आम आदमी के मुंह पर तमाचा है पेट्रोल की बढ़ी कीमत

शेषजीकेंद्र सरकार ने महंगाई की एक और खेप आम आदमी के सिर पर लाद दिया है. आलू प्याज सहित खाने की हर चीज़ की महंगाई की मार झेल रही जनता के लिए पेट्रोल की बढ़ी कीमतें बहुत भारी हमला हैं. हालांकि फौरी तौर पर गरीब आदमी सोच सकता है कि बढ़ी हुई कीमतों से उनका क्या लेना-देना लेकिन सही बात यह है कि यह मंहगाई निश्चित रूप से कमरतोड़ है. 1969 में जब इंदिरा गाँधी ने डीज़ल और पेट्रोल की कीमतों में मामूली वृद्धि की थी तो साप्ताहिक ब्लिट्ज के महान संपादक, रूसी करंजिया ने अपने अखबार की हेडिंग लगाई थी कि पेट्रोल के महंगा होने से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, सबसे बड़ी चपत उसी को लगेगी. उन दिनों लोगों की समझ में नहीं आता था कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने से  आम आदमी कैसे प्रभावित होगा. करंजिया ने अगले अंक में ही बाकायदा समझाया था कि किस तरह से पेट्रोल की कीमत बढ़ने से आम आदमी प्रभावित होता है.

उन दिनों तो उनका तर्क ढुलाई के तर्क पर ही केंद्रित था लेकिन उन्होंने समझाया था कि डीज़ल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ने या घटने का लाभ या हानि आम आदमी को सबसे ज्यादा होता है. नेहरू युग के बाद का युग था इसलिए घूस का वह बुलंद मुकाम उन दिनों नहीं हासिल था जो आजकल है. आजकल तो हर क्षेत्र में घूस को स्थायी तत्व माना जाता है लेकिन उन दिनों हर अफसर और नेता घूसजीवी नहीं थे. लेकिन करंजिया ने अपने सम्पादकीय में लिखा कि हर उस चीज़ का असर आम आदमी पर पड़ेगा जिसका असर घूसजीवी अधिकारियों पर पड़ता है, क्योंकि वह अपने सारे खर्च का मुआवजा गरीब आदमी से वसूलता है.

आज के हालात अलग हैं. यह मंहगाई जनविरोधी नीतियों की कई साल से चली आ रही परम्परा का नतीजा है. विपक्षी पार्टियों की समझ में यह बात कब आयेगी कि जब संकट की हालात शुरू हो रही हों, उसी वक़्त सरकार की नीतियों के खिलाफ जागरण का अभियान शुरू कर देने से आम आदमी की जान महंगाई के थपेड़ों से बचाई जा सकती है. पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि तो ऐसी बात है जो सौ फीसदी सरकारी कुप्रबंध का नतीजा है. अगर कांग्रेस के शुरुआती दौर की बात छोड़ भी दी जाए, जब घनश्याम दास बिड़ला की अम्बेसडर कार को जिंदा रहने के लिए अपने देश में कारों का वही इंजन चलता रहा जिसे बाकी दुनिया बहुत पहले ही नकार चुकी थी, क्योंकि वह पेट्रोल बहुत पीता था. अम्बेसडर कार में वही इंजन चलता रहा लेकिन कांग्रेस में बिड़ला की पहुंच इतनी थी कि सरकारी कार के रूप में अम्बेसडर ही चलती रही.

बहरहाल यह पुरानी बात है और उसके लिए ज़िम्मेदार किसी को ठहरा लिया जाए लेकिन हालात बदलेगें नहीं. केंद्र सरकार का मौजूदा रुख निश्चित रूप से अफ़सोसनाक है जबकि वह पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को बेहिसाब बढ़ने से रोकने की दिशा में पहल नहीं किया. बहुत मेहनत से इस देश में पब्लिक सेक्टर का विकास हुआ था लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन और उदारीकरण की आर्थिक नीतियों ने देश के आर्थिक विकास में सबसे ज्यादा योगदान कर सकने वाली कंपनियों को ही अपने चहेते पूंजीपतियों को सौंप दिया. नतीजा यह हुआ कि सरकारी कंपनी ओएनजीसी और अन्य पेट्रोलियम कंपनियों को राजनीतिक रूप से कनेक्ट पूंजीपतियों को सौंप दिया गया. बात अब सरकार की काबू से बाहर जा चुकी है. लेकिन पिछले 20 वर्षों में पूंजीपतियों को इतनी ताक़त दे दी गयी है कि अब वे हर क्षेत्र में सरकार को चुनौती देने की स्थिति में हैं, मनमानी कर सकने की स्थिति में हैं. सरकार के पास निजी पूंजी को काबू कर सकने की ताक़त अब बिलकुल नहीं है.

इस पृष्ठभूमि में बढ़ती कीमतों के अर्थशास्त्र को समझने की ज़रुरत है. दुर्भाग्य यह है कि देश का मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व कुछ भी कंट्रोल कर पाने की स्थिति में नहीं है. गठबंधन सरकार की अपनी मजबूरियां होती हैं लेकिन जिस तरह से दाम बढ़ रहे हैं वे बहुत ही खतरनाक दिशा की ओर संकेत कर रहे हैं. आम आदमी को पूंजीपति वर्ग के कारखानों के लिए कच्चा माल और बाज़ार दोनों रूप में मान चुकी सरकार को चाहिए कि फ़ौरन ज़रूरी क़दम उठाये वरना अफ्रीका के कुछ देशों की तरह अपने यहाँ भी खाने के लिए दंगे शुरू हो जायेंगे, क्योंकि अगर खाने-पीने की हर चीज़ नागरिकों की सीमा के बाहर हो गयी तो आम आदमी लूट खसोट पर आमादा हो जाएगा. अगर ऐसी नौबत आई तो हालात को संभालने वाला कोई नहीं होगा क्योंकि उस हालात में सभी मंहगाई के शिकार हो चुके होंगे.

लेखक शेष नारायण सिंह देश में हिंदी के जाने-माने स्तंभकार, पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

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