-डॉ.शशि तिवारी
अरूणाचल प्रदेश में नवाब तुकी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को राज्यपाल द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था। 19 फरवरी को असंतुष्ट घड़े के नेता कलिखों पुल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इनके पास कांग्रेस के 20 असंतुष्ट विधायकों ने 11 भाजपा विधायकों का समर्थन जुटा सरकार बनाई। यूं तो राज्यपाल का संवैधानिक पद है इसलिए उन्हें न केवल राजनीति पार्टियों के समर्थन वालों से न केवल बचना चाहिए बल्कि निष्पक्ष भी दिखना चाहिए। लेकिन राजनीति में राज्यपालों की भूमिका केन्द्र सरकार के एक एजेन्ट के रूप में जा रही है यही कारण है कि केन्द्र की सत्ता बदलने के साथ राज्यपालों को भी बदला जाता है। कुछ राज्यपाल अपनी सीमाओं से बढ़ पार्टी वफादारी सिद्ध करने में भी पीछे नहीं रहते है अरूणाचल वाले प्रकरण में राज्यपाल का व्यवहार संवैधानिक दायित्वों के अनुकूल नहीं कहा जा सकता मसलन विधान सभा का सत्र एक माह पहले ही बुला एक स्थानीय कम्युनिटी हॉल में बिना मुख्यमंत्री एवं विधान सभा अध्यक्ष की सलाह लिए आछूत किया जाना किसी भी दृष्टि से संवैधानिक पद के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
राज्यपालों एवं राजनीतिक दलों को अब समझ में आ ही जाना चाहिए कि वे मनमाना आचरण नहीं कर सकते, मेरी मर्जी नहीं चलेगी वे भी कानून से बंधे हैं। नही ंतो उनके उत्तरदायित्व तय करने के लिए न्यायपालिका सचते है। अरूणाचल के मामले में 7 माह पीछे घड़ी को घुमाना एक एतिहासिक घटना है, निःसंदेह यह संवैधानिक पदों पर बैठे राज्यपालों की समझ पर प्रश्न चिन्ह के साथ शर्मिंदगी भी है व भद्द पिटती है सो अलग।
भारत के संविधान में प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल का पद एक संवैधानिक पद है। संविधान का अनुच्छेद 152 से 167 तक की धारा राज्यपाल के लिए है। यू ंतो राज्यपाल के लिए न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष अनुच्छेद 157 के तहत है। लेकिन, अधिक आयु के बारे में संविधान मौन है वैसे तो प्रत्येक पद अपने आप में महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली है लेकिन उस पद पर बैठने वाला व्यक्ति पद की गरिमा बढ़ा गौरवपूर्ण बना सकता है या अपने क्रियकलापों से धूमिल भी कर सकता है। राज्यका राज्यपाल उस राज्य की सरकार के क्रियकलापों के लिए एक अंकुश भी है ताकि सरकार अपनी मनमानी न कर सके। राज्यपाल द्वारा की गई किसी बात की विधि मान्यता इस आधार पर प्रशनागत नहीं की जायेगी कि उसे अपने विवेकानुसार काम करना चाहिए या नहीं। इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नहीं की जायेगी कि क्या मत्रियों ने राज्यपाल को कोई सलाह दी ओर यदि दी तो क्या दी वैसे भी राज्यपाल बिना मंत्रीमंडल के परामर्श के भी किसी मंत्री के विरूद्ध भ्रष्टाचार विरोधक तथा भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत किये गए अपराधों के लिए अभियोजन की स्वीकृत दे सकता है।
अरूणाचल प्रकरण में अनुच्छेद 165 (2) के तहत् राज्यपाल ने क्या महाधिवक्ता से कोई सलाह ली? चूंकि मामला सरकार से जुड़ा था, राज्यपाल के माध्यम से राज्यों की सरकारों को गिराने का खेल/अनुच्छेद 356 के माध्यम से कांग्रेस ने किया जो आज भी अनव्रत जारी है। उस समय ये विपक्ष के रूप में भाजपा ने इसका पुरजोर विरोध करती रही है लेकिन आज जब वो स्वयं केन्द्र में है ते क्या अपने किये विरोध को भूल कांग्रेस द्वारा शुरू किये खेल को ही वैध बनाने में जुटे हैं। कहां गया चरित्र का दम? इसी कारण से कांग्रेस अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। विगत दो तीन दशकों से केई आंसू पोछने वाला भी नहीं है।
इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का विधिसम्मत व्यवहार न होना एवं न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना एवं राज्य सरकारों को बहाल करना ऐसे में तो लगता है कि राज्यपालों की जरूरत ही क्या है। पिछली सरकारें तो नहीं कर पाई लेकिन मोदी जरूर ये काम कर सकते हैं एक बार जो जिस पार्टी से जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुन गया अब वह किसी भी सूरत में दूसरे दल या पार्टी में नहीं जा सकता। इससे हाल ही में जनप्रतिनिधयों की असंतुष्टता तोड़-फोड़ और सरकार बनाने में खरीद फरोख्त को ही काराबोर एवं गोरखधंधा चल रहा है। इससे केवल और केवल जनता के मत का न केवल अपमान ही होता है बल्कि संवैधानिक व्यवस्था भी खतरे में आती है।
डॉ.शशि तिवारी
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