दयाशंकर को मिली गालियों से किसका फायदा?

मनीष कुमार

टीवी पत्रकार

जिस वजह से बसपा सुप्रीमो मायावती त्राहि त्राहि कर रही हैं, वैसी ही स्थिति जब दयाशंकर के लिए पैदा हुई तो वो मन ही मन खुश हो रही होंगी. भाजपा के उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर पर जवाबी हमला करते हुए जिस तरह बसपाईयों ने लखनऊ के बीच चौराहे पर उन्हें गालियां दीं, समाज दयाशंकर की करतूत की ही तरह भले ही इसे भी निन्दनीय बता रहा है लेकिन, मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं की इस करतूत को सही ठहराया है. तभी तो उन्होंने कहा कि वो कार्यकर्ताओं के लिए देवी स्वरूपा हैं और उनके अपमान पर ऐसी प्रतिक्रिया हुई है. जाहिर है मायावती ने न सिर्फ दयाशंकर को दी गयी गालियों को सही ठहराया है बल्कि अब तो ये आरोप लगने लगे हैं कि ये सबकुछ उन्हीं के निर्देशों पर हुआ है. 

लेकिन, महत्वपूर्ण बात ये है कि जहां मायावती एक तरफ तो अभद्र व्यवहार की निन्दा कर रही हैं लेकिन दूसरी तरफ वैसे ही व्यवहार का समर्थन क्यों कर रही हैं. असल में तल्ख भाषा बसपा की राजनीति का एक अहम हिस्सा है या यूं कहें कि सबसे महत्वपूर्ण. याद करिये वो दौर जब बसपा ने ही सवर्णों के लिए नारा दिया था “तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार “. इस नारे से ब्राह्मणों ठाकुरों और व्यापारी वर्ग पर तीखा प्रहार किया गया था. बसपा के राजनीति में उदित होने से पहले के दौरे पर विचार करें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि मायावती की भाषा में इतनी तल्खी क्यों हैं. हम सबको या तो एक दौर याद है या फिर पढ़ने सुनने को मिलता है कि समाज में दलितों की स्थिति क्या था. वे समाज में अछूत तो थे ही गालियां भी उनके लिए बेहद सामान्य सी घटना थी जो उनके जीवन में रची बसी थी. इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज में ठाकुरों, ब्राह्मणों और व्यापारियों का दबदबा था. जाहिर तौर पर इन्हीं तीन जातियों से समाज का सबसे निचला तबका सबसे ज्यादा पीड़ित था. फिर वो दौर आया जब राजनीति ने करवट लेनी शुरु की. बहुजन समाज पार्टियों के लिए राजनीति में जगह भी समाज के इन्हीं तीन जातियों द्वारा शोषण के द्वारा पैदा हुआ. अब बसपा के नेताओं के लिए जरूरी ये था कि वे समाज में सबसे ज्यादा डरे हुए लोगों में साहस फूंक सके. इसके लिए जरूरी  था कि जिससे वे डरते थे उन्हें डराया जाये. या डराया भी न जा सके तो कम से कम ये संदेश तो दिया ही जाये कि उनमें उन्हें डराने की क्षमता है. इसी मूल भावना के तहत ही मायावती हमेशा तल्ख नजर आती हैं. उनके शासनकाल में कुण्डा के रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को तरह तरह से घेरने की उनकी रणनीति भी असल में इसी भावना के तहत मानी जाती है.

अब समझिये भाजपा के उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह के एपिसोड पर. दयाशंकर सिंह एक सवर्ण नेता हैं. जोश में आकर जब उन्होंने मायावती को गालियां बक दीं तो बसपा का जवाब में गालियां देना उसकी रणनीति के हिसाब से बिल्कुल सही कदम है. समाज भले ही इसकी निन्दा करे लेकिन, मायावती इससे खुश होंगी. कारण कई हैं. पहला और सबसे बड़ा तो ये कि भाजपा की दलितों में सेंधमारी को रोकने में मदद मिलेगी या काफी हद तक मिल भी चुकी है. अब किस मुंह से भाजपा के नेता दलितों की झोपड़ी में बैठकर खाना खाने का स्वांग रचेंगे ?? लोकसभा के चुनाव के बाद ये विश्लेषण किया गया कि बड़ी संख्या में दलित बसपा से टूटकर भाजपा में चले गये जिससे उसकी इतनी बड़ी जीत और बसपा को एक भी सीट नहीं मिली. सम्भावित तौर पर दलितों का एक हिस्सा भाजपा के साथ हो भी चला था तो इस घटना के बाद अब बसपा उन्हें ये तो समझा ही चुकी है कि बसपा के अलावा दूसरी पार्टियों में दलितों के प्रति नेताओं की कैसा भावना है. बसपा ये बता रही है कि भाजपा दलितों को लाख खीर खिलाये लेकिन, उसकी नीयत वो खीर जूते में ही रखकर खिलाने की है और समय समय पर इसके उदाहरण भी आते रहते हैं.

