच कहने की मर्यादा भूल गए।

भाजपा के दयाशंकर सिंह ने मायावती के लिए जो कहा, निश्चित रूप से आपत्तिजनक है। किसी भी सूरत उसे जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। लेकिन जो अभी कुछ दिन पहले से दुर्गा को सेक्स वर्कर कहा जाने लगा है वह भी किसी सूरत सही नहीं है। सहमति या असहमति की बात अलग है लेकिन मर्यादा तो सभी की होती है। लेकिन इस मुद्दे पर एक खास पाकेट के लोग न सिर्फ़ खामोशी अख्तियार करते हैं बल्कि इस का भरपूर मज़ा भी लेते हैं। इस मानसिकता की भी पड़ताल ज़रूरी है। क्यों कि दोनों ही सूरत शर्मनाक है। हालां कि यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि चुनाव कोई भी हो मायावती पैसे ले कर ही अपनी पार्टी का टिकट किसी को देती हैं। यह बात इतनी बार, इतने सारे  लोग, कितने सारे तरीके से कह चुके हैं कि वह बेहिसाब है। दयाशंकर सिंह ने भी उसी बात को दुहराया है। लेकिन उन का बात करने का तरीका निहायत ही गंदा और शर्मनाक है। देखिए क्या है कि महाभारत में दुर्योधन की मांग कहीं से भी नाज़ायज़ नहीं थी कि अगर मेरा बाप अंधा था तो इस में मेरा क्या कसूर ? लेकिन दुर्योधन के लाक्षागृह जैसे तरीके गलत थे। इसी लिए वह खलनायक  हो गया। दयाशंकर सिंह यहीं दुर्योधन हो गए। नहीं अभी-अभी कुछ दिन पहले ही यही आरोप स्वामी प्रसाद मौर्य और आर के चौधरी भी बसपा छोड़ते समय लगा गए हैं मायावती पर। लेकिन तब  इस बात पर हंगामा नहीं हुआ। क्यों कि यह तथ्य था और रूटीन भी। लेकिन दयाशंकर सिंह मां को बाप की बीवी कह गए। सच कहा लेकिन सच कहने की मर्यादा भूल गए।
लेकिन भारतीय राजनीति में यह गाली गलौज कोई नई बात नहीं है।  राजनीति में इस गाली गलौज की शुरुआत भी बसपा ने ही की है। बसपा के संस्थापक कांशीराम और आज की उस की मुखिया मायावती ने ही की है। तो जो बोया है, वह काटना भी पड़ेगा। याद कीजिए वह अस्सी-नब्बे  का दशक। जब   तिलक, तराजू और तलवार, इन को मारो जूते चार! जैसे जहरीले और नीचता भरे नारों के दिन थे। गांधी को शैतान की औलाद कहने के जहरबुझे  दिन थे वह। उस गांधी को शैतान की औलाद कहा जा रहा था जिसे दुनिया पूजती है। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है कि एक बार दैनिक जागरण, लखनऊ  ने मायावती की ही पार्टी के एक पूर्व मंत्री रहे और बनारस के दलित नेता दीनानाथ भास्कर के इंटरव्यू के मार्फत छापा था कि मायावती विवाहित हैं और कि उन के एक बेटी भी है। उन का पति एक सिपाही है। आदि-आदि। इस इंटरव्यू के छपने के कुछ दिन बाद लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में बसपा कि एक रैली हुई। इस रैली में कांशीराम ने इस मुद्दे पर जितना भला बुरा कहना था कहा। और अचानक समूची भीड़ से कांशीराम ने आह्वान किया कि चलो दैनिक जागरण का दफ्तर घेर लो। तब दैनिक जागरण का दफ्तर लखनऊ के हज़रतगंज बाज़ार में जहां अब तेज कुमार प्लाजा है के पहले ही था, ठीक कोतवाली के सामने। अब कोतवाली तोड़ कर पार्किंग बना दी गई है।

