आखिरकार सत्‍ता को स्‍वीकार करनी पड़ी जनता की प्रभुसत्‍ता

अन्ना आन्दोलन की जीत ने देश में काफी समय बाद जनता की प्रभुसत्ता को स्थापित किया है। इस आन्दोलन ने पुनः साबित किया कि सत्ता और सरकार चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो उसे सच और इस सच के साथ खड़ी हुई जनता की भावनाओं के सामने झुकना पड़ता है। इस आंदोलन ने पिछले बीस वर्षों के आर्थिक सुधार के दौर में देश में पैदा हुई इस निराशा की भावना के कि कुछ नहीं हो सकता, को भी एक हद तक कम करने का काम किया। कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में मार्क्स ने लिखा था कि पूंजीवाद विकास के क्रम में मात्र उन हथियारों को ही पैदा नहीं करता बल्कि उन्हें चलाने वालों को भी पैदा करता है, जो उसके विनाश का कारण बनते है।

रामलीला मैदान में अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में लगातार पांच दिन रहते हुए मैं ने खुद करीब से देखा कि जिसे मध्यम वर्ग का आंदोलन कह कर खारिज किया जा रहा है उसमें और कोई नहीं पिछले 20 वर्षों से मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के बदौलत पैदा हुई मजदूर वर्ग की नयी पीढ़ी रही है। साफ्टवेयर, शापिंग माल्स, पत्रकारिता, सर्विस सेन्टरों, एनजीओं आदि में काम करने वाले ऐसे नौजवान है,  जो इस सुधार के बाद दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके में बसने आये और जिन्हें चौतरफा शोषण का शिकार रोज-ब-रोज की जिन्दगी में होना पड़ता है। रामलीला मैदान में पश्चिम उप्र, एनसीआर और हरियाणा के उन इलाकों से किसानों की बड़ी जमात आयी जिनकी जमीनें कारर्पोरेट और बडे़ घरानों के मुनाफे के लिए सरकारों ने धोखाधड़ी कर लूट ली है। वह आदिवासी थे जिन्हें प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए कारपोरेट-सरकार-माफिया गठजोड़ ने बर्बाद कर दिया। वह घरेलू महिलाएं थी जो नित बढ़ती महंगाई के चलते अपनी गृहस्थी के तनाव में तिल-तिल कर घुट रही है। उन छात्र नौजवानों की मौजूदगी थी, जिन्हें पहले पढ़ने के लिए जूझना होता है और फिर पढ़ाई के बाद रोजगार की चिन्ता के साथ जीना पड़ता है। आंदोलन शुरू जरूर हुआ भ्रष्टाचार के खिलाफ पर वास्तव में यह केन्द्र बन गया हर उस आक्रोश का जो व्यवस्था के खिलाफ था। इसलिए इस आंदोलन को समझने के लिए जितने पुराने फ्रेमवर्क थे, बुद्धिजीवी थे, तथाकथित आंदोलनकर्ता थे या देश के राजनीतिक दल थे वह असफल साबित हुए।

आंदोलन के शुरू से ही बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा इसे संविधान व संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने वाला और लोकतंत्र के लिए खतरा बताता रहा। कांग्रेस का समूचा नेतृत्व दिशाविहीन हो इसे पूर्व में हुए रामदेव के आंदोलन की तरह ही कुचलकर खत्म कर देने पर अमादा था। भाजपा इस आंदोलन के प्रति अपने रूख को ही तय नहीं कर पा रही थी। पहले उसने अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ जेल भरों का आह्वान किया पर बाद में उसे वापस ले लिया। यदि आशा कहीं से पैदा हुई तो वामपंथ की तरफ से ही जिसने 70 के दशक में जय प्रकाश आंदोलन के समय की गयी गलती से सबक लेते हुए अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ पूरे देश में लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले को मुद्दा बनाकर विरोध प्रदर्शन किया और 9 पार्टियों के साथ मिलकर 23 अगस्त को देशभर में सरकारी लोकपाल को रद्द करने और नया सशक्त लोकपाल बनाने के लिए अन्ना हजारे के प्रतिनिधियों से तत्काल वार्ता करने की मांग को उठाया।

दरअसल इस आंदोलन ने वास्तव में देश के लोकतंत्र की सीमाओं को एक बार फिर उजागर किया है। चाहे हम कितना भी समृद्ध और मजबूत लोकतंत्र के, पूरी दुनिया में सबसे बडे़ लोकतंत्र होने के कसीदे पढ़े सच तो यह है कि इस देश में न्यूनतम लोकतांत्रिक सुधार भी बडे़ आंदोलनों के बाद ही सम्भव हो पाते हैं। इस मामले में भी अन्ना पक्ष की मांग महज इतनी ही थी कि देश में जो कानूनी रास्ते से, नीतियां बनाकर लूट और भ्रष्टाचार किया जा रहा है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय तक ने गहरी चिंता जाहिर की है, उस पर रोक के लिए प्रभावी और सशक्त लोकपाल कानून बनाया जाए।

पिछले चालीस साल से भी ज्यादा समय से लोकतांत्रिक सुधार के इस न्यूनतम काम को पूरा करने के बजाए सरकार ने मुंह बचाने के लिए नख दंतविहीन सरकारी लोकपाल को संसद में पेश कर उसे स्थायी समिति के हवाले कर दिया। संसद सर्वोच्चता की दुहाई देने वालों से कोई पूछे कि यदि संसद और सरकार ने अपने न्यूनतम लोकतांत्रिक सुधार के दायित्व को पूरा किया होता तो क्या अन्ना जैसे किसी भी बुजुर्ग को अनशन पर बैठने की जरूरत पड़ती। वास्तव में जबसे मनमोहनी सुधार शुरू हुआ है इस देश में जनआंदोलन के दबाव में जो भी जनपक्षधर कानून बने थे या सरकार के सामाजिक दायित्व तय किये गये थे उनसे एक-एक कर हर तरह की सरकारों ने अपने कदम पीछे खीचें और उन्हें पलट देने का ही प्रयास किया। इनके खिलाफ जितनी भी लोकतांत्रिक आवाजें उठी उन्हें या तो निर्ममता के साथ कुचल दिया या फिर अनसुना कर दिया गया। देशभर में किसानों, नौजवानों समेत समाज के विभिन्न तबकों के आंदोलनों पर दमन और मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून जैसे काले कानून के खात्में के लिए दस वर्षों से भी ज्यादा समय से अनशनरत इरोम शर्मिला के प्रति भारतीय राजव्यवस्था की अनदेखी इसके उदाहरण है।

इस आंदोलन के प्रति भी भारतीय शासक वर्ग का और उसकी दो प्रतिनिधि पार्टियों कांग्रेस और भाजपा का यही रूख था। हद तो यह हो गयी कि इन दलों ने बजाए इसके कि पिछले 20 वर्षों से जारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के सरकारों द्वारा उड़ाए जा रहे मजाक और उन्हें बार-बार कमजोर करने की दलों द्वारा की गयी कोशिशों पर आत्मा आलोचना करने के, इस आंदोलन का भण्डाफोड़ करने में ही अपनी पूरी ताकत लगा दी। आंदोलन के वक्त दिल्ली में तो आमचर्चा थी कि उन दलित-मुस्लिम-पिछडे़ नेताओं के लिए सरकार ने अटैची खोल दी है,  जो इस आंदोलन का विरोध कर सकें। एक दलित नेता ने तो बकायदा दिल्ली में इसी पैसे के बदौलत आंदोलन के विरोध में मार्च तक किया। इस आंदोलन के बरखिलाफ संविधान की दुहाई देते हुए डा. अम्बेडकर को खड़ा करने की कोशिश की। जबकि इतिहास गवाह है कि डा. अम्बेडकर ने खुद मौजूदा संविधान से अपने को अलग कर लिया था। एक मुस्लिम नेता ने आंदोलन के तौर तरीके पर सवाल उठाएं। लेकिन इन तबकों के बीच से पैदा हुयी नयी पीढ़ी ने जो आज मुख्यधारा में रहकर विकास चाहती है इन तमाम प्रयासों को नकार दिया। इतना ही नहीं हमने देखा कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने यूपीए और एनडीए के उन लोगों को आंदोलन के खिलाफ संसद में बोलने के लिए उतारा जो खुद आंदोलन से पैदा हुए है चाहे वह शरद यादव हो या लालू यादव। यह संसद में लोकपाल कानून के जरिए देश में दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक कार्ड खेलने में लग गए।

