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मीडिया मंथन

दाम खाकर दुम हिलाती मीडिया

मेरे खिलाफ लिखना मना है‘, कुछ दिनों पहले चौथी दुनिया के समन्वय संपादक डॉ. मनीष कुमार ने जब अपनी पत्रिका में पूरे प्रमाण के साथ ये लेख छापा तो सियासी हलकों में सनसनी फैल गई. अफसोस इस बात का है कि चौथी दुनिया आम अखबारों की तरह घर घर तक अपनी पहुंच नहीं बना पाया है. वरना आज हर चौक चौराहे पर हर कोई बिकाऊ मीडिया और सुशासन की साजिश की ही चर्चा कर रहा होता. खैर, फिलहाल ये चर्चा सिर्फ वैसे बुद्धिजीवी, राजनेता और अफसरों को बीच है जिनके आंखों पर पड़ा पर्दा उस लेख को पढ़ने के बाद हट गया है. विज्ञापन के जरिए अप्रत्यक्ष रुप से मीडिया को अपनी उंगलियों पर नचाने मे माहिर मौजूदा मुख्यमंत्री भले ही हर ओर से वाहवाही बटोर रहे हों लेकिन असल तस्वीर तो तस्वीर के पीछे छिपी है.

मेरे खिलाफ लिखना मना है‘, कुछ दिनों पहले चौथी दुनिया के समन्वय संपादक डॉ. मनीष कुमार ने जब अपनी पत्रिका में पूरे प्रमाण के साथ ये लेख छापा तो सियासी हलकों में सनसनी फैल गई. अफसोस इस बात का है कि चौथी दुनिया आम अखबारों की तरह घर घर तक अपनी पहुंच नहीं बना पाया है. वरना आज हर चौक चौराहे पर हर कोई बिकाऊ मीडिया और सुशासन की साजिश की ही चर्चा कर रहा होता. खैर, फिलहाल ये चर्चा सिर्फ वैसे बुद्धिजीवी, राजनेता और अफसरों को बीच है जिनके आंखों पर पड़ा पर्दा उस लेख को पढ़ने के बाद हट गया है. विज्ञापन के जरिए अप्रत्यक्ष रुप से मीडिया को अपनी उंगलियों पर नचाने मे माहिर मौजूदा मुख्यमंत्री भले ही हर ओर से वाहवाही बटोर रहे हों लेकिन असल तस्वीर तो तस्वीर के पीछे छिपी है.

मीडिया को नचाने की कला में सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि उनके साथी मंत्री भी खूब उस्ताद हैं. तभी तो दो साल पहले एक विभाग के मंत्री पर जब संगीन आरोप लगे तो उन्होंने उस दिन प्रमुखता से खबर छापने की तैयारी कर रहे उस नं. वन अखबार को दो पृष्ठ का फुल पेज का विज्ञापन दे डाला. हालांकि अखबार के संपादक ने भी हार नहीं मानी और खरीद लिए गए पहले पेज की जगह खबर को किसी औऱ पेज पर छापा. कुशल वक्ता नीतीश जिस सभा में जाते हैं, स्थितप्रज्ञ मुद्रा में आकर आत्मप्रशंसा बखारने लगते हैं. लेकिन सुशासन और न्याय के साथ विकास जैसे कई शब्दों के भंवर जाल में फंसी जनता और उलझ जाती है. ये ऐसा जालफाश है कि जर्जर सड़क से कोसों दूर जाकर नीतीश का दीदार करनेवाली जनता मूल परेशानी भूल जाती है. बिहार जिस हद तक बदहाल है, उसे बदहाली से उबारने के लिए एक योद्धा चाहिए.

लेकिन यकीन मानिए नीतीश की छवि एक योद्धा की कम और गलैमरस नायक-सी ज्यादा हो गई है. और इसमें भी उस मीडिया का ही सबसे बड़ा हाथ है जिसने अपने हितों के सामने जनता के हितों को गिरवी रख दिया है. पहले पेज पर नीतीश की बड़ी फोटो और उसके नीचे का कैप्शन ऐसा जैसे सरकार प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रही हो. साथ ही खबर में सिर्फ वही बात होती है जो नीतीश कहते हैं. उनके कथन को अलंकारों से सुसज्जित करके मीडियावाले खबरें परोसने के आदी हो गए हैं. ऐसा करते वक्त अब वो इस भाव से आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि वो पाठकों के लिए पहले पेज पर पॉजिटिव स्टोरी दे रहे हैं.  ऐसे में बिहार के पत्रकारों ने पत्रकारिता की वो परिभाषा भी बदल दी है कि बुरी घटना अच्छी खबर है. महिलाओं को पंचायत चुनाव में पचास फीसदी आरक्षण देनेवाले नीतीश के राज में अमूमन ही रोज महिलाओं पर अत्याचार के मामले सामने आते हैं. लेकिन ज्यादातर मामले पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से दबा दिए जाते हैं.

