सचमुच वह जितना अप्रिय था, उससे भी ज्यादा असंयत, अशालीन और अपमानजनक भी था। कम से कम मीडिया फ्रेंडली दिग्विजय सिंह से तो उनके पत्रकार मित्रों को ऐसी अपेक्षा नहीं थी कि वे प्रभात झा के किसी राजनीतिक कटाक्ष को कांउटर करने के लिए उनके पत्रकारीय जीवन के किसी निजी प्रसंग का उल्लेख इतने ओछे दृष्टांत से करेंगे। उनसे यह उम्मीद इसलिए भी नहीं थी क्योकि वे वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य में शालीन, सौम्य एवं सदाबहार नेता के रूप में प्रकट हुए थे, लेकिन हाल के दिनों के उनके बयान उनकी स्थापित छवि से मेल नहीं खाते हैं। क्या यह बयान महज उनकी पारिवारिक परेशानियों के फलस्वरूप है या फिर वे सचमुच बदल गए हैं?
यहां चर्चा हो रही है दिग्विजय सिंह और प्रभात झा के मध्य छिड़े बयान युद्ध की जो अब कमोबेश रावणी संघर्ष में बदल चुकी है प्रभात झा ने अर्जुन सिंह की रावण से तुलना करने की जो गुस्ताखी की थी, वहं दिग्विजय सिंह बर्दाश्त नहीं कर पाए। आखिरकार रिश्ते में समधी और राजनीतिक गुरू का अपमान वे क्यों कर बर्दाश्त करते। उन्होंने प्रभात को औकात शब्द के मायने तो बताये ही साथ में नितांत व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि उन्होंने पत्रकार के रूप में प्रभात झा को अर्जुन सिंह के सामने अपने निजी कार्य के लिए मंडराते देखा था। सवाल उठता है कि यह दृष्टांत अगर न भी देते तो क्या उनका बयान पूरा नहीं होता। इससे इतर एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या पत्रकार कोई मशीनी मानव होता है जिसका कोई परिवार, कोई जीवन, अपेक्षाएं, आशाएं, सुख -दुख नहीं होता हो। पत्रकार भी उसी समाज की कोख से जन्म लेते हैं, जिस समाज से वारेन एंडरसन जैसे हत्यारों की कंपनी से अपनी जेबी संस्थाओं के लिए चंदा वसूलने वाले राजनेताओं का प्रादुर्भाव होता है।
पत्रकारों के प्रति आदर और उदारता का भाव यद्यपि दिग्विजय सिंह में भी रहा है लेकिन उन्होंने इस मामले में समाजवाद बरतने के बजाए अपनी कोटरी या काकस को लाभ देना ज्यादा पसंद किया। उनके इर्द-गिर्द कुछ गिने चुने चेहरे हुआ करते थे जो उनकी दरियादिली से लाभान्वित थे। दुर्भाग्यवश दस साल के उनके शासनकाल में लाभान्वित होने वाले ऐसे अधिकांश पत्रकारों का सितारा अब अस्त हो चुका है। दिग्विजय सिंह से मदद पाने वाले पत्रकारों की त्रासदी यह रही कि अज्ञात माध्यमों ने गुमनाम पर्चों और माउथ पब्लिसिटी के जरिए यह भेद सार्वजनिक कर दिया कि किसकी बिटिया के लिए दिग्विजय सिंह ने कितना खर्च किया और किस किसको अनुपम कार की भेंट दी गई।
यह समझना बहुत मुश्किल हैं कि दो व्यक्तियों के परस्पर व्यक्तिगत आदान – प्रदान का तीसरा जानकार कैसे आया। दिग्विजय या उन जैसे राजनेता पता नहीं यह क्यों भूल जाते हैं कि जब वे सरकार में होते हैं तो सरकार का हिस्सा होते हैं, उनका कोई निजी वजूद नहीं रह जाता। अगर अर्जुन सिंह से प्रभात झा पत्रकार के रूप में किसी तरह की मदद मांगने गए भी होंगे तो इसलिए क्योंकि तब वे सरकार के मुखिया थे और सरकार सामंती युग की तरह किसी अर्जुन सिंह, शिवराज सिंह या दिग्विजय सिंहों की निजी मिल्कियत नहीं होती। लोकतांत्रिक, प्रणाली में सभी की उसमें समान भागीदारी निहित होती है। अगर वह मदद व्यक्तिगत नहीं थी, किसी सरकार से अपेक्षित थी तब उसके लिए प्रभात को कटघरे में खड़ा करने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी। वैसे भी प्रभात के परिचित बखूबी जानते हैं कि वे कितने जुझारू पत्रकार रहे हैं और किन-किन संघर्षों से गुजरकर उन्होंने स्वयं की राह बनायी है। इन पंक्तियों के लेखक ने प्रभात को ग्वालियर में उस दौर में देखा है जब एक विचाराधारा को लेकर छपने वाले दैनिक स्वदेश की नौकरी के दौरान वे छोटे से कमरे में बसर करते हुए खुद के लिए अपने हाथों से टिक्कड़ सेंका करते थे।
लेकिन इस तल्ख सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा कि अस्सी के दशक में अर्जुन सिंह के अभ्युदय के बाद का समय पत्रकारों कि लिए स्वर्ण युग की तरह था। जीवन के संध्या काल की ओर बढ़ रहे उस राजनेता ने तीस साल पहले मप्र में पत्रकारों को समृद्ध बनाने की जो आधार शिला रखी थी, उसके फलस्वरूप आज सैकड़ों पत्रकार ‘फीलगुड’ महसूस कर पा रहे हैं। कहना न होगा कि ‘कुंवर साब’ पत्रकारों के मामले में अति उदार थे। ऐसी उदारता बाद के मुख्यमंत्रियों में नजर नहीं आयी। यह और बात है कि इस उदारता का लाभ चाटुकार किस्म के पत्रकारों ने ज्यादा उठाया और कुंवर साब को बदनाम करने तथा पत्रकार बिरादरी पर कालिख पोतने में कसर नहीं छोड़ी। समय का फेर देखिए, इन्हीं में से ढेर सारे पत्रकार अब जबकि अर्जुन सिंह का सूरज डूबने को है, जानकर-मानकर, उनकी जानिब नजरें करने तक को तैयार नहीं हैं।
लेखक सोमदत्त शास्त्री मध्य प्रदेश के जाने-माने पत्रकार हैं.