दूसरा बड़ा कारण ये कि मायावती को ये संदेश देना था कि सत्ता से दूर रहने के बावजूद उन्हें कोई “ऐरा गैरा नत्थू खैरा” ना समझे. वो जिस तल्खी से सत्ता में होने के बाद अपने विरोधियों पर हमले करती हैं सत्ता में न होने के बाद भी उनमें ये तेवर बरकरार है. जरा सोचिये… मायावती को गाली दी गयी और वो चुप रह जातीं तो समाज के उस नीचले तबके के लोगों के दिलों में कैसा अंधेरा घर कर जाता. उनके दिल में तो यही अंधेरा घर कर जाता कि जब उनकी नेता को ही गाली दी गयी और बोलने भी नहीं दिया गया तो हमारा तो गांव में रहना भी मुश्किल हो जायेगा. चुनाव के मौसम में ये भावना बसपा के लिए और खतरनाक होती लेकिन, लखनऊ के हजरतगंज में बसपाईयों द्वारा गाली गलौज के बाद ये भावना पैदा ही नहीं होगी. लोकसभा के चुनाव के उलट विधानसभा में वोटबैंक के बिखरने का खतरा शून्य……

मायावती की चाल रणनीतिक रूप से बिल्कुल सटीक है. समाज के एक बड़ा तबका जिसमें बुद्धीजीवी, पत्रकार, लेखक शामिल हैं,भले ही वे निन्दा करें या ये कहें कि खेल पलटता जा रहा है लेकिन, वाकयी में ऐसा है नहीं. इस घटना के बाद ये भी सुनने में आया कि बसपाई तो तभी सड़कों पर निकलते हैं और उग्र प्रदर्शन करते हैं जब मामला मायावती से जुड़ा होता है. अपने पक्ष में रीता बहुगुणा जोशी के घर में आगजनी का उदाहरण दिया जा रहा है जब रीता के बयान पर भी ऐसा ही उबाल आया था. (बयान ये था कि सरकार में रहते हुए मायावती ने बलात्कार पीड़िता के लिए मुआवजे का एलान किया था. कानून व्यवस्था के मुद्दे पर बसपा सरकार को घेरते हुए रीता बहुगुणा जोशी ने ये बयान दिया था कि यदि मुआवजे ही सबका हल है तो हो जाये मायावती का बलात्कार पांच करोड़ रूपया मुआवजा मैं दूंगी- जो मुझे याद आ रहा है). लेकिन इसकी निन्दा करने वाले बसपा के मतदाता नहीं है और ये मायावती बखुबी समझती हैं.

इस पूरे घटनाक्रम से बसपा अपने को फायदे में देख रही है और खुसी से फूले नहीं समा रही है लेकिन, एक और तबका है जो मन ही मन बेहद खुस हो रहा होगा. इस पूरे एपिसोड से भाजपा के अध्यक्ष या दूसरे नेता भी मन ही मन खुश हो रहे होंगे कि उन्हें बेमन से अब दलितों के घर खाना नहीं खाने जाना पड़ेगा………लेकिन, एक सवाल बड़े परिदृश्य पर उठा है या इसे उठाया जाना चाहिए. नेताओं के लिए एक आचार संहिता है लेकिन, क्या जनता के लिए कुछ भी नहीं. जिस भाषा के लिए नेता जेल जाता है वैसी ही भाषा आम आदमी बोल के निकल जाता है, क्या उसे कानून के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए?

लेखक मनीष कुमार लखनऊ के टीवी पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9336622973 के जरिए किया जा सकता है.

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