आम आदमी को मारने पर अमादा केंद्र सरकार

सुनील यह पहले से ही पता था कि निर्यात की अनुमति देते ही चीनी के दाम बढ़ जाएंगे, बावजूद इसके केन्द्र सरकार ने चीनी निर्यात पर लगी रोक पिछले सप्ताह हटा ली और तत्काल ही खुदरा बाजार में चीनी के दाम में चार रुपया प्रति किलो की वृद्धि हो गयी। व्यापारियों को कालाबाजार सरीखा लाभ पहुँचाने वाले वायदा कारोबार पर भी गत वर्ष तब रोक लगा दी गई थी जब चीनी का दाम 50 रुपये प्रतिकिलो तक पहुँच गया था, लेकिन इधर वह भी खोल दिया गया है। इसके साथ ही पेट्रो पदार्थों की मूल्य वृद्धि ने भी वही काम किया है जिसकी अपेक्षा थी। उधर योजना आयोग के उपाध्यक्ष जनाब मोंटेक सिंह आहलूवालिया हैं,  जिन्होंने गत दिनों देशवासियों को अपना अर्थशास्त्र बताया है कि पेट्रो मूल्यों में वृद्धि से मॅहगाई घटेगी। यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि स्कूटर-मोटरसायकिल के पेट्रोल के मुकाबले हवाई जहाज का पेट्रोल (यानी एटीएफ.) लगभग 15 रुपया प्रति लीटर सस्ता है।

गत वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने ठोस शब्दों में आश्वासन दिया था कि अगले 100 दिनों में मॅहगाई पर काबू पा लिया जाएगा। प्रधानमंत्री का यह ‘100 दिन’  उस कार्टून की तरह हास्यास्पद हो गया,  जिस में एक घुड़सवार एक डंडे के सिरे पर चारा बांधकर घोड़े के मुंह से जरा सा आगे किये रहता है। घोड़ा समझता है कि अभी चंद कदम बढ़ते ही चारा मुंह में आ जाएगा और इसी उम्मीद में वह आगे बढ़ता जाता है। वह नहीं जानता कि उसी रफ्तार से चारा भी आगे बढ़ता जा रहा है। लाल किले से उतरने के बाद भी कई बार प्रधानमंत्री ने 100-100 दिन की मोहलत देशवासियों से मांगी,  लेकिन हालत घोड़े और चारे वाली ही बनी हुई है और एक बार फिर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर पर पहुँचने वाले हैं। अभी 80 रुपये किलो वाली प्याज के दाम घटने से जरा राहत महसूस हो रही थी कि अब चीनी और टमाटर भी 50 रुपया किलो तक पहुँच रहे हैं। बाजार के जानकार अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में टमाटर गरीबों की आँखें लाल कर देगा। अमीर लोग नहीं जानते होंगे कि गरीबों का पेट भरने में आलू, प्याज और टमाटर का कितना महत्वपूर्ण योगदान होता है। अमीर लोग टमाटर की सलाद खाते हैं लेकिन गरीब एक टमाटर फोड़कर उसमें नमक और मिर्च मिलाकर उसी से दो रोटी खाकर अपनी भूख मिटा लेता है। गरीब लोग सलाद नहीं खाते।

कुछ साधारण से सवाल आम आदमी के मन में रोज ही उठते हैं लेकिन सत्ता प्रतिष्ठानों से उसे जवाब नहीं मिलता। मसलन, कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसानों से जब प्याज 3 से 5 रु. प्रति किलो थोक में खरीदी जाती है तो वह दिल्ली के आजादपुर मंडी में पहुंचकर 80 रुपये किलो कैसे बिकने लगती है? उ.प्र. के सोनभद्र और मिर्जापुर जिलों से जो टमाटर एक रुपया प्रतिकिलो से भी कम दाम पर थोक व्यापारी खरीदते हैं,  वह सब्जी मंडी में पहुंच कर 25 रुपया किलो कैसे हो जाता है? देश के कृषि मंत्री जब बताते हैं कि इस बार चीनी का जबर्दस्त उत्पादन हुआ है और हमारे भंडार भरे हुए हैं लिहाजा चीनी मिल मालिकों को निर्यात की अनुमति दे दी जानी चाहिए तो फिर एक ही सप्ताह में चीनी का दाम इतना ज्यादा कैसे बढ़ जाता है? और जब हमारा अतीत गवाह है कि पेट्रो मूल्य बढ़ने से हमेशा चतुर्दिक रुप से मॅहगाई बढ़ जाती है तो हमारे अर्थशास्त्री आहलूवालिया कैसे कह रहे हैं कि इससे मॅहगाई थम जाएगी? क्या यह देश की जनता से गलत बयानी नहीं है और यदि हाँ तो क्या ऐसे लोग गुनाहगार नहीं हैं?

देश के गन्ना किसानों का अरबों रुपया चीनी मिल मालिकों ने जैसे एक परम्परा के तहत दशकों से दबा रखा है। इसे निपटाने के लिए सरकार उन्हें ऋण भी देती है,  लेकिन वे ऋण लेकर भी किसानों का बकाया अदा नहीं करते। वे अच्छे दामों पर एथनाल बेचते हैं, गन्ने से ज्यादा मॅहगी उसकी खोई (बैगास) बेचते हैं या खोई का इस्तेमाल कर बिजली का उत्पादन करते हैं तथा चीनी का मनमानी दाम बढ़ाते व निर्यात करते हैं। क्या इन पर किसी सरकारी विभाग का नियंत्रण नहीं है? एक तमाशा देखिए – वर्ष 2008-09 में किसानों ने साल-दर-साल के शोषण से आजिज आकर गन्ना उत्पादन कम किया और इस प्रकार न्यूनतम सालाना खपत 2.30 करोड़ टन के सापेक्ष सिर्फ 1.47 करोड़ टन चीनी का ही उत्पादन देश में हुआ। इसकी पूर्ति के लिए सरकार ने न सिर्फ विदेशों से 60 लाख टन चीनी का आयात किया बल्कि विदेशी चीनी पर लगने वाले 60 प्रतिशत आयात शुल्क को भी दिसम्बर 2010 तक माफ किए रखा ताकि चीनी की उपलब्धता बनाकर चढ़े दामों को गिराया जा सके। वर्ष 2009-10 में उत्पादन में थोड़ा सुधार हुआ और वह बढ़कर 1.90 करोड़ टन तक पहुंचा। चालू वर्ष में बताया गया कि चीनी का सकल घरेलू उत्पादन 2.45 करोड़ टन है,  जो कि घरेलू मांग से भी 15 लाख टन ज्यादा था। आयातित चीनी का भी एक बड़ा भंडार इसी के साथ मौजूद था। इन्ही सब आंकड़ों को आधार बनाकर चीनी मिल मालिक लाबी पिछले कई महीने से निर्यात को खोलने तथा वायदा कारोबार चालू किए जाने की मांग कर रही थी। यह सब सही है। व्यापार का राज-काज शायद ऐसे ही चलता होगा लेकिन इस बात का जबाब कौन देगा कि जब 15 लाख टन अतिरिक्त देशी चीनी के साथ आयातित चीनी का भंडार भी देश में मौजूद है, तो फिर दाम क्यों बढ़ रहे हैं?

अब स्थिति यह है कि सरकार ने दस लाख टन चीनी के निर्यात की छूट दे दी है और दूसरी तरफ 60 प्रतिशत आयात शुल्क अब लागू है। मतलब विदेशी चीनी अब नहीं आनी है। उसका रास्ता इस 60 प्रतिशत ने बंद कर दिया है तथा घरेलू चीनी के बाहर जाने का रास्ता खोल दिया गया है। अब इसका नतीजा जो होना था वो होने लगा है। चीनी के दामों में इधर जो 400 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोत्तरी हुई है वह निर्यात के कारण है। पेट्रो मूल्यों का असर पड़ना अभी बाकी है। श्री आहलूवालिया का तर्क है कि पेट्रो मूल्यों में वृद्धि के कारण लोग वस्तुओं का उपभोग करना कम कर देंगे या दाम ज्यादा देंगे। इस प्रकार जब मांग कम हो जाएगी तो आपूर्ति स्वाभाविक रुप से बढ़ जाएगी और दाम कम हो जाऐंगे। श्री आहलूवालिया जी शायद जान बूझकर इस तथ्य को नहीं बताना चाहते कि जो वर्ग पेट्रो पदार्थों का उपभोग करता है उसे इस तरह की महंगाइयों से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। (इसमें कृपया मिट्टी का तेल उपयोग करने वालों और डीजल से खेती करने वालों को न जोड़ें)। यही तर्क वे हवाई जहाज यात्रियों के संदर्भ में क्यों नहीं देते? क्यों नहीं एटीएफ का दाम चैगुना कर देते ताकि सरकार का राजस्व घाटा एक झटके में ही पूरा हो जाय?

टमाटर का दाम बढ़ने पर हो सकता है कि सरकार पीली दाल की तरह दिल्ली आदि महानगरों में खुद ही सस्ता बिकवाना शुरु कर दे। यह कितना हास्यास्पद है कि एक संप्रभु सरकार कालाबाजारी पर लगाम लगाने के बजाय बेचारगी में सस्ती दर की दुकान चलाना शुरु कर दे,  और यह कैसी निर्लज्जता है कि हवाई जहाज का पेट्रोल सस्ता करने के लिए सामान्य जनता के इस्तेमाल का पेट्रोल महंगा कर दिया जाय। संप्रग को क्या अब चुनाव नहीं लडना है?

लेखक सुनील अमर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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