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शाम की बीयर के साथ, टीवी खोलता हूँ

देखता हूँ

साधुओं को लड़ते हुए

माफिया को रोते हुए

और इस बीच पता हूं सबको कुछ न कुछ बेचते हुए

शाम की बीयर के साथ, टीवी खोलता हूँ

देखता हूँ

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माफिया को रोते हुए

और इस बीच पता हूं सबको कुछ न कुछ बेचते हुए

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एक बीयर और पीता हूं, नींद की कुछ गोलियां

जल्दी सोना चाहता हूं. कल फिर जीना चाहता हूं

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता की मेरी कंपनी क्या करती है

दवाइयां बनाती है या हथियारों की दलाली करती है

पार्टियों का चुनाव मैनेज करती है या एक मुखी रुद्राक्ष बेचती है

जीवन की सुख शांति के लिए.

मुझे तो बस अपनी किश्तें चुकानी हैं

और अपने बच्चे का बीमा करना है

क्योंकि बाजारूपन में जीना इसी का नाम है.

-शैलेंद्र राय

[email protected]

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