इन चुनावी नतीजों के असल संकेत क्या हैं!

गिरीश मिश्रहाल के विधानसभाई चुनावों के नतीजों को क्या क्षेत्रीय-आंचलिक लोकतंत्र की मजबूती का संकेत माना जाए और यह समझा जाए कि 1967 में जो गैर कांग्रेसी सरकारें विभिन्न राज्यों में पहली बार प्रमुखता से सामने आईं थीं, उस प्रवृत्ति ने अब मजबूती से नई शक्ल अख्तियार कर ली है ? या फिर यह माना जाए कि राष्ट्रीय पार्टियों की जगह अब क्षेत्रीय अस्मिता नई सियासी शक्ल के रूप में सामने आ रही है. या फिर बडे दलों से लोगों का मोहभंग हो रहा है? मतदान का औसतन 80 फीसदी होना और कहीं 85 प्रतिशत तक इसका पहुंचना क्या यह नहीं बताता कि अब लोग कहीं ज्यादा जागरूक हैं और वे चुनाव जैसे लोकतांत्रिक पर्व में अपनी अहमियत बखूबी समझ रहे हैं.

क्या इससे हमारी संघात्मक व्यवस्था के स्वस्थ होने के संकेत नहीं मिलते? चुनावों में जिस तरह भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रभावी रहा और सभी जगह इसके प्रति भारी नाराजगी दिखी, वो खुद में जहां व्यापक आशा का संचार करता है, वहीं अब चुनावी हिंसा, बूथ कैप्चरिंग जैसी वारदातों में भी जबर्दस्त कमी क्या एक बेहतर सियासी तस्वीर का संकेत नहीं है? जाहिर है, इसके लिए चुनाव आयोग की तारीफ की जानी चाहिए. लेकिन उससे भी ज्यादा प्रशंसनीय है मतदाताओं की जागरूकता. बहरहाल, ऐसे अनेक मुद्दे चर्चा में गर्म हैं. फिलहाल पहले पश्चिम बंगाल. जहां चौंतीस साल के वामपंथियों के शासन का जाना समग्रता में उसी चेतना का प्रतीक है, जिसकी प्रतिध्वनि तमिलनाडु, केरल, पुड्डुचेरी और असम सभी जगह सुनी गई.

लेफ्ट पार्टियों का सत्ता के दंभ में ’राइट’ होना और राइट कही जाने वाली पार्टियों का जमीनी जनआकांक्षाओं के नजदीक जाकर एक नए लेफ्ट के रूप में पश्चिम बंगाल में सत्तासीन होना विचारधाराओं के पारंपरिक खांचे को ही नहीं तोडता, बल्कि विचार की नई सुबह का अहसास भी कराता है. बताता है कि सत्तातंत्र चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, लेकिन भ्रष्टाचार का घुन लगने पर कभी प्रगतिशील रही उस लेफ्ट सरकार को भी अवाम रद्दी की टोकरी में फेंकना जानता है और साथ ही उसके लिए एक नए वैकल्पिक प्रगतिशील चेहरे की तलाश मुश्किल भी नहीं है. तभी तो बात सिर्फ बुद्धदेव की जगह ममता बनर्जी के आने की ही नहीं होती, तृणमूल जैसी तुलनात्मक रूप  से नई पार्टी की सहयोगी बनती कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी की भी होती है, जिसमें लोकतांत्रिक गरिमा के रूप में क्षेत्रीय अस्मिता की स्वीकार्यता भी निहित है.

तमिलनाडु की कहानी भी दिलचस्प है. इस बार 2011 में द्रमुक को जिस तरह भ्रष्टाचार और जनविरोधी रुख के चलते पराजय झेलनी पडी है वैसी ही हार 1996 में अन्ना द्रमुक को भी मिली थी. वैसे जैसी स्थिति 2011 में रही, वैसी ही कमोबेश 1980 में भी थी जब एम.जी. रामचंद्रन के खिलाफ कांग्रेस-द्रमुक गठजोड संयुक्त रूप से चुनाव मैदान में था. उस समय भी आज की तरह वे साथ रहकर भी साथ नहीं थे. आज जिस तरह 2जी स्पेक्ट्रम और क्षेत्रीय भ्रष्टाचार को कांग्रेसी खेमे ने द्रमुक के खिलाफ मुद्दा बनाया और द्रमुक ने कहा कि गठबंधन के बावजूद कांग्रेस ने द्रमुक की आलोचना की तथा ईलम के अंतिम युद्ध में भी लिट्टे के खिलाफ श्रीलंका की राजपक्षे सरकार को केंद्र ने समर्थन दिया, दरअसल यह वे फांस रहे, जिन्हें समय रहते दोनों सुलझा नहीं पाए. वैसे अब जयललिता जहां कांग्रेस हाईकमान के साथ चाय पर वार्ता कर रही हैं, वहीं उनके शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के नरेन्द्र मोदी, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के साथ माकपा के ए.बी. वर्धन की मौजूदगी बताती है कि न केवल ममता बनर्जी बल्कि मजबूत क्षेत्रीय ताकत के रूप में जया का कद भी उभरा है, तभी तो वाम और दक्षिणपंथी, दोनों ही ताकतें उन्हें रिझाने की कोशिश में मशगूल हैं.

