उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के बाद कई राजनेताओं को लेना होगा वनवास

बृजेश सती/देहरादून
उत्तराखंड के लिए यह चौथा विधानसभा चुनाव बेहद अहम होने जा रहा है। यह इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि चुनाव नतीजे आने के बाद कई सूरमाओं के राजनीतिक भविष्य पर भी संकट गहरा सकता है। इसमें भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस दोनों दलों से जुडे कद्दावर नेताओं के नाम शामिल हैं। टिकट वितरण के बाद जो राजनीतिक परिदृश्य उभर रहा है उससे यह बात बिल्कुल साफ है कि दोनों दलों के हाईकमान के पास उम्मीदवारों के चयन में विकल्प सीमित थे। टिकट बंटबारे में उभय पक्षों में एक समानता यह देखने को मिली कि आलाकमान ने भारी भरकम चेहरों को मैदान में उतारने में कोई हिचक नहीं दिखाई। मुख्यमंत्री जहां अंतिम समय तक पत्ते खोलने को तैयार नहीं थे तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की चुनाव न लडने की ईच्छा के विपरीत चुनावी दंगल में उतरने को मजबूर होना पड़ा।

भाजपा खेमे में भी कुछ इसी तरह का मंजर रहा। कांग्रेस के दस बागियों के अलावा सतपाल महाराज को भी विधानसभा चुनाव में उतारा गया। यह पहली बार है कि महाराज अपने तीन दशकों के राजनीतिक सफर में विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। अब तक के तीन चुनाव में उनकी पत्नी ही चुनाव लडती रही हैं लेकिन पहली बार महाराज चौवटटाखाल से ताल ठोक रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य चेहरे भी हैं जो कई दलों से होकर एक बार फिर बतौर निर्दलीय अपनी किस्मत अजमा रहे हैं, उनके लिए भी यह चुनाव एसिड टेस्ट होगा। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि कितने सियासदां अपनी प्रतिष्ठा बचा पाते हैं।

टिकट वितरण से पहले भाजपा व कांग्रेस दोनों ही दलों में इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि भाजपा आलाकमान कांग्रेस के दस बागियों पर विश्वास जतायेगा या कुछ के पर कतर अपने ही भरोसेमंदों पर दांव लगायेगा। कांग्रेस कैंप में भी इसको लेकर खासी उत्सुकता बनी रही, लेकिन 16 जनवरी को भाजपा केंद्रीय संसदीय बोर्ड द्वारा जारी की गई पहली सूची में न केवल पिछले साल मार्च महीने में कांग्रेस से बगावत करने वाले दस पूर्व विधायकों को तरजीह दी गई बल्कि चौवटटाखाल से सतपाल महाराज का नाम भी शुमार था। इसके अलावा पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य व पूर्व विधायक केदार सिंह रावत भी टिकट पाने वालों की फेहरिश्त में शामिल थे।

इसके बाद 22 जनवरी को कांग्रेस ने भी बडी माथापच्ची के बाद 63 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की। इसमें भाजपा के चार पूर्व विधायकों राजकुमार पुरोला, शैलेन्द्र रावत यमकेश्वर, सुरेश जैन रुड़की व भीमताल से दीवान सिंह को टिकट दिया गया। कांग्रेस की सूची में चौकाने वाली बात यह रही कि मुख्यमंत्री हरीश रावत को हरिद्वार ग्रामीण के अलावा उधमसिंह नगर की किच्छा सीट पर भी चुनाव मैदान में उतारा गया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की ना नुकुर के बाद सहसपुर में पार्टी ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया।

केन्द्रीय आलाकमान के कई दौर की बैठकों व सर्वे रिपोर्टों के बाद दोनों प्रमुख सियासी दलों के नेताओं का टिकट फाइनल किया गया। कांग्रेसी, भाजपाई चोले में रंगे गये तो भाजपाईयों ने भी पाला बदलने में देर नहीं की। पूरे घटनाक्रम का उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि परिस्थितियों और सिद्धांतों दोनों से ही समझौता किया गया। दलबदल करने वाले कुछ नेता जिन्हें दोनों ही पार्टियों से टिकट नहीं मिला वो निर्दलीय ही चुनाव में खम ठोक रहे हैं।

कुल मिलाकर आसन्न विधानसभा चुनाव सूबे के कई नेताओं का न केवल राजनीतिक भविष्य तय करेगा बल्कि राजनीतिक दलों के लिए नजीर भी पेश करेगा। इसमें कांग्रेस व भाजपा दोनों ही दलों के लगभग सभी प्रभावशाली नेता शामिल हैं। उम्र के इस पड़ाव में चुनाव में हार उनकी राजनीति से वनवास का कारण बन सकता है। इसमें मुख्यमंत्री हरीश रावत के अलावा हरवंश कपूर, यशपाल आर्य, सतपाल महाराज, हरक सिंह, गोविन्द सिंह कुंजवाल, किशोर उपाध्याय प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व काबीना मंत्री दिवाकर भटट व काशी सिंह ऐरी भी ऐसे नाम हैं जो इस चुनाव में जीत न पाने की स्थिति में उत्तराखंड की सियासत से रिटायर हो जायेंगे। 

लेखक बृजेश सती स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *