चंबल के बीहड़ों में गूंजने दो बेटी की किलकारी

मैं मध्यप्रदेश के ऐसे इलाके से ताल्लुकात रखता हूं, जो कई बातों के लिए सुविख्यात है और कुख्यात भी है। ग्वालियर का किला और यहां जन्मा ध्रुपद गायन ग्वालियर-चंबल संभाग को विश्वस्तरीय पहचान दिलाता है। वहीं मुरैना का ‘पीला सोना’ यानी सरसों से भी देशभर में इस बेल्ट की प्रसिद्धी है। बटेश्वर के मंदिर हों या कर्ण की जन्मस्थली कुतवार दोनों पुरातत्व और ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। मुरैना पीले सोने के साथ ही राष्ट्रीय पक्षी मोरों की बहुलता के लिए भी जाना जाता है। ग्वालियर-चंबल इलाके की पहचान उसकी ब्रज, खड़ी और ठेठ लट्ठमार बोली के कारण भी है।

स्‍वतंत्रता दिवस और दो लड्डू

स्‍वतंत्रता दिवस: अब तक नहीं समझ पाया बारेलाल आजादी का अर्थ : कई साल बीत गए बोलते हुए गांधी जी की जय। वह वर्षों से देखता आ रहा है, स्कूल, तहसील और पंचायत की फूटी कोठरी पर तिरंगे का फहराया जाना। इतना ही नहीं मिठाई के लालच में हर साल शामिल होता है वह २६ जनवरी और १५ अगस्त के कार्यक्रम में, लेकिन अब तक नहीं समझ पाया बारेलाल आजादी का अर्थ। दोपहर हो गई थी। सूरज नीम के विशाल पेड़ के ठीक ऊपर चमक रहा था। पेड़ चौपाल के ठीक बीच में था। नीम इतना विशाल था कि उसकी शाखाओं ने पूरी चौपाल और आसपास के रास्ते को ढक रखा था। इस वक्त चौपाल पर सूरज की एक-दो किरणें ही नीम की शाखाओं से जिरह करके आ पा रही थीं वरना तो पूरी चौपाल नीम की शीतल छांव के आगोश में थी। इधर-उधर कुछ बच्चे कंचे खेल रहे थे और कुछ बुजुर्ग नित्य की तरह ताश खेल रहे थे।