अमेरिकी कांग्रेस से ज्यादा काबिल है कांग्रेस पार्टी

आलोक कुमार अमेरिका में संसद यानी सीनेट को कांग्रेस कहते हैं। अपने यहां यह सबसे पुरानी सियासी पार्टी का नाम है। दोनों कांग्रेस में एक साम्य है। जिस नीति के लिए अमेरिका में सरकार चलाने वालों की पूरी सीनेट यानी कांग्रेस मिलकर काम करती है अपने यहां वैसी ही नीति और तकरीबन उसी किस्म का काम अकेली सियासी पार्टी के तौर पर कांग्रेस आसानी से कर लेती है। राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के बडे़ कामों की तुलना में अपने संसद का रोल गौण है। आजादी के बाद सरकार की सबसे बड़ी मुसीबत नब्बे की दशक के शुरुआत में आपरेशन ब्लू स्टार के वक्त आई थी। कांग्रेस की नीतियों ने जो बीज बोया था पाकिस्तान से आई हर किस्म की खाद ने नफरत की उस बीज को लहलहाते फसल में तब्दील कर दिया। तब अखबार की सुर्खियां जमीन पर पसरे खून की छीटें होती थीं। अखबार इंसान की आंखों में तैरती खौफ के मंजर की तस्वीरों से अटे रहते थे। अंदर के पन्नों पर आला समीक्षाएं होती कि संत जनरैल सिंह भिंडरवाले जैसे कई डाकुओं को खड़ा करने में कांग्रेस की अहम भूमिका रही।

बाद में श्रीलंका में इंडियन पीस किपिंग फोर्स (आईपीकेएफ) को भेजकर सेना के हजारों अधिकारियों को कुर्बान करने वाले फैसले के दौरान देखने को मिलीं। श्रीलंका में संघर्ष की खबरें अखबारों में छाई रही। खूब बताया गया कि कांग्रेस ने किस तरह तमिल विस्थापितों के कैंप में रहने और रिक्शा चलाकर जीवनयापन करने वाले युवक वेलुपिल्लैई प्रभाकरन को हथेलियों पर उठा लिया। कांग्रेस का साफ मकसद द्रविड राजनीति के असर को कम और कांग्रेस के जनाधार को पुनर्बहाल करना था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन काल में विद्रोही टाइगर लिट्टे की जमकर मदद की गई। लेकिन इंदिरा के पुत्र राजीव गांधी ने जब प्रधानमंत्री की कमान सम्हाली तो नीति पलट दी गई। शायद बेटे का मकसद अंतराष्ट्रीय राजनीति में स्वर्गीय मां के ओहदे की बराबरी करना या फिर नोबेल पुरस्कार जैसे किसी इनाम की लालसा में रही होगी। कांग्रेस की बदली चाल से प्रशिक्षक ही लिट्टे के खिलाफ होकर लड़ने पहुंच गए। नतीजा श्रीलंका सरकार को नाको चने चबबा रहे लिट्टे ने भारतीय सेना को भारी नुकसान पहुंचाया और गुरु दक्षिणा में बड़ी विफलता का मुश्किल भरा तोहमत जड़ दिया। पूरी कहानी लगातार अखबारों में छपती रही। सुदूर दक्षिण की घटना भी राष्ट्रीय और प्रादेशिक अखबारों की सुर्खियां बनती रही। विश्लेषण होते रहे। लिट्टे को खड़ा करना और फिर मजबूती के संहार की कोशिश करना दोनों की बदलते वक्त की बदलती रफ्तार के साथ कांग्रेस की बदलती नीति का हिस्सा रहा।

मीडिया ने खूब लिखा। कांग्रेस को कोसा। सरकार की खटिया खड़ी की लेकिन उस तरह की सच पर टिकी समीक्षाएं अमेरिका के खिलाफ बहुत कम पढ़ने सुनने को मिलती हैं। ये शायद हमारी आजादी और अमेरिका की पैबंद वाली आजादी का फर्क है। अमेरिकी कांग्रेस बहुत कम लिखा-बोला जाने वाला सच है कि ओसामा बिन लादेन को खड़ा करने और उसके जरिए इस्लाम को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इस काम में अमेरिकी कांग्रेस का बड़ा रोल है। विश्लेषक कहते हैं कि अमेरिकी कांग्रेस बड़े शातिराना तरीके से विश्व को दो सभ्यताओं (इस्लामी और इसाई ) के बीच बांटकर देखती है। फिर भी इसपर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा कम होती है। अल कायदा के उफान के दौरान इस अमेरिकी कांग्रेस की रीति नीति पर रोशनी डाली गई होती तो जार्ज बुश को बेलगाम होने से रोका जा सकता था। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भी अमेरिकी कांग्रेस के आचरण पर पोल खोलू रिपोर्ट या गंभीर लेख की उम्मीद थी। लेकिन ऐसे लेख ढूंढे नहीं मिलते। कम से कम हिंदी में तो ऐसा विश्लेषण पढ़ने को मिला ही नहीं जिसमें तसल्ली से बताई गई हो कि अमेरिका ने ही लादेन को खड़ा किया। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एक कांटा बनकर ही लादेन अफगानिस्तान आया था। विस्मित तरीके से तकरीर करने वाले लादेन ने अमेरिकी कांग्रेस की नीति का पालन करते हुए अफगानिस्तान में काबिज सोवियत संघ की सेना को पहले इस्लाम विरोधी करार दिया। जिससे सोवियत संघ का अफगानिस्तान में टिके रहना मुश्किल होता गया। ओसामा को इस काम में अमेरिका की सहूलियत पूर्ण मदद मिलती रही।

अमेरिकी कांग्रेस की मदद के लिए ही लादेन ने सउदी अरब से अपनी आलीशान हवेली और शानो शौकत भरी जिंदगी को छोडकर काबुल जाना कबूल किया। मिशन के लिए उसने तोराबोरा के पहाड़ी बिहड़ में आना पसंद किया। लादेन जैसों की मदद से न सिर्फ सोवियत संघ अफगानिस्तान से पलायन को मजबूर हुआ बल्कि उसके बाद जो हुआ वो विशद इतिहास के तौर पर हम सबके सामने है। अफगानिस्तान छोड़ते ही यूरोप से लेकर एशिया तक फैला एक विशाल देश, सोवियत संघ का साम्यवादी दीवार भरभराकर गिर गया और संघ के राज्य छोटे छोटे मुल्कों में तब्दील हो गए। फिर अफगानिस्तान और अफगानिस्तान को अमेरिकी झोली में डालने वाले लादेन का क्या हुआ? इससे शायद ही कोई अनजान है। यह अमेरिकी कांग्रेस की जीत है।

खैर, अपनी कांग्रेस की बात करें। योग प्रशिक्षक बाबा रामदेव के पंद्रह साल में शानदार आर्थिक तरक्की के कारणों की पड़ताल में लगी सरकारी एजेंसियों के सामने विस्मित करने वाले तथ्य आ रहे हैं। तथ्य सामने आ रहे है कि बाबा रामदेव की हरिद्वार में अट्टालिका खड़ी करने में उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार का सबसे ज्यादा योगदान रहा। मुख्यमंत्री रहते नारायण दत्त तिवारी बाबा पर जरुरत से ज्यादा मेहरबान रहे। किसानों की जमीन औने पौने दाम में लेकर पतांजलि योगपीठ को दिलाया गया। तिवारी सरकार के दौरान दवा फैक्टरियां से एजेंसियों को मुंह मोड़कर रखने का कहा गया। इस पर बाद की बीजेपी सरकार ने भी पालन किया। यह बाबा रामदेव में राजयोग के लक्षण विकसित करने के काम आया। बाबा के व्यवसायिक कारोबार को जमाने में कांग्रेस की सरकार ने पुरजोर सहयोग की। केंद्रीय एजेंसियों को रामदेव के व्यापार कर चुकाने में की गई गफलत का पता लग रहा है। इसमें सरकारी मशीनरी के गले भी फंसते दिख रहे हैं।

अब रामदेव से कन्नी काट चुके कांग्रेस की तरफ से याद किया जा रहा है कि काश माकपा नेता वृंदा कारत ने बाबा के फैक्टरी में जब शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की थी तब ही कांग्रेस को बाबा से दूरी बढ़ा लेनी चाहिए थी। तब माकपा के सहयोग से चल रही यूपीए एक की सरकार ने करात को शायद चुपके से समझा दिया कि अब बस भी करो। बाबा रामदेव के खिलाफ किसी आंदोलन से उतराखंड की कांग्रेस सरकार के लिए मुसीबत पैदा हो जाएगी। वो मामले को ज्यादा तूल दिए बगैर चुप हो गईं। कांग्रेस के सर्मथन के अभाव में वृंदा कारत का वह अभियान ऐन केन प्रकारेन दब गया।  यूपीए-2 से माकपा के रिश्ते इतने खराब हैं कि बाबा के खिलाफ फाइलों को खंगाल रही सरकार के सामने वृंदा करात को गवाह बनाना मुश्किल है। खुबसूरत महिला नेता करात को अब गंवारा नहीं लग रहा है कि वो आकर कहें, ‘मैं ही हूं जिसने पहली बार बाबा की बघिया उघाड़ने का काम शुरू किया था।’

