आज भी नक्‍श लायलपुरी पर बीस रूपये कर्ज है

शेष नारायण सिंह: उनकी नई किताब का संकलन आया : गीतकार नक्श लायलपुरी की नज्मों का एक संकलन आया है. ‘आँगन-आँगन बरसे गीत’ नाम की यह किताब उर्दू में है. पिछले 50 से भी ज्यादा वर्षों से हिन्दी फिल्मों में उर्दू के गीत लिख रहे नक्श लायलपुरी एक अच्छे शायर हैं. कविता को पूरी तरह से समझते हैं लेकन जीवनयापन के लिए फ़िल्मी गीत लिखने का काम शुरू कर देने के बाद उसी दुनिया के होकर रह गए. रस्मे उल्फत निभाते रहे और हर मोड़ पर सदा देते रहे. उनकी कुछ नज्मों के टुकड़े तो आम बोलचाल में मुहावरों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं. नक्श लायलपुरी ने भारत के बँटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था. 1947 में वे शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में पैदल दाखिल हुए थे. कुछ दिन रिश्तेदारों के यहाँ जालंधर में रहे लेकिन वहां दाना-पानी नहीं लिखा था. उनके पिता जी इंजीनियर थे.

लखनऊ में किसी इंजीनियर दोस्त से संपर्क किया तो उसने कहा कि लखनऊ आ जाओ. वहीं ऐशबाग़ में एक सरकारी प्लाट मिल गया. सड़क की तरफ तो कारखाना बना लिया गया और पीछे की तरफ रहने का इंतज़ाम कर लिया गया. इसी लखनऊ शहर से भाग कर नक्श लायलपुरी मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने आये थे. हालांकि उन्होंने अपना पहला फ़िल्मी गाना निर्माता जगदीश सेठी की फिल्म के लिए 1951 में लिखा था लेकिन वह फिल्म रिलीज़ नहीं हुई. 1952 में दूसरी फिल्‍म जग्गू के लिए गाने लिखे जो पसंद किये गए. उन्हें गीतकार के रूप में पहचान ‘तेरी तलाश में’ नाम की फिल्म से मिली. इस फिल्म में आशा भोंसले ने उनके गीत गाये थे. एक बार नाम हो गया तो काम मिलने लगा और गाड़ी चल पड़ी.

उर्दू के जानकार नक्श लायलपुरी को खुशी है कि उनको ऐसे संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला जो उर्दू ज़बान को जानते थे. ऐसे संगीतकारों में वे नौशाद का नाम बहुत इज्ज़त से लेते हैं. नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बीआर इशारा की फिल्म ‘चेतना’ से मिली और उसमें उनकी नज़्म ‘मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा’ बहुत ही सराही गयी. जिन लोगों ने रेहाना सुलतान की चेतना और दस्तक देखी है उन्हें मालूम है कि बेहतरीन अदाकारी किसी कहते हैं. रेहाना सुलतान की परंपरा को ही स्मिता पाटिल ने आगे बढ़ाया था. नक्श लायलपुरी के फ़िल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही लेकिन आजकल  वह बात नहीं है. फिल्म संगीत की दिशा में बहुत सारे प्रयोग हो रहे हैं और नए-नए लोग सामने आ रहे हैं. लेकिन वे आज भी टेलीविज़न सीरियलों के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं.

हिन्दी फिल्मों के इस शायर की यात्रा बहुत ही मुश्किल थी. सबसे बड़ी मुसीबत तो तब आई जब उन्होंने अपने बचपन में सआदत हसन मंटो की किसी कहानी में पढ़ा कि जब पंजाबी इंसान उर्दू बोलता है तो लगता है कि कोई झूठ बोल रहा है. शायद मंटो साहब ने उच्चारण के तरीके अलग होने की वजह से यह बात कही हो. नक्श लायलपुरी पंजाबी हैं और उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि वे उर्दू ही बोलेगें, झूठ कभी नहीं बोलेगें. उर्दू पढ़ने और बोलने में उन्होंने मेहनत की और उर्दू के नामवर शायर बन गए. मुंबई में उनके संघर्ष का शुरुआती दौर भी मामूली नहीं हैं. घर से भाग कर मुंबई आये थे और जब कल्याण स्टेशन पर उतरे तो जेब में एक चवन्नी बची थी. उन दिनों कोयले के इंजन से चलने वाली गाड़ियां होती थीं. लखनऊ से दिल्ली तक की तीन दिन की यात्रा में कपडे़ एकदम काले हो गए थे.

दिमाग में कहीं से यह बैठा था कि जब किसी शहर में रोज़गार की तलाश में जाओ तो खाली पेट नहीं जाना चाहिए, भूख भी लगी थी, दिन के 12 बजे थे, उन दिनों कल्याण स्टेशन के प्लेटफार्म पर छत नहीं थी. चार आने की पूरियां खरीद लीं और ज्यों ही पहला निवाला मुंह में डालने के लिए उठाया कि हाथ का दोना चील झपट कर ले गयी. भूखे ही शहर में दाखिल हुए. दादर स्टेशन के पास खस्ता हाल टहल रहे थे कि सामने से एक बुज़ुर्ग सरदार जी आते नज़र आये. उनसे पूछ लिया कि यहाँ कोई धर्मशाला है क्या? उन्हीं कोयले से सने कपड़ों और भूखे नौजवान को देख कर शायद उन्हें तरस आ गयी और उन्होंने माटुंगा के गुरुद्वारे का पता बता दिया. लेकिन वहां सिर्फ आठ दिन रह सकते थे.

वहीं एक सिख नौजवान था, जब उसको पता लगा कि यह खस्ता हाल इंसान शायर है तो वह प्रभावित हुआ और उसने साबुन और लुंगी दी और कहा कि अपने कपड़े तो धो लो. जाते वक्त उसने बीस रूपये भी दिए. मना करने पर उसने कहा कि जब हो जाएँ तो वापस  दे देना. वह क़र्ज़ आज तक बाकी है. किस्मत ने पलटा खाया और सड़क पर लाहौर के पुराने परिचित दीपक आशा मिल गए. वे एक्टर थे और अब मुंबई में ही रह रहे थे. अपने घर ले गए और फिर किसी शरणार्थी कैम्प में रहने का इंतज़ाम करवा दिया. उसके बाद अपना यह शायर मानवीय संवेदनाओं को गीतों एक माध्यम से सिनेमा के दर्शकों तक पंहुचाता रहा. आज बुज़ुर्ग हैं लेकिन शान से अपना बुढ़ापा बिता रहे हैं. आज भी उनके चाहने वालों का एक वर्ग उन्हें मिलता जुलता रहता है.

लेखक शेष नारायण सिंह देश में हिंदी के जाने-माने स्तंभकार, पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *