क्या ये पत्रकार कहे जाने लायक हैं?

विकास कुमारइस पोर्टल पर राहुल कुमार ने (पत्रकार इसलिए नहीं क्योंकि वह अपने आप को पत्रकार मानता ही नहीं) पिछले दिनों दो लेख लिखे. पहले लेख का शिर्षक है, “मैं मर्द हूं, तुम औरत, मैं भूखा हूं, तुम भोजन!!”. राहुल के इस लेख पर करीब पच्चास लोगों ने या कहूं तो पच्चास मीडिया कर्मियों ने अपने विचार दिए. इन पच्चास में से बमुश्किल दस लोगों को राहुल की बात समझ आई. इन द्स लोगों ने अगर लेखक से असहमति दिखाई या लेख की आलोचना की तो बात समझ में आती है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जिन्हें लेखक की बात ही समझ में नही आई.  बिल्कुल साधारण भाषा में लिखा गया लेख इन लोगों कपार के ऊपर से गुजर गया.

आज  पता चला कि इस तरह के दिमागदार और समझदार लोग भी हमारी  मीडिया में हैं. जिनकी समझ में यह नहीं आता कि कौन सा लेख क्या कह रहा है. लेखक ने लेख किस शैली में लिखा है और किसी भी लेख पर अपनी राय देते समय किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए. मेरा मकसद यहां किसी को भाषा सिखाना या समझाना नहीं है लेकिन उन कथित पत्रकारों को नंगा करना है जो जब भी मुह खोलते हैं तो दुर्गंध फैला कर जाते हैं. ऐसे ही एक मित्र हैं, मिस्टर ब्रजेश निगम. इन्होंने राहुल के लेख को पढ़कर जो कुछ लिखा वो है- “mr. rahul…. agar aap delhi me rahte hai toh open challenge kar rha hu…… jish din milna hai.. ush din apni puri tagat or back support ke sath milna……. me bhi dekhta hu kitna bada mard hai tu….. tu aise admiyo me se ho jinki ma malikka sehrawat jaisi hoti hai…..”

पता नहीं, भाई ब्रजेश कितने  बड़े और कैसे पत्रकार हैं. उनकी बातों से ऐसा लगता है कि वो लेख की मूल भावना को समझ नहीं सके . इसके बाद जो कंमेंन्ट उन्होंने दिया वो ब्रजेश जी को हंसी का पात्र बनाता है. अगर ब्रजेश जी तक मेरी बात पहुंचे और समझ में आ जाए तो मामला साफ करें. ब्रजेश जी जैसे ही ज्यादातर लोग हैं और इन्हीं लोगों को बताना चाहुंगा कि राहुल ने अपना लेख, व्यंग की शैली में लिखा और वो अपने लेख में कहना चाह रहे हैं कि आज के समाज में, हमारे पढ़े-लिखे कहे जाने वाले समाज में औरतों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है. ऐसे ही एक साहब और हैं. इनका नाम है सुशील गंगवार. गंगवार साहब, एक पोर्टल के एडिटर हैं और शायद बहुत बड़े पत्रकार भी होंगे. इन्होंने अपने पोर्टल पर राहुल लेख को लेकर ही एक लेख लिख दिया. लेख का शिर्षक है- “नए पत्रकारों की जमात”. इस लेख में इन्होंने राहुल के लेख का जो निचोड़ निकाला है उसे पढ़ कर तो मैं इस महान पत्रकार का कायल हो गया हूं. गंगवार साहब कहते हैं, “लेख कि भाषा इतनी घटिया है कि कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेख का सारांश निकाला जाये तो ये जनाव तो औरतों को पैर की जूती समझते हैं।” 

वहीं, ज्यादातर लोगों ने लेख में कही गई बात को राहुल की राय मान ली. ऐसे ही नासमझों में से एक हैं, मिस्टर दीपक अग्रवाल. साहब, एक डाक्टर हैं और राहुल को मनोरोगी बता गए. दीपक कहते हैं, “हे मनोरोग के साक्षात् रूप राहुल. मैं डॉक्टर हूँ और तुममे एक पागल दिखलाई देता है. क्या हो जायेगा अगर तुम्हे पागलखाने पंहुचा दूँ. तुम्हारे हाथो में हथकडिया डलवा दूँ. फिर थोडा सा बिजली का करंट छुडवा दूँ. बुरा मत मानो प्रिय मुझे ऐसे ही सुख मिलता है. 