हमारे जैसे लोगों को आश्‍चर्य होता है कि दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक के सामाजिक न्याय का नाम लेकर लोकतांत्रिक सुधार के महिला आरक्षण से लेकर लोकपाल के कानूनों को रोकने में शासक वर्ग के औजार बने इन तथाकथित सामाजिक न्याय के मसीहों का जलवा पिछडे़ मुसलमानों को अलग आरक्षण देने, दलित ईसाइयों व मुसलमानों को अनु. जाति का दर्जा देने की संस्तुति करने वाली रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पोट को लागू कराने व अति पिछड़ों को पूरे देश में अलग आरक्षण कोटा देने पर क्यों नहीं दिखाई देता? जहां-जहां इनकी सरकारें रही है या इस समय है वहां इनका पालन क्यों नहीं हो रहा। सबने देखा कि इस आंदोलन को सहयोग कर रहे हर तरह के लोगों पर हमला किया गया। मीडिया के खिलाफ चिल्ला- चिल्ला कर भाषण देने वालों को समाचार चैनलों में राखी सांवत के नाच और लाफ्टर शो से इतनी बड़ी दिक्कत कभी नहीं हुई जितना कि इस आंदोलन की कवरेज से। ओमपुरी जैसे लोगो पर भाजपा ने शराब पीकर भाषण देने का आरोप लगाया और जिन्हें आज भी आतंकित किया जा रहा है। इतना ही नहीं अग्निवेश, रामदेव जैसों का इस्तेमाल आंदोलन को तोड़ने के लिए किया गया।

इस आंदोलन में रहते हुए मैं ने महसूस किया कि आंदोलन में कहीं भी धर्म, जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं था। बल्कि गोविन्दाचार्य, चेतन चौहान, सीपी ठाकुर से लेकर तमाम ऐसे नेता थे, जिन्हें आयोजकों ने सचेत ढ़ग से मंच पर बुलवाने से मना कर दिया। बहरहाल हर प्रकार के कुत्सित प्रचार, दमन और अवहेलना के कोशिशों को नकार कर यह आंदोलन सफल हुआ। इस आंदोलन की जो भी कमियां हों उन पर खुले दिल से विचार हो सकता है,  पर इसने सत्ता से टकराने और जीत जाने की जनाकांक्षाओं को निश्चित रूप से बहुत बढ़ा दिया है। इसको चलाने वालों के ऊपर यह एक बड़ी जबाबदेही है कि वह इन जनाकांक्षाओं को देश में प्रतिरोध की एक बड़ी शक्ति में तब्दील करें। साथ ही यह भी कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जिन सुधारात्मक सवालों को वह उठा रहे है,  वह राजनीतिक क्षेत्र में भी उनसे दखल देने की मांग करेगा,  क्योंकि मौजूदा राजनैतिक परिपाटी इसके खिलाफ है। इस नाते शुरुआत चाहे जहां से आंदोलनकर्ताओं ने की हो उन्हें जनपक्षधर जनवादी राजनीतिक विकल्प का केन्द्र भी बनाना होगा।

लेखक दिनकर कपूर जनसंघर्ष मोर्चा के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हैं.

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