ताजा उदाहरण सुपौल के राघोपुर के पिपरई गांव का है. यहां दबंगों ने एक घर में घुसकर पूरे परिवार को बांध कर पीटा. इसके बाद घर की जवान बहू को कमरे में बंद करके पांच लोगों ने पीटने के साथ-साथ राड गर्म करके जला दिया. जिस दिन की ये घटना है उस दिन मुख्यमंत्री बेटियों के लिए चर्चित गांव धरहरा की धरती पर पौधे लगाकर लोगों में अपने शासन के प्रति विश्वास पैदा करने की कोशिश में जुटे थे. चूंकि आरोपी दबंग थे, सत्ताधारी दल के नेताओं के वरदहस्त के चलते पुलिस ने मेडिकल रिपोर्ट के बाद भी उन्हें फौरन गिरफ्तार किया नहीं किया, ना ही किसी मीडिया संस्थान ने इसे लेकर सरकार पर हमला किया. सिर्फ एक नए न्यूज चैनल ने इस खबर को प्रमुखता से दिखाया. लेकिन शायद वो भी तभी तक दिखा रहा है जब तक उसे सरकारी विज्ञापन नहीं मिल जाता. सुपौल में तीन महीने पहले भी एक महिला को दबंगों ने गांव में नंगा करके घुमाया था. लेकिन राजधानी के किसी अखबार में वो खबर नहीं थी.

ये साबित करने के लिए कि मुझमें अहंकार नहीं है, मैं आपका सेवक हूं, मैं आपका दास हूं, नीतीश कभी विकास यात्रा कभी प्रवास यात्रा तो कभी विश्वास यात्रा कर रहे हैं. इस दौरान उनके साथ पूरा सरकारी अमला भी मौजूद होता है जिनकी मौजूदगी में वो सीधे जनता की समस्याओं को सुनते हैं औऱ फैसला ऑन द स्पॉट की बात करते हैं. लेकिन अगर फैसला ऑन द स्पॉट हो ही जाता तो शायद नीतीश पर दरभंगा में जूते न चलाए जाते. नीतीश स्पीडी ट्रायल के लिए भी चर्चा में रहे. गौर से सोचिए तो साफ पता चल जाएगा कि नीतीश हर बार कुछ ऐसा करते हैं जो अखबारों की सुर्खियां बने. आप पटना स्टेशन के पास जाइए. यहां ऑटो और टैक्सी स्टैंड की सख्त जरुरत है. लेकिन गाड़िया सड़क पर खड़ी होती हैं और लोगों को पैदल आने जाने के लिए जगह ढूंढना पड़ता है. पास में जो जगह थी, वहां ऑटो स्टैंड बनाने की बात चल रही थी. लोग सोच रहे थे कि परेशानी थोड़े दिनों में हल हो जाएगी लेकिन वहां बुद्धा स्मृति पार्क बनवाकर दलाई लामा से उदघाटन करवाया गया. ये राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी खबर बनीं. क्या सुर्खियां बटोरने के लिए हर रोज परेशानी से जूझते आम लोगों की उम्मीद की बलि चढ़ा दी गई.

नीतीश के शासन काल में मद्य निषेध विभाग की आमदनी बढ़ गई है. मंत्रालय की रिपोर्ट तो बडे हेडर के साथ छपते हैं. लेकिन ये खबर क्यूं नहीं छपती की राजधानी के लोहानीपुर इलाके में तीन सौ मीटर के दायरे में शराब की पांच से ज्यादा दुकाने हैं.  इसमें से तीन दुकानें तो सरकार ने महादलितों की झोपड़ियों के सामने खोल रखी हैं जहां गरीब लोग दिन भर की कमाई बोलतों में उड़ा देते हैं. इन दुकानों के तीन सौ मीटर के दायरे में तीन मंदिरें भी हैं. पिछले साढ़े चार साल में हर जगह स्वास्थय और शिक्षा सुविधाएं भले ही ना पहुंची हो लेकिन कई गांवों में भी अंग्रेजी शराब जरूर मिलने लगी है.
नीतीश प्रवास यात्रा पर वैशाली जाते हैं तो खबर बनती है. ऐसी य़ात्राओं के दौरान नीतीश जहां सड़क मार्ग के जाते हैं, वहां की सड़कें भले ही लालू की ड्रीम सड़कों जैसी होती हैं लेकिन जहां की सड़क खराब है वहां मुख्यमंत्री सरकारी हेलिकॉप्टर से उड़के पहुंच जाते हैं. वैशाली यात्रा के दौरान मैं खुद इसका गवाह बना. सरकारी खर्च पर होनेवाली ऐसी यात्राओं में अभी तक उन जगहों को ही चुना गया जहां सत्ताधारी दल की हालत खराब है.

स्पीडी ट्रायल के जरिए जापानी महिला से हुए बलात्कार मामले में 31 दिन के अंदर सजा दिलाने के पीछे नीतीश की पहल से क्या ये नहीं लगता कि वो मीडिया को अपनी उंगलियों पर नचाने के हुनर में माहिर हो चुके हैं. उस फैसले के बाद विपक्ष ने ये कहते हुए हमला बोला कि क्या गरीब की बेटियों से बलात्कार, बलात्कार नहीं. समस्तीपुर में बलात्कार के बाद विक्षिप्तता की हालत तक पहुंच चुकी लड़की के साथ बलात्कार बलात्कार नहीं. 10 फरवरी को खगड़िया, 11 मार्च को बेगूसराय, 5 मई को सीतामढ़ी, 16 मई को मोतीहारी, औऱ 22 मई को नवादा में लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार बलात्कार नहीं. एक मामले में 31 तीन के अंदर सजा और दूसरे मामले में आरोपियों का पता तक नहीं. क्या यही है ‘सामाजिक न्याय के साथ विकास’? क्या ये नीतीश के दावों को खोखला साबित नहीं करतीं? इस नारे को नीतीश की यात्राएं ही झुठलाने के लिए काफी हैं.

नीतीश ने अब तक जितनी भी यात्राएं की, उससे प्रदेश के गरीब जिलों में शुमार रोहतास औऱ कैमूर अब तक वंचित हैं. अगर दो चार किलोमीटर सड़कों को विकास का पैमाना न माना जाए तो नक्सलियों के गढ़ में तब्दील हो चुके इन दो जिलों की हालत आज भी वैसी ही है जैसी बीस साल पहले हुआ करती थी. रोहतास के कैमूर पर्वत पर रहनेवाले आदिवासियों की हालत क्या है, कोई जाकर तो देखे. सरकार पर्यटन पर्यटन चिल्ला रही है लेकिन रोहतास किला, शेरशाह का रौजा, मुंडेश्वरी मंदिर (जिसे वैष्णव देवी के तर्ज पर विकसित करने की बात है), तारा चंडी धाम, विश्वामित्र की तपोस्थली उली के विकास के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया.

रोहतास के बांदू गांव में रावण द्वारा स्थापित शिव लिंग सोन नदी के बीच धारा में है (नजारा रामेश्वरम सा है) साथ ही बगल में कई जल प्रपात भी हैं. असीमित मात्रा में चूना पत्थर के बावजूद भी सरकार ने यहां सीमेंट उद्योग के लिए कोई पहल नहीं की. उस अद्भुत शिवलिंग और वहां के मनोरम नजारे को जो एक बार देखे ले तो देखता ही रह जाए. कैमूर पहाड़ी में दुनिया के बेहतरीन चूना पत्थर पाए जाते हैं. (कहा जाता है कि दस हजार साल तक अगर दस हजार सीमेंट फैक्ट्रियां चलें तो भी चूना पत्थर कम नहीं होगा) जबकि इसी पहाड़ी के चूना पत्थर से यूपी में कई सीमेंटे प्लांट चलते हैं.

यहां की हालत ये है कि एक माइंस था जो सालों पहले बंद हो गया. फिलहाल एक सीमेंट फैक्ट्री अंतिम सांसे ले रहा है. लेकिन नीतीश जी ने इस दुर्लभ जगह की यात्रा मुनासिब नहीं समझी. ना ही मीडिया ने इस ओर उनका ध्यान दिलाने की मजबूत कोशिश की. दाम खाकर दुम हिलानेवाली मीडिया भले ही स्वाभाविक सुर खो चुकी हो लेकिन उस सुर से अलग कोई न कोई जरूर नई कंपोजिग कर ही रहा होगा. क्या वही असली सुर होगा? क्या वही सुपर हिट होगा? तो क्या बिहार को अभी और इंतजार करना होगा??

लेखक प्रभात पाण्डेय मौर्य टीवी, पटना में एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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