मेरे बच्चे मुझसे अच्छे पत्रकार हैं

मुझे जीवन में करीब पांच साल शिक्षक के रूप में काम करने का मौक़ा मिला. पहली बार 1973 में जब मैं एक डिग्री कालेज में इतिहास का मास्टर था. दो साल बाद निराश होकर वहां से भाग खड़ा हुआ. वहां बीए के बच्चों को इतिहास पढ़ाया था मैंने. वे बच्चे मेरी ही उम्र के थे. कुछ उम्र के लिहाज़ से मेरे सीनियर भी रहे होंगे. लेकिन आज तक हर साल 5 सितम्बर के दिन वे बच्चे मुझे याद करते हैं. कुछ तो टेलीफोन भी कर देते हैं. दुबारा 2005 में फिर एक बार शिक्षक बना. इस बार पत्रकारिता पढ़ाता था. तीन बैच के बच्चे मेरे विद्यार्थी हुए. यह दौर मेरे लिए बहुत उपयोगी था. पत्रकारिता का जो सैद्धांतिक पक्ष है उसके बारे में बहुत जानकारी मुझको मिली. अपने विद्यार्थियों के साथ-साथ मैं भी नई बातें सीखता रहा. तीन साल बाद नौकरी से अलग  हो गया. शायद वहां मेरा काम पूरा हो चुका था. लेकिन इन वर्षों में मैं ने जिन बच्चों को पढ़ाया उन पर मुझे गर्व है.

मुसलमानों के खिलाफ चल रही हैं सलमान खुर्शीद की कोशिशें

शेषजी अल्पसंख्यकों के बारे में कांग्रेस पार्टी की सोच एक बार फिर बहस के दायरे में आ गयी है. एक तरफ तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की लाइन है जो मुसलमानों से सम्बंधित किसी भी मसले पर जो कुछ भी कहते हैं, वह आम तौर पर मुसलमानों के हित में होता है और दूसरी तरफ केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद हैं जो मुसलमानों के हित की बात करते समय यह ध्यान रखते हैं कि दिल्ली की काकटेल सर्किट के उनके बीजेपी वाले दोस्त नाराज़ न हो जाएँ. दिग्विजय सिंह सरकार में नहीं हैं और उनके विचारों का विरोध कांग्रेस के ज़्यादातर नेता करते पाए जाते हैं. दिग्विजय सिंह के विचारों को वे कांग्रेसी गलत बताते हैं,  जो कांग्रेस में होते हुए भी हिंदुत्व की राजनीति के पोषक हैं.

शिक्षा के बिना खत्‍म नहीं होगा मुसलमानों का पिछड़ापन

शेषजीओसामा बिन लादेन के मर जाने के बाद पूरी दुनिया से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. अमरीका में वहां के राष्ट्रपति की लोकप्रियता में 11 प्रतिशत की  बढ़ोतरी हुई है, यूरोप वाले पाकिस्तान को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के चेहरे खिसियाहट में तरह-तरह के रंग बदल रहे हैं, पाकिस्तानी हुकूमत की बेचारगी छुपाये नहीं छुप रही है. पाकिस्तानी अवाम को साफ लगने लगा है कि भारत से पाकिस्तानी शासकों ने जिस तरह की दुश्मनी कर रखी है, उसके नतीजे बहुत भयानक हो सकते हैं. आग में घी डालते हुए भारत के सेना प्रमुख ने बयान दे दिया है कि भारतीय सेना अमरीकी कार्रवाई जैसे आपरेशन को अंजाम दे सकती है. आतंक के कारोबार में लगे पाकिस्तानी नेता सड़कों पर रो रहे हैं और अपने लोगों को समझा नहीं पा रहे हैं कि उनके तरीके को लोग क्यों सही मानें. जब उनके सबसे बड़े आका को ही उसके घर में घुसकर अमरीकी मार सकते हैं तो यह बेचारे किस खेल की मूली हैं.

सन बयालीस जैसा माहौल है भ्रष्‍टाचार के खिलाफ

शेषजीभ्रष्टाचार की चर्चाओं से घिरे देश में विकीलीक्स के संपादक जूलियन असांज ने एक और आयाम जोड़ दिया है. फरमाते हैं कि स्विस बैंकों में जमा काले धन के खातेदारों में बहुत सारे नाम भारतीयों के हैं. इस देश का मध्य वर्ग लगातार भ्रष्टाचार की कहानियां सुन रहा है. टूजी, कामनवेल्थ और येदुरप्पा के घोटालों के माहौल में जब अन्ना हजारे का आन्दोलन आया तो वे सारे लोग मैंदान में आ गए जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. ज़ाहिर है यह किसी भी सत्ताधारी पार्टी के लिए बहुत बड़ी खतरे की घंटी है.  भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सारे मामले में जो सबसे दिलचस्प बात रही, वह यह कि राजनीतिक पार्टियों के सदस्य अपने हिसाब से भ्रष्टाचार की व्याख्या करते रहे, अपने विरोधी को ज्यादा भ्रष्ट बताते रहे लेकिन अखबार पढ़ने वाले देश के उस जागरूक वर्ग ने नेताओं की  बातों को गंभीरता से नहीं लिया.

खैरात लेने के बाद अमेरिका को आंखें दिखाने लगा है पाकिस्‍तान

शेषजीपाकिस्तान की मदद करके अब अमरीका पछता रहा है. अब अमरीकी अधिकारी वे बातें सार्वजनिक रूप से कहने लगे हैं जो आम तौर पर दोनों देशों के बड़े नेता बंद कमरों में कहा करते थे. मसलन अब अमरीकी फौज के मुखिया ऐलानियाँ कह रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना और उसकी संस्था आईएसआई आतंकवाद की प्रायोजक है. अभी पिछले हफ्ते पाकिस्तानी वित्त सचिव हफीज शेख ने कह दिया कि यह सच नहीं है कि उनका देश अमरीकी मदद से फायदा उठा रहा है. अमरीकी अधिकारियों ने फ़ौरन फटकार लगाई कि वित्त सचिव महोदय गलत बयानी कर रहे हैं. अमरीकी सरकार की तरफ से बताया गया कि पिछले दस वर्षों में अमरीका पाकिस्तान को बीस अरब डालर की मदद कर चुका है.

सोनिया गाँधी को गुस्सा क्यों आता है?

शेषजीइस बात में दो राय नहीं है कि अन्ना हजारे सर्वोच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से बहुत चिंतित हैं. उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में बिताया है. फौज की नौकरी ख़त्म करने के बाद उन्होंने सही गांधीवादी तरीके से अभियान चलाया और अपने गाँव को बाकी गावों से बेहतर बनाया. उनके गाँव में कुछ ऐसे परिवार भी हैं जो ऊब कर बड़े शहरों में चले गए थे लेकिन फिर वापस आ गए हैं. अन्ना को उनके समाज में बहुत ही सम्मान से देखा जाता है. ज़ाहिर है धीरे-धीरे ईमानदारी से काम करते हुए वे आज देश में एक आन्दोलन खड़ा करने में सफल रहे हैं.

जनता पार्टी की असफलता ने सामाजिक बराबरी के संघर्ष को दिया मुकाम

शेषजीआज से ठीक 34 साल पहले 24 मार्च 1977 के दिन मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. कांग्रेस की स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता ने फैसला सुना दिया था. अजीब इत्तेफाक है कि देश के राजनीतिक इतिहास में इतने बड़े परिवर्तन के बाद सत्ता के शीर्ष पर जो आदमी स्थापित किया गया, वह पूरी तरह से परिवर्तन का विरोधी था. मोरारजी देसाई तो इंदिरा गाँधी की कसौटी पर भी दकियानूसी विचारधारा के राजनेता थे, लेकिन इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी की सत्ता से मुक्ति की अभिलाषा ही आम आदमी का लक्ष्य बन चुकी थी, इसलिए जो भी मिला उसे स्वीकार कर लिया.

वो समाज जाहिल है, जिसमें औरतों का सम्‍मान नहीं है

शेषजीपिछले दिनों नई दिल्ली में एक पत्रकार संगठन के कार्यक्रम में महिलाओं के प्रति समाज के रवैये के बारे में आयोजित चर्चा में शामिल होने का मौक़ा मिला. आम तौर पर महसूस किया गया कि समाज के रूप में औरतों के प्रति हमारा रुख दकियानूसी है और उसको हर हाल में बदलना होगा. इस बहस का असर यह हुआ कि बहुत सारी तस्वीरें दिमाग मे घूमने लगीं, जहां औरत को पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे का मना जाता रहा है. जब आरएसएस के कारसेवक अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद को ढहा रहे थे तो वहां बड़ी संख्या में पत्रकार भी मौजूद थे. आज की तरह लाइव टेलीविज़न का ज़माना नहीं था. उन दिनों सबसे ज्यादा विश्वसनीय ख़बरों का सूत्र बीबीसी को ही माना जाता था. बीबीसी के भारत संवाददाता मार्क टुली भी वहां थे.

सुषमा स्‍वराज को कमजोर करने की संघी साजिश

शेषजीबीजेपी में शीर्ष स्तर पर गड़बड़ी के संकेत साफ़ नज़र आने लगे हैं. मुख्य सतर्कता आयुक्त के मसले पर लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जो कुछ भी किया उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्ववास रखने वालों को संतोष ही होगा. सुषमा स्वराज ने सीवीसी की नियुक्ति के मामले में जो भी काम किया है, वह शुरू से अंत तक मर्यादा की मिसाल है. जानकार बताते हैं कि अगर उनका आचरण ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले वक़्त में वे एक स्टेट्समैन राजनेता के रूप में स्थापित हो जाएंगी. संविधान में दी गयी व्यवस्था के तहत लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज उस सलेक्शन कमेटी की सदस्य हैं, जो सीवीसी का चुनाव करती है.

ग्रामीण विकास की निगरानी पर बाबूतंत्र की लगाम

शेषजीनौकरशाही ने जनाकांक्षाओं को काबू करने की एक और राजनीतिक कोशिश पर बाबूतंत्र की लगाम कस दी है. ग्रामीण विकास मंत्रालय की योजनाओं के ऊपर नज़र रखने की गरज से राजनीतिक स्तर पर तय किया गया था कि पूरे देश में ग्रामीण विकास की सभी योजनाओं की मानिटरिंग ऐसे लोगों से करवाई जायेगी, जो सरकार का हिस्सा न हों. वे ग्रामीण इलाकों का दौरा करेंगे और अगर कहीं कोई कमी पायी गयी तो उसकी जानकारी केंद्र सरकार को देंगे, जिसके बाद उसे दुरुस्त करने के लिए ज़रूरी क़दम उठाये जा सकें. इन लोगों को राष्ट्रीय स्तर का मॉनिटर (एनएलएम) का नाम दिया गया है. राजनीतिक इच्छा यह थी कि बाबूतंत्र के बाहर के लोगों के इनपुट की मदद से ग्रामीण विकास की योजनाओं को और बेहतर बनाया जाएगा. लेकिन नौकरशाही ने इस योजना को अवकाश प्राप्त मातहत अफसरों के पुनर्वास के लिए इस्तेमाल करने की चाल चल दी.

हर स्‍तर पर आरएसएस का वैचारिक विरोध जरूरी

शेषजीमध्यप्रदेश में खंडवा के गवर्नमेंट कालेज के एक प्रोफेसर को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. उसका चेहरा काला किया और उसे लात घूंसों और जूतों से मारा. जान बचाने के लिए जब वह अध्यापक भाग कर प्रिंसिपल के आफिस में छुप गया तो वहां से भी घसीट कर बाहर लाये और उसको अधमरा कर दिया. संतोष की बात यह है कि वह अभी जिंदा है वरना इसी  अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के सदस्यों ने कुछ वर्ष पहले उज्‍जैन में एक प्रोफ़ेसर को पीट-पीट कर मार डाला था. इसमें कुछ भी नया नहीं है. एबीवीपी की मालिक संस्था आरएसएस है और वहां मतवैभिन्य के लिए कोई स्पेस नहीं होता.

उल्‍टी पड़ गई करुणानिधि की चाल

शेषजी: कांग्रेस ने डीएमके को औकात दिखाने के लिए किया 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की तलवान का इस्‍तेमाल : तमिलनाडु की पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम से पिंड छुडाने की कांग्रेस पार्टी की कोशिश ने दिल्ली में राजनीतिक उथल-पुथल पैदा कर दी है. शुरू में तो डीएमके वालों को लगा कि मामला आसानी से धमकी वगैरह देकर संभाला जा सकता है लेकिन बात गंभीर थी और कांग्रेस ने डीएमके को अपनी शर्तें मानने के लिए मजबूर कर दिया. कांग्रेस को अब तमिलनाडु विधान सभा में 63 सीटों पर लड़ने का मौक़ा मिलेगा, लेकिन कांग्रेस का रुख देख कर लगता है कि वह आगे भी डीएमके को दौन्दियाती रहेगी.

मिस्र में अमरीकी विदेशनीति की अग्निपरीक्षा

शेषजीकाहिरा के तहरीर चौक पर आज लाखों लोग जमा हैं और हर हाल में सत्ता पर कुण्डली मारकर बैठे तानाशाह से पिंड छुडाना चाहते हैं. जहां तक मिस्र की जनता का सवाल है, वह तो अब होस्नी मुबारक को हटाने के पहले चैन से बैठने वाली नहीं है लेकिन अमरीका का रुख अब तक का सबसे बड़ा अड़ंगा माना जा रहा है. बहरहाल अब तस्वीर बदलती नज़र आ रही है. शुरुआती हीला-हवाली के बाद अब अमरीका की समझ में आने लगा है कि मिस्र में जो जनता उठ खड़ी हुई है उसको आगे भी बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता. अब लगने लगा है कि अमरीकी विदेशनीति के प्रबन्धक वहां के तानाशाह होस्नी मुबारक को कंडम करने के बारे में सोचने लगे हैं. यह अलग बात है अभी सोमवार तक विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इसी चक्कर में थीं कि मिस्र में सत्ता परिवर्तन ही हो. यानी अमरीकी हितों का कोई नया चौकीदार तैनात हो जाए जो होस्नी मुबारक का ही कोई बंदा हो कहीं.

मिस्र में अब ताज उछाले जाएंगे, तख्‍त गिराए जाएंगे

शेषजीमिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की विदाई का वक़्त करीब आ पहुंचा है. लगता है अब वहां ज़ुल्मों-सितम के कोहे गिरां रूई की तरह उड़ जायेंगे. विपक्ष की आवाज़ बन चुके संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उच्च अधिकारी मुहम्मद अल बरदेई ने साफ़ कह दिया है कि होस्नी मुबारक को फ़ौरन गद्दी छोड़नी होगी और चुनाव के पहले एक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना भी करनी होगी. पिछले तीस साल से अमरीका की कृपा से इस अरब देश में राज कर रहे मुबारक को मुगालता हो गया था कि वह हमेशा के लिए हुकूमत में आ चुके हैं. लेकिन अब अमरीका को भी अंदाज़ लग गया है कि होस्नी मुबारक को मिस्र की जनता अब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है. तहरीर चौक पर जुट रहे लोगों को अब किसी का डर नहीं है. राष्ट्रपति मुबारक फौज के सहारे राज करते आ रहे हैं, लेकिन लगता है कि अब फौज भी उनके साथ नहीं है. तहरीर चौक में कई बार ऐसा देखा गया कि अवाम फौजी अफसरों को हाथों हाथ ले रही है. यह इस बात का संकेत है कि अब फौज समेत पूरा देश बदलाव चाहता है.

आज भी नक्‍श लायलपुरी पर बीस रूपये कर्ज है

शेष नारायण सिंह: उनकी नई किताब का संकलन आया : गीतकार नक्श लायलपुरी की नज्मों का एक संकलन आया है. ‘आँगन-आँगन बरसे गीत’ नाम की यह किताब उर्दू में है. पिछले 50 से भी ज्यादा वर्षों से हिन्दी फिल्मों में उर्दू के गीत लिख रहे नक्श लायलपुरी एक अच्छे शायर हैं. कविता को पूरी तरह से समझते हैं लेकन जीवनयापन के लिए फ़िल्मी गीत लिखने का काम शुरू कर देने के बाद उसी दुनिया के होकर रह गए. रस्मे उल्फत निभाते रहे और हर मोड़ पर सदा देते रहे. उनकी कुछ नज्मों के टुकड़े तो आम बोलचाल में मुहावरों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं. नक्श लायलपुरी ने भारत के बँटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था. 1947 में वे शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में पैदल दाखिल हुए थे. कुछ दिन रिश्तेदारों के यहाँ जालंधर में रहे लेकिन वहां दाना-पानी नहीं लिखा था. उनके पिता जी इंजीनियर थे.

यूपी में मुसलमानों के वोट पर सबकी नजर

शेषजीकेंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार हो चुका है. कुछ मंत्रियों की छुट्टी की भी चर्चा थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं, हालांकि तीन नए लोगों को ही मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. कई मंत्रियों के विभाग भी बदले गए. अगले दो वर्षों में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. जानकार बताते हैं कि यह विस्तार आगामी चुनावों को ध्यान में रख कर किया गया है. मायावती ने उत्तर प्रदेश विधान सभा के उम्मीदवारों की सूची जारी करके राज्य की राजनीति की रफ़्तार को तेज़ कर दिया है. उत्तर प्रदेश में दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है. बीजेपी की शुरुआती कोशिश तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के ज़रिये चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की थी, लेकिन अब लगता है कि उनकी रणनीति भी बदल गयी है. खबर है कि अपेक्षाकृत उदार विचारों वाले राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश की कमान दी जाने वाली है. उनके मुख्य सहयोगी के रूप में मुख्तार अब्बास नकवी को रखे जाने की संभावना है.

आम आदमी के मुंह पर तमाचा है पेट्रोल की बढ़ी कीमत

शेषजीकेंद्र सरकार ने महंगाई की एक और खेप आम आदमी के सिर पर लाद दिया है. आलू प्याज सहित खाने की हर चीज़ की महंगाई की मार झेल रही जनता के लिए पेट्रोल की बढ़ी कीमतें बहुत भारी हमला हैं. हालांकि फौरी तौर पर गरीब आदमी सोच सकता है कि बढ़ी हुई कीमतों से उनका क्या लेना-देना लेकिन सही बात यह है कि यह मंहगाई निश्चित रूप से कमरतोड़ है. 1969 में जब इंदिरा गाँधी ने डीज़ल और पेट्रोल की कीमतों में मामूली वृद्धि की थी तो साप्ताहिक ब्लिट्ज के महान संपादक, रूसी करंजिया ने अपने अखबार की हेडिंग लगाई थी कि पेट्रोल के महंगा होने से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, सबसे बड़ी चपत उसी को लगेगी. उन दिनों लोगों की समझ में नहीं आता था कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने से  आम आदमी कैसे प्रभावित होगा. करंजिया ने अगले अंक में ही बाकायदा समझाया था कि किस तरह से पेट्रोल की कीमत बढ़ने से आम आदमी प्रभावित होता है.

आरएसएस पर प्रतिबंध की बात अहमकाना

शेषजीकांग्रेस पार्टी के एक प्रवक्ता ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध की मांग की है. उन्होंने पत्रकारों से बताया कि सरकार को चाहिए कि आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करे. कांग्रेस का यह बहुत ही गैर-ज़िम्मेदार और अनुचित प्रस्ताव है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में सब को संगठित होने का अधिकार है. आरएसएस भी एक संगठन है उसके पास भी उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य जमात को. पिछले कुछ वर्षों से आरएसएस से जुड़े लोगों को आतंकवादी घटनाओं में पुलिस वाले पकड़ रहे हैं.. हालांकि मामला अभी पूरी तरह से जांच के स्तर पर ही है, लेकिन आरोप इतने संगीन हैं उनका जवाब आना ज़रूरी है. ज़ाहिर है कि आरएसएस से जुड़े लोगों को तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक वह भारतीय दंड संहिता की किसी धारा के अंतर्गत दोषी न मान लिया जाए. यह तो हुई कानून की बात लेकिन उसको प्रतिबंधित कर देना पूरी तरह से तानाशाही की बात होगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार कांग्रेस के इस अहमकाना सुझाव पर ध्यान नहीं देगी.

हर बच्‍चे के हाथ में लैपटाप होना चाहिए

शेषजीदिल्ली में नौंवें प्रवासी भारतीय दिवस का उदघाटन हुआ. इस अवसर पर भारत की ताक़त की हनक नज़र आई. शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने साफ़ कहा कि अब उद्योग और व्यापार और उस से जुड़ी चीज़ों के अवसर भारत में ही हैं, इसलिए भारतीय मूल के लोगों को नयी हालात में अपनी बात कहने की आदत डालनी पड़ेगी. उन्होंने कहा कि भारत में जो लोग भी आ रहे हैं वे यहाँ बेहतर अवसर की तलाश में आ रहे हैं. इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में निवेश की संभावनाओं पर भी एक सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य वक्तव्य प्रधानमंत्री के सलाहकार सैम पित्रोदा ने दिया. उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में नयी टेक्नालॉजी का रोल बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन शिक्षा का महत्व सही अर्थों में समझना होगा. ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा में सुधार को एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में विकसित किया जाए. कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय मूल के साढ़े बारह करोड़ लोग जो विदेशों में बसे हैं, उन्हें भारत में काम करने के लिए प्रेरणा दी जा सके.

आरक्षण के भीतर आरक्षण की राजनीति

शेषजी: नीतीश कुमार के महादलित और राजनाथ के फार्मूले की आई याद : आरक्षण आज की राजनीति का एक अजीब हथियार बन गया है. राजस्थान के गुर्जर समुदाय अपने आपको मीणा समुदाय की तरह जनजाति घोषित करवाने के लिए आन्दोलन चला रहे हैं. विश्वनाथ प्रताप सिंह के दौर में पिछड़ी जातियों को नौकरियों में आरक्षण दे दिया गया था, लेकिन ओबीसी के जिस वर्ग को उसमें शामिल किया गया था उसमें कुछ जातियाँ ऐसी थीं जो पहले से ही बेहतर आर्थिक सामाजिक स्थिति में थीं. ज़ाहिर है ओबीसी में जो कमज़ोर जातियां थीं, वे फिर सामाजिक बराबरी की रेस में पिछड़ती नज़र आ रही हैं. बिहार में कई वर्षों के कुप्रबन्ध के बाद जब नीतीश कुमार सत्ता में आये तो उन्होंने पिछड़े वर्गों के आरक्षण के तरीके में थोडा परिवर्तन सुझाया और उसके नतीजे चुनाव में फायदे की खेती साबित हुए. सामाजिक परिवर्तन की राजनीति में नीतीश कुमार के इस प्रयोग के बाद सामाजिक न्याय के विमर्श में नया अध्याय शुरू हो गया है.

संजय गांधी को सही आदमी बताना बड़ा मजाक है

शेषजी: इमरजेंसी के खलनायक को आडवाणी द्वारा सही बताने की कोशिश अब्‍सर्ड है : समकालीन इतिहास का सबसे बड़ा अजूबा संजय गाँधी को माना जाना चाहिए. कभी स्व. इंदिरा गाँधी उसके गुण गाया करती थीं और आजकल लालकृष्ण आडवाणी उनको सही आदमी मानने लगे हैं जिन्होंने उन्‍हें कभी जेल में ठूंस दिया था. संजय गाँधी करीब चालीस साल पहले भारतीय राजनीति के क्षितिज पर उभरे. अपनी माँ स्व. इंदिरा गाँधी के चहेते बेटे संजय गाँधी की शुरुआती योजना यह थी कि उद्योग जगत में सफलता हासिल करने के बाद राजनीति का रुख किया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मारुति लिमिटेड नाम की एक फैक्ट्री लगाकार उन्होंने कारोबार शुरू किया लेकिन बुरी तरह से असफल रहे. अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, ज्योतिर्मय बसु, पीलू मोदी, जार्ज फर्नांडीज़ और हरि विष्णु कामथ के लोकसभा में दिए गए भाषणों से हमें मालूम हुआ कि संजय गाँधी को उद्योगपति बनाने के लिए बहुत से दलालों, चापलूसों, कांग्रेसियों और मुख्यमंत्रियों ने कोशिश की लेकिन संजय गाँधी उद्योग के क्षेत्र में बुरी तरह से फेल रहे.

दादाओं के शक्ति परीक्षण का मंच नहीं कर्नाटक पंचायत चुनाव

शेषजीकर्नाटक में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. दो दौर में पूरे राज्य में चुनाव होने हैं. पहले दौर का चुनाव 26 दिसंबर को पूरा हो गया. अनुमान है कि करीब 70 प्रतिशत वोट पड़े हैं. अगला दौर 31 दिसंबर के लिए तय है. बंगलोर, चित्रदुर्ग, रामनगरम, कोलार, चिकबल्लापुर, शिमोगा, टुन्कूर, बीदर, बेल्लारी, रायचूर और यादगिर जिलों में चुनाव का काम पूरा हो गया है. छिटपुट हिंसा की खबरें हैं. कुछ जिलों में दो-चार जगहों पर फिर से वोट डाले जायेगें. चिकबल्लापुर के सोरब तालुका के दो गावों में लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया और कहा कि विकास के काम में उनके इलाके की उपेक्षा की गयी है, इसलिए वे लोग वोट नहीं देगें और चुनाव का बहिष्कार करेंगे. कर्नाटक में पंचायत चुनाव देखना एक अलग तरह का अनुभव है. उत्तर प्रदेश में जिस दादागीरी के दर्शन होते हैं, वह इस राज्य में कहीं नहीं नज़र आता. बंगलोर के पड़ोसी जिले रामनगरम के मगडी तालुक के कुछ गाँवों में चुनाव प्रक्रिया को करीब से देखने का मौका मिला. उत्तर प्रदेश या अन्य उत्तरी राज्यों में चुनाव की रिपोर्टिंग करने वाले इंसान के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था.

गृहमंत्री ने गरीब आदमी को अपराधी कहकर गलती की

शेषजीपिछले कुछ वर्षों से दिल्ली को अपराध की राजधानी कहा जाने लगा है. शहर में रोज़ ही दो चार बलात्कार होते हैं, कत्‍ल होते हैं. बुज़ुर्ग नागरिकों का दिल्ली में रहना मुश्किल है. हर हफ्ते ही किसी न किसी कालोनी से किसी बुज़ुर्ग की हत्‍या की खबरें आती रहती हैं. यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि दिल्ली में अपराध रोक पाने में केंद्र और दिल्ली की कांग्रेस सरकारें पूरी तरह से असफल रही हैं, लेकिन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने दिल्ली में बढ़ते अपराध के लिए दिल्ली शहर में रोजी रोटी की तलाश में आये लोगों ज़िम्मेदार ठहरा दिया है. नयी दिल्ली के सिटी सेंटर के उदघाटन के मौके पर गृहमंत्री ने फरमाया कि दिल्ली में बहुत बड़ी संख्या में अनधिकृत कालोनियां हैं. बाहर से आकर जो लोग इन कालोनियों में रहते हैं. उनका आचरण एक आधुनिक शहर में रहने वालों को मंज़ूर नहीं है और इसकी वजह से अपराध में वृद्धि होती है. यह अलग बात है कि बाद में उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया, लेकिन बयान दे कर शासक वर्गों की नकारात्मक सोच को रेखांकित कर दिया. यह लोग ऐसे ही सोचते हैं. अपने इस बयान के बाद पी चिदंबरम ने इतिहास के बारे में अपनी समझ को भी उजागर कर दिया है.

 

करकरे की हत्‍या से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश

शेषजीअगर यह सच है तो बहुत बुरा है. मुंबई पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते के मुखिया, बहादुर, जांबाज़ और वतनपरस्त अफसर हेमंत करकरे की शहादत के दो साल से भी ज्यादा वक़्त के बाद कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने जो बात दिल्ली की एक सभा में कही, वह किसी के भी होश उड़ा सकती है. आपने फरमाया कि अपनी हत्या के करीब दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फ़ोन किया था और कहा था कि वे उन लोगों से बहुत परेशान थे जो मालेगांव की धमाकों के बारे में उनकी जांच से खुश नहीं थे. दिग्विजय सिंह ने कहा कि वे बहुत परेशान थे. स्व करकरे को इस बात से बहुत तकलीफ थी कि किसी हिन्दुत्ववादी अखबार में छपा था कि उनका बेटा दुबई में रहता है और वहां खूब पैसा पैदा कर रहा था. अखबार ने यह संकेत करने की कोशिश की थी कि उनका बेटा इनकी नंबर दो की कमाई को अपनी कमाई बताकर खेल कर रहा था. जबकि सच्चाई यह है कि उनका बेटा मुंबई के किसी स्कूल में अपनी पढाई पूरी कर रहा था.

अमरीका से दोस्ती से पहले इतिहास पर भी नज़र डालना ज़रूरी

शेषजीआजकल अमरीका से भारत के रिश्ते सुधारने की कोशिश चल रही है. लेकिन ज़रूरी यह है कि इस बात की जानकारी रखी जाय कि अमरीका कभी भी भारत के बुरे वक़्त में काम नहीं आया है. अमरीका की जेएफके लाइब्रेरी में नेहरू-केनेडी पत्र-व्यवहार को सार्वजनिक किये जाने के बाद कुछ ऐसे तथ्य सामने आये हैं जिनसे पता चलता है कि अमरीका ने भारत की मुसीबत के वक़्त कोई मदद नहीं की थी. भारत के ऊपर जब 1962 में चीन का हमला हुआ था तो वह नवस्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ी मुसीबत थी. उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमरीका से मदद माँगी भी थी, लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जॉन केनेडी ने कोई भी सहारा नहीं दिया  और नेहरू की चिट्ठियों का जवाब तक नहीं दिया था. इसके बाद इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लिंडन जॉनसन ने भारत का अमरीकी कूटनीति के हित में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी, लेकिन इंदिरा गाँधी ने अपने राष्ट्रहित को महत्व दिया और अमरीका के हित से ज्यादा महत्व अपने हित को दिया और गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नेता के रूप में भारत की इज़्ज़त बढ़ाई. हालांकि अमरीका की यह हमेशा से कोशिश रही है कि वह एशिया की राजनीति में भारत का अमरीकी हित में इस्तेमाल करे, लेकिन भारतीय विदेशनीति के नियामक अमरीकी राष्ट्रहित के प्रोजेक्ट में अपने आप को पुर्जा बनाने को तैयार नहीं थे.

मुंबई लक्ष्मी का नइहर है

शेषजीजब 2004 में मुंबई में जाकर काम करने का प्रस्ताव मिला तो मेरी माँ दिल्ली में ही थीं. घर आकर मैं बताया कि नयी नौकरी मुंबई में मिल रही है. माताजी बहुत खुश हो गयीं और कहा कि भइया चले जाओ, मुंबई लक्ष्मी का नइहर है. सारा दलेद्दर भाग जाएगा. मुंबई चला गया, करीब दो साल तक ठोकर खाने के बाद पता चला कि जिस प्रोजेक्ट के लिए हमें लाया गया था उसे टाल दिया गया है. बहुत बड़ी कंपनी थी लेकिन काम के बिना कोई पैसा नहीं देता. बहरहाल वहां से थके-हारे लौट कर फिर दिल्ली आ गए और अपनी दिल्ली में ही रोजी रोटी की तलाश में लग गए. लेकिन अपनी माई की बात मुझे हमेशा झकझोरती रहती थी. अगर मुंबई लक्ष्मी का नइहर है तो मैं क्यों बैरंग लौटा.

राजनीतिक अदूरदर्शिता और दिशाभ्रम का शिकार है बोडो आन्दोलन

शेषजीनेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड ने दावा किया है कि उन्होंने पिछले दिनों कुछ ऐसे लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, जो असम में रहते थे और मूलतः हिन्दी भाषी थे. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड की निंदा की है. उन्होंने कहा है कि इस तरह से निर्दोष और निहत्थे नागरिकों को मारना बिल्‍कुल गलत है और इसकी निंदा की जानी चाहिए. नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोडोलैंड ने क़त्ल-ए-आम की ज़िम्मेदारी लेते हुए दावा किया है कि उनके किसी कार्यकर्ता की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत का बदला लेने के लिए इन लोगों को मार डाला गया. यह वहशत की हद है. अपनी राजनीतिक मंजिल को हासिल करने के लिए निर्दोष बिहारी लोगों को मारना बिकुल गलत है और उसकी चौतरफा निंदा की जानी चाहिए. बदकिस्मती यह है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों ने बोडो अवाम और उसकी मांगों के उल्टी-पुल्‍टी व्याख्या करके इस समस्या के आस-पास भी राजनीतिक रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया है. इस तरह की हल्की राजनीतिक पैंतरेबाजी की भी निंदा की जानी चाहिए.

इक्कीसवीं सदी भारत और अमरीका की है

शेष बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारतीय उप महाद्वीप की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ दिया है. पहले दिन ही 10 अरब डालर के अमरीकी निर्यात का बंदोबस्त करके उन्होंने अपने देश में अपनी गिरती लोकप्रियता को थामने का काम किया है. अमरीकी चुनावों में उनकी पार्टी की खासी दुर्दशा भी हुई है. दोबारा चुना जाना उनका सपना है. ज़ाहिर है, भारत के साथ व्यापार को बढ़ावा देकर उन्होंने अपना रास्ता आसान किया है. भारत में उनकी यात्रा को कूटनीतिक स्तर पर सफलता भी माना जा रहा है. बराक ओबामा भारत  को एक महान शक्ति मानते हैं. मुंबई के एक कालेज में उन्होंने कहा कि वे इस बात को सही नहीं मानते कि भारत एक उभरती हुई महाशक्ति है, क्योंकि उनका कहना है कि भारत एक महाशक्ति के रूप में उभर चुका है.

कर्नाटक में खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ है

शेष जीकर्नाटक में बीजेपी का संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ है. ऐसा लगता है कि पार्टी के बागी विधायकों ने मुख्यमंत्री को हटाने के लिए लंबा दांव खेल दिया है. पता चला है कि जिन बारह विधायकों ने पहले बगावत का नारा बुलंद किया था, वे बागी विधायकों की पहली किस्त थे. निर्दलीय विधायक शिवराज तंगदागी ने दावा किया है कि इस बार उनके लोग बिना हल्ला-गुल्ला किये विधान सभा के अन्दर ही खेल कर जायेंगे. यह भी संभव है कि विधान सभा में शक्ति परीक्षण के ऐन पहले बारह विधायक और बगावत का नारा लगा दें. नामी अखबार डेकन हेराल्ड को शिवराज ने बताया कि हालांकि बीजेपी की ओर से सन्देश आ रहे हैं कि अगर बागी विधायक साथ आने को तैयार हो जाएं तो उनकी सदस्यता को बहाल किया जा सकता है, लेकिन सारे लोग एकजुट हैं और उनकी कोशिश है कि बीजेपी विधायकों की कुल संख्या के एक तिहाई से ज्यादा लोग पार्टी से अलग होकर अपने आपको ही असली बीजेपी घोषित कर देगें. इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है कि बीजेपी से अलग होने वाले विधायक राज्य में एक गैर-कांग्रेस सरकार बनाने में मदद करेगें और एचडी कुमारस्वामी की अगुवाई में एक गैर-कांग्रेस, गैर-बीजेपी सरकार बन जायेगी.

गद्दी के वास्ते कुछ भी करेगा

शेष जीकर्नाटक में लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ हुआ है. जिस तरह से विधायकों ने मारपीट की, ध्वनि मत से विश्वास मत पारित हुआ, जिस तरह से अध्यक्ष के पद की गरिमा को नीचा दिखाया गया, सब कुछ अक्षम्य और अमान्य है. हालांकि राज्यपाल की ख्याति ऐसी है कि वह कांग्रेसी खेल का हिस्सा माना जाता है और वह पूरे जीवन तिकड़म की राजनीति करता रहा है लेकिन उसकी ख्याति का बहाना लेकर किसी पार्टी को लोकतंत्र के खिलाफ काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. इस सारे काण्ड में बीजेपी के आला हाकिम नितिन गडकरी फिर घेर लिए गए हैं और दिल्ली में उनके दुश्मन, डी-4 वाले कह रहे हैं कि पार्टी अध्यक्ष ने गलती की. उन्हें मंत्रिमंडल में बीएस येदुरप्पा को अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ एक्शन लेने की अनुमति नहीं देनी चाहिये थी. यह अलग बात है कि डी-4 भी अब उतना मज़बूत नहीं है, लेकिन मीडिया में अच्छे संबंधों के बल पर गडकरी का मखौल उड़ाने की उसकी ताक़त तो है ही.