खैर पगलाई भीड़ ने पूरे हज़रतगंज बाज़ार को जिस तरह बंधक बना लिया, वह तो शर्मनाक था ही। उस से भी ज़्यादा शर्मनाक था, काशीराम का अपनी जांघ ठोक-ठोक कर माइक पर बार-बार बहुत अश्लील ढंग से यह कहना कि नरेंद्र मोहन की बेटी लाओ! इस से कम पर बात नहीं होगी। नरेंद्र मोहन तब दैनिक जागरण के स्वामी और संपादक थे। अब वह दिवंगत हैं। तब वह कोहराम कोई तीन चार घंटे चला। और कांशीराम का वह अश्लील नारा भी कि नरेंद्र मोहन कि बेटी लाओ! इस पूरी कवायद में मायावती उन के साथ थीं। दैनिक जागरण दफ्तर के सभी कर्मचारी तब दफ्तर छोड़ कर भाग गए थे। जो दो-चार लोग मिले भी वह लोग बुरी तरह पीटे गए थे। लहूलुहान हो गए थे। पुलिस के हाथ पांव तब फूल गए थे। लगभग असहाय सी थी। सारा प्रशासन हाथ बांधे मूक दर्शक बना खड़ा था।

बाद के दिनों में मायावती मुख्य मंत्री बनीं तो अजब यह हुआ कि सब से पहला इंटरव्यू उन का दैनिक जागरण में ही छपा। उसी दैनिक जागरण में जिस के मालिक नरेंद्र मोहन की बेटी कांशीराम मांग रहे थे माइक पर चीख – चीख कर। उसी दैनिक जागरण में जिस में कभी बतौर मुख्य मंत्री मुलायम सिंह की  एक फोटो छपी थी जिस में कांशीराम और मायावती के सामने कान पकड़े मुलायम झुके हुए खड़े थे। जिस के प्रतिकार में मुलायम के समाजवादी कार्यकर्ताओं ने गेस्ट हाऊस कांड किया। मायावती को मारने कि कोशिश में उन के कपड़े फाड़ दिए थे। उन की जान पर बन आई थी। लोकसभा में अगर अटल बिहारी वाजपेयी ने उसी दिन यह मामला उठा कर मायावती की जान न बचाई होती तो शायद तब वह इतिहास के पृष्ठों में समा गई होतीं। खैर, जातीय राजनीति के ऐसे कई दागदार पृष्ठ भरे पड़े हैं। किन-किन को पलटा जाए ? उत्तर प्रदेश विधान सभा में हुई सपा बसपा भाजपा की खूनी लड़ाई क्या  लोग भूल गए हैं ?

लेकिन आज फिर जैसे इतिहास अपने को दुहरा रहा है। लखनऊ के उसी हज़रतगंज में बसपा की मजलिस सजी हुई है। और जिस तरह से गाली-गलौज हो रही है खुले आम माइक पर वह अचरज में नहीं डालता। दयाशंकर सिंह कि बहन और बेटी मांग रहे हैं, बहन जी के कार्यकर्ता। कांशीराम की याद आ रही है। कांशीराम ने बार-बार अपनी दोनों जांघ ठोक – ठोक कर कहा था, नरेंद्र मोहन की बेटी लाओ! इस से कम पर बात नहीं होगी। आज लखनऊ के हज़रतगंज में कई कांशीराम आ गए हैं। यह सारे कांशीराम दयाशंकर सिंह की बेटी बहन दोनों मांग रहे हैं। आज की राजनीति में ईंट का जवाब पत्थर शायद इसी को कहते हैं। यह पत्थर अभी और आएंगे।  पुलिस और प्रशासन के हाथ-पांव तब भी फूल गए थे, आज भी फूल गए हैं। वोट की गंगा में बह कर राजनीति तेरी बोली गंदी हो गई!  तिलक, तराजू और तलवार, इन को मारो जूते चार! की राजनीति के पड़ाव अभी और भी हैं। कुतर्क की राजनीति की आग अभी और भी है।

जो भी हो जाने-अनजाने दयाशंकर सिंह ने जाने-अनजाने बसपा को संजीवनी बूटी दे दी है।  जिस बसपा की  सांस उखड़ रही थी, लोकसभा में शून्य हो गई थी, जिस बसपा से दलित अब छिटक कर भाजपा में शिफ़्ट  हो रहे थे अब वह बसपा में बने रह सकते हैं। मायावती और बसपा को दिल ही दिल कृतज्ञ होना चाहिए। भाजपा को तो वह तार-तार कर ही गए हैं। भाजपा दयाशंकर सिंह के मूर्खता भरे इस एक बेशर्म बयान द्वारा दिया यह घाव बहुत जल्दी नहीं भूल पाएगी। फ़िलहाल यह घाव कोई एंटीबायोटिक भी नहीं सुखा पाएगी।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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