जांच की एक फाइल कहती है कि बाबा रामदेव के साथ कंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के व्यवसायिक रिश्ते हैं। सुबोध कांत सहाय ने रांची में किस तरह बाबा के साथ मिलकर कारोबार की शुरूआत की? इसकी जांच जारी है। पता लग रहा है कि सरकारी मदद से बाबा को झारखंड की राजधानी रांची के बीच में फूड प्रोसेसिंग यूनिट खोलने की जमीन दिलवाई गई। यूनिट तो खुली नहीं लेकिन औने पौने दाम पर मंहगी व्यवसायिक जमीन पर बाबा की ट्रस्ट का कब्जा हो गया। ये भी पता लगा है कि रामलीला मैदान में रामदेव पर गाज गिरने के बाद चार दिनों तक लोगों की नजर से ओझल आचार्य बालकृष्ण दरसल भागे नहीं थे बल्कि ग्यारह हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति की कागजी खानापूर्ति में ही व्यस्त थे। बाबा के ज्यादा व्यसायी कंपनी अथवा ट्रस्ट के कागजी निदेशक बालकृष्ण के भाग जान के बारे में पूछने पर हरिद्वार में मीडिया को बाबा ने बताया था कि आचार्य बालकृष्ण किसी सिक्रेट मिशन में लगे हैं।

कांग्रेस की रपटीली नीति और गति का नतीजा है कि बाबा रामदेव को रामलीला मैदान को घेरकर पुलिस कार्रवाई का मजा चखाने की पहल से पहले बाबा को सरकारी खेमे में लेने की पृष्ठभूमि मध्य प्रदेश में केंद्रीय मंत्री कमलनाथ ने तैयार की थी। कमलनाथ प्रधानमंत्री के सिपहसलार बनने की कोशिश में लगे हैं औऱ मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह विरोधी खेमे से हैं। इसे लेकर दिग्विजय की नजर में नंबर बढ़ाने के लिए कांग्रेस के कई दिग्गज राज्य में केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के खिलाफ मध्यप्रदेश में प्रदर्शन विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस की एक अनकही राजनीति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर करने की चल रही है। इसलिए कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पार्टी – सरकार के दो खेमों में एक-एक में खुद को मजबूत करने में लगे हैं। तेजी से बढ़ रहे कांग्रेस -सरकार के कलह में बाजी मारने के लिए प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को बाबा रामदेव को अन्ना हजारे से बड़ा बनाने की चाहत में लगाया था। प्रधानमंत्री के जिस आदेश के तहत वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी समेत चार केंद्रीय मंत्री प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाते हुए योगगुरु की अगवानी में हवाई अड्डे पर चले गए थे उसकी आलोचना हुई। बाद में प्रधानमंत्री को भूल का अहसास कराया गया और कांग्रेस पार्टी की नीति के तहत ही सरकार को कड़ा रूख अपनाने पर मजबूर होना पड़ा।

अब कांग्रेस पार्टी की ताजातरीन कोशिश यूपी में चुनावी पर्यवेक्षक भेजकर कर पता लगाने की है कि मतदाताओं पर रामलीला मैदान की कार्रवाई का क्या असर है। अगले छह महीने में कांग्रेस को खुद को पूरी ताकत से यूपी में झोंक देना है। कोशिश यूपी चुनाव परिणाम के आधार पर बुजुर्ग मनमोहन सिंह को रिटायर करने की है। और 41 साल के बेरोजगार राहुल गांधी को अगले जन्म दिन से पहले प्रधानमंत्री के कारोबार में फंसा कर रख देने की है। यह असली कांग्रेस नीति  है। राहुल के पिता राजीव गांधी 40 साल की उम्र में ही प्रधानमंत्री की शपथ ले ली थी। अब कांग्रेस की राजनीति कवायद का नया हिस्सा है कि एक साल देर से ही सही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवाया जाय। इसके लिए उत्साही राहुल गांधी ने उस बयान को फिर से दोहरा है कि 1992 में यदि उनके परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो अयोध्या में विवादित ढांचा नहीं गिराया जाता। कांग्रेस में किसी गुजरे नेता के बारे में इस तरह की राय रखने का हक कांग्रेस में सिर्फ गांधी परिवार की विरासत थामने वाले को ही है।

प्रधानमंत्री बनने की राह पर निकले राहुल गांधी के बयान के कई निहितार्थ हैं। मसलन आने वाले वक्त में आसानी से यह कहा जा सकता है कि मनमोहन सिंह के राज में जो भी कथित अंधेरगर्दी हुई है वो नहीं होती यदि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सोनिया गांधी या फिर राहुल गांधी होते। बेचारे नरसिंह राव का जो कसूर था वो अब मनमोहन सिंह कर रहे हैं। नरसिंह राव को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की कथित कसूर के लिए गांधी परिवार की पालकी उठाने वालों ने खूब पसीना छुड़ाया था। तिवारी कांग्रेस का बनना। अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी को कथित असली (तिवारी )कांग्रेस के जरिए चुनाव में खेल में चित करवाना और विलय के लिए मजबूर करना। फिर झप्पट्टे से सीताराम केसरी का कांग्रेस अध्यक्ष बन जाना। सोनिया गांधी की शान में कसीदे पढ़ना और फिर सोनिया गांधी के अध्यक्ष बन जाने के दिन बुजुर्ग नेता केसरी का अन्याय-अन्याय चीखते हुए आंसू बहाकर दुनिया से चला जाना। सबकी नजरों से गुजरा सच है।

ज्यादा इतिहास कुरेदिएगा तो एक सच यह भी है कि शुरू में चितपावन ब्राह्मणों की टोली रही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगवार ने राजनीति का ककहरा ही कांग्रेस से सीखा था। उस वक्त हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के कई नेता कांग्रेस के साथ मिलकर काम करते थे। पहली बार कांग्रेस को सत्ता से उखाड फेंकने वाले जयप्रकाश नारायण कांग्रेस से थे। चंद्रशेखर कभी कांग्रेस के युवा तुर्कों के अगुवा थे लेकिन ये सब गांधी नेहरू परिवार से नहीं थे इसलिए कांग्रेस में उभर नहीं पाए। इनकी प्रतिभा को कांग्रेस में ठौर नहीं मिली। पारिवारिक विरासत की हैसियत से बोले राहुल गांधी के कथन का एक सच ये भी है।

ये कांग्रेस ही है जो अन्ना हजारे को आसमान पर चढ़ाने और उतारने में सांप नेवले के खेल का मजा ले रही है। प्रधानमंत्री की तरफ से कपिल सिब्बल अधिकारिक तौर पर बोलते हैं कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने से लोकपाल तानाशाह हो जाएगा। राहुल गांधी की तरफ से अक्सर बैटिंग करने वाले दिग्विजय सिंह जवाब में उल्टी राह थाम लेते हैं। अन्ना के साथ हो लेते हैं और सिब्बल का लगभग बांह मरोड़ते हुए कहते हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे मे रहना चाहिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं हैं। मिसाल देते हैं कि उन्होंने खुद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री को जांच एजेंसी के दायरे में रखने का प्रावधान लाया था। दिग्विजय सिंह का प्रधानमंत्री के कारिंदे सिब्बल पर किया गया पलटवार बताता है कि राहुल गांधी के लिए एक मौका और आने वाला है,  जिसमें वो कह पाएंगे कि अगर गांधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री की कुर्सी पर होता तो अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ इस तरह से पेश नहीं आया जाता जैसा डा. मनमोहन सिंह की सरकार आई है। कांग्रेस की यह नीति ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटा तेरे बाप का’ गजब की है।

एक और देखिए, जो कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का महिमा गान करते हैं वहीं वाईएसआर रेड्डी के निधन के बाद विरासत की कुर्सी पाने का सपना बुनने वाले जगनमोहन रेड्डी को धक्का देकर बाहर निकाल देते हैं। नरसिंह राव पर दोषारोपण करते समय भूल जाते हैं कि दिग्गज नेता राव ने अपने नौ संतानों में से किसी की भी राजनीतिक तौर पर जमने में मदद नहीं की थी। दिल्ली में निधन के बाद भी उनका कोई स्मृति स्थल देश की राजधानी में नहीं बनाया गया। राव ने प्रधानमंत्री की ताकत से परिपूर्ण होते हुए जमींदारी की खिलाफत करने वाले भूमिहीनों के बीच पैतृक डेढ़ सौ एकड़ जमीन बांट दी थी। फिर भी कांग्रेस की नीतिगत सोच कहती है त्याग से कुछ नहीं होता है क्योंकि नरसिंह राव नेहरू-गांधी के परिवार से तो नहीं आते हैं। इसलिए इनके महिमामंडन की जरूरत नहीं है। कांग्रेस की नई नीति में तो परिवार की धारणा में अब विरासत को राजीव गांधी के खून तक सीमित करने की बात हो रही है। इसी के तहत कांग्रेस के एतिहासिक दस्तावेज में अपातकाल के लिए इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर तोहमत लगाकर लघुता की मिसाल पेश की गई है। साफ कहा जा रहा है कि सच्चे कांग्रेसी तो सिर्फ राजीव गांधी ही थे या फिर वो हैं जिनके रगों में राजीव गांधी का खून दौड़ रहा है। इस बुने जा रहे तानाबाना के जरिए कांग्रेस के लोगों का आखिरी मकसद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की ख्वाहिश है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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