अब कासे कहूं पीर जिया की

जुगनू : कुछ बातें बेमतलब 13 : हाय हम हिंदुस्तानी अब तक न समझे हुमायूँ के मकबरे का मोल। अब जब ओबामा बाबू वहां जा चुके हैं तो आमिर खान भी जरूर जाएंगे। यहीं से होगा उनका राष्ट्र के नाम विरासत बचाओ संदेश : यह वही मकबरा है जहां ओबामा आ चुके हैं, वहां आ कर आप अपना प्यार भरा संदेश जरूर लिखें कि दिल्ली को ओबामा से बचाइए। आमिर खान आगे आपको बताएंगे कि दिल्ली का सारा रियल इस्टेट मकबरों–समाधियों में बिखरा पड़ा है। सरकार योजना बना रही है कि कैसे इसे भी सैर सपाटा में बदलें। जैसे आप दिल्ली आएं। दिल्ली एक ऐसी जगह है, जहां लोगों को आना ही पड़ता है। बस अड्डा, हवाई अड्डा, रेल अड्डा यानी किसी भी अड्डे से बाहर निकलें तो सामने एक मकबरा या समाधि होगी। यहां ओबामा आए थे। यहां ओबामा नहीं आए थे। प्रश्न का सही उत्तर देने पर अमरीका के वीजा की गारंटी। उत्तर गलत हुआ तो बिहार सरकारी खर्च से भेजा जाएगा।

बिहार ही क्यों भेजा जाएगा। आप यह सवाल पूछ सकते हैं। आप यह जानते हैं कि बिहार किसी सवाल का जवाब नहीं देता। फिर भी कायदा है कि बिहार से सवाल पूछा जाए कि गुड़ खाए गुलगुला से परहेज क्यों करते हो। लोकतंत्र का कायदा है सवाल पूछना। बिहार का कायदा है कि सवाल का जवाब न देना। मसलन यह आंकड़ा कहां से आया जिसमें केंद्र सरकार ने बिहार 65 लाख लोगों को गरीबी रेखा के नीचे पाया। केंद्र को तो यह भी नहीं पता कि बिहार में सवा करोड़ का आंकड़ा बिहार के मुख्यमंत्री ने पाया। ओबामा के जाने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री से बहुत प्यार से पूछा। इतना प्यार वह सिर्फ फोन पर ही जताते हैं। ”भाई नीतीशे तेरे पास सवा करोड़ का आंकड़ा कहां से आया। ओए हमें इससे कोई मतलब नहीं कि कहां से आया–पर ओबामा साहब पूछ रहे थे। उन्हें बताना है, नहीं तो नाराज हो जाएंगे–अगली दफा आए तो तेरी विरासत देखने बिहार नहीं जाएंगे।”

नीतीश कुमार को भी नहीं पता था कि यह आंकड़ा कहां से आया। इस समय तो उनकी यादाश्त में 243 का आंकड़ा समाया है। यह भी घटते-घटते 26 में है समाया। बाप रे बाप, ऐसा भी कहीं चुनाव होता है कि एक चरण खत्म तो दूजा आता है। अरे सीधी बात है सवा करोड़ वोटर को वोटर लिस्ट से हटाया, क्योंकि राहुल बाबू की बात मान कर वह देश बना रहे थे। जो बिहार में वोटर नहीं, उसे विरासत-विरासत बात करने का हक नहीं, क्योंकि बिहार के पास है क्या वोटर के सिवा। यहां किसिम-किसिम के वोटर पाए जाते हैं। जाति से विकास तक के साये में पाए जाते हैं। कम खाते हैं क्योंकि आंकड़ों के चक्कर में अनाज नहीं पाते हैं। देखें कांग्रेस का टेलिविजीनियाना प्रचार, देश की रफ्तार से बिहार बढ़ेगा। प्रधानमंत्री जी देश की रफ्तार आप योजना आयोग में रखें, हमें तो चुनाव आयोग में ही रखें जिसे सिर्फ वास्ता है एक–दो–तीन से। जैसे आप ओबामा की मजदूरी चुका रहे हैं, वैसे ही बिहार का वोटर मेरी मजूरी चुकाएगा। अब बचा ही कितना। दलित खत्म–महादलित खत्म। विकास कभी खत्म नहीं होता। जैसे आपका अमेरिका प्रेम खत्म नहीं होता। यहां तो है हुक पिया वोटर की-अब कासे कहूं पीर जिया की।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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