हे राहुल मैं एक जल्लाद हूँ तुमको फांसी देना चाहता हूँ. मेरी ख़ुशी की खातिर तुम इतना नही कर सकते. लेकिन मुझे तो ऐसे ही मज़ा आता है. अब यह मत कहना मैं कौन होता हूँ तुम्हे फांसी पर लटकाने वाला. या पागल खाने पहुँचाने वाला. अरे तुम तो मन करोगे ही. लेकिन मेरे को पता है तुम हो इसी लायक. की तुमको गरम तबे पर लेटने का मौका दिया जाए. और क्यों दूँ तुम्हे कोई प्रमाण क्यों करूँ परवाह की तुम भी एक इंसान हो मुझे तो बस ऐसे ही मज़ा आता है.

भैया राहुल, यह जो तुमने गटर जैसे निर्मल विचार लिखे हैं न. और यह जो मैंने अपने विचार लिखे हैं न. इनसे एक बात समझ लो. लड़का हो या लड़की. या शबनम आंटी. सबसे पहले एक इंसान हैं. और इंसान के साथ कैसे बर्ताब किया जाता है. अपने सिवा किसी से भी पूंछ लेना. बता देगा. और फिर तुम्हे खुद भी तो एहसास होगा दर्द क्या होगा. कडवे बोल क्या होते है. इनका असर क्या होता है. तुम तो अपनी यों कुंठा में यह ही भूल गए की पूरी एक बिरादरी को बैएज्ज़त कर रहे हो. मेरी मानो किसी मानो चिकित्षक को दिखाओ सब ठीक हो जायेगा. देर मत करो वर्ना रोग बढ़ता ही चला जायेगा. 

और यशवंत जी कम से कम विचार पोस्ट करने से पहले देख लिया करें की किसी को मंच चाहिए यह हॉस्पिटल.”

ये कैसे संभव है कि अगर हम मीडिया में हैं और लिखने-पढ़ने से हमारा रिश्ता है तो किसी के “आम” लिखने पर हम उसे  “इमली” समझ लें? लेकिन यहां ऐसा ही हुआ. मुझे नहीं पता कि ऐसी गलतफहमी क्यों हुई? मैं यह तो नहीं ही कह सकता कि, कमेन्ट करने वालों मे से ज्यादातर लोग जाहिल- गवार हैं और इनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है क्योंकि इनमे से एक-दो लोग अपने-आप को संपादक तक लिखते हैं. संभव हो कि, समय की कमी की वजह से इन लोगों ने लेख को सही से पढ़ा न हो और जल्दी-जल्दी में कमेन्ट डाल कर निकल लिए हों. वैसे भी हम आज के पत्रकार हैं और हमारे पास समय की कमी रहती है.

एक और बात जो लेख पर दिए गए कमेन्ट्स को पढ़कर दिखती है कि ज्यादातर लोगों को राहुल  के द्वारा इस्तेमाल की गई तीखी भाषा पसंद नहीं आई. जबकि वहीं कुछ लोगों को लगता है कि, यह लेख अपनी भाषा की वजह से ही प्रासंगिक है. लेख में जिन शब्दों को लिया गया वो काफी तीखे हैं. जिस समस्या के बारे में राहुल बात कर रहे हैं वहां इस तरह के शब्दों की ही जरुरत थी. लेकिन लेखक ने अपने लेख में गाली-गलौज का इस्तेमाल नहीं किया और लेख पढ़ते वक्त कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि लेखक इस लेख से कोई सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहता है. जैसा कि कुछ लोगों से आरोप लगाया है. वहीं ज्यादातर कमेंट्स में इतनी गन्दी-गन्दी गालियों  का प्रयोग किया गया है जिसे पढ़ा भी नहीं जा सकता. क्या गाली लिखने वाले और एक छोटे से लेख को न समझ पाने वाले, ये लोग पत्रकार हैं?

लेखक विकास कुमार युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं.

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