गौरतलब यह भी है कि राष्ट्रीय पार्टियों में जहां लेफ्ट को पराभव झेलना पडा है, वहीं  भाजपा भी असरहीन साबित हुई है. निश्चित रूप से भाजपा को अपनी कथित राष्ट्रीय सोच की स्वीकार्यता पर पुनर्विचार की जरूरत है. लेकिन राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस की स्थिति भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही है. इसके कारक के रूप में जहां तेजी से उभरते क्षेत्रीय संदर्भ महत्वपूर्ण हैं, वहीं कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरियां भी जिम्मेदार हैं. तभी तो कांग्रेस ए. राजा के भ्रष्टाचार के खुलासे, उनकी गिरफ्तारी और जयललिता के गठबंधन प्रस्ताव के बाद भी दीवार पर लिखी इबारत को पढने में चूक गई और द्रमुक से दूरी नहीं बना पाई.

इसी तरह हमेशा से कांग्रेस के पास रहने वाला पुड्डुचेरी भी उनके हाथ से निकल गया. यहां एन.आर. रंगासामी हमेशा से कांग्रेस में रहे, बढे, अनेक पदों पर प्रतिष्ठित हुए लेकिन पार्टी चूक गई, उनकी ईमानदार, सामाजिक-राजनीतिक छवि को आंकने में. नतीजा हुआ कि कांग्रेस उन्हें साथ न रख सकी और अब पुड्डुचेरी में उन्हीं से कांग्रेस हार गई. दिलचस्प है कि रंगासामी जैसा मामला आंध्र के जगनमोहन रेड्डी का भी रहा. यहां जगनमोहन की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा रंगासामी जैसी नहीं थी, लेकिन आंध्र में कांग्रेस के मजबूत स्तंभ रहे और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर के बेटे के लिए पिता की प्रतिष्ठा साथ थी. नतीजा रहा कि जगनमोहन को कांग्रेस के विरोध के बाद भी जबर्दस्त जीत हासिल हुई. यहां भी वाईएसआर की पत्नी और बेटे से ‘डील’ करने में कांग्रेस चूक गई.

दिलचस्प है कि कांग्रेस की ओर से ऐसी ही चूक केरल में भी हुई. बयान आया कि ’क्या केरल के लोग 90 साल के अच्युतानंदन को सीएम बनाना चाहते हैं?’, यहां भूल यह हुई कि कांग्रेस के सहयोगी के.आर. गोवारी अम्मल खुद भी 90 साल के थे. और फिर केरल में जो वोटर सामान्यतः मध्यम आयु वर्ग के या बुजुर्ग हैं, उन्हें कांग्रेस का बयान पसंद नहीं आया. यही नहीं अच्युतानंदन की छवि व्यक्तिगत रूप से भी ईमानदार और जनप्रिय नेता की रही है. संभव है कि यदि यह बयान न आया होता तो कांग्रेस की जीत का ग्राफ और भी बेहतर होता. तो माना जा सकता है कि कांग्रेस की ओर से रणनीतिक कमियों पर यदि पर्याप्त ध्यान दिया जाता तो नतीजों पर कुछ फर्क जरुर पड सकता था. लेकिन असम में कांग्रेस के तरूण गोगोई को उनके शांति प्रयासों का फायदा मिला. उन्होंने जिस तरह से समाज के सभी तबकों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया, उसे जनता ने न केवल सराहा, बल्कि उस प्रक्रिया की मजबूती के लिए समर्थन भी दिया.

मजे की बात यह भी रही कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता का राष्ट्रीय नकार खुलकर सामने आया. यह प्रवृत्ति सभी जगह मुखरित होती दिखी. लेकिन राज्यों के ये चुनाव सभी जगह क्षेत्रीय अभिव्यक्ति से ही प्रभावित रहे. परन्तु क्षेत्रीय संदर्भ में नकारात्मक प्रवृत्तियों पर जनता ने विराम भी लगाया. तभी तो उनके कट्टर क्षेत्रीय-जातीय संगठनों को पराजय का मुंह भी देखना पडा. तमिलनाडु में पीएमके और कोंगू पार्टी तथा ऐसे ही दूसरे संगठनों की हार इसके उदाहरण हैं. वैसे भ्रष्टाचार के मुद्दे ने भी जातीय समीकरणों को ध्वस्त करने में प्रमुख भूमिका निभाई. संक्षेप में कहें तो मतदाताओं की बढती संख्या, उनकी जागरुक पहल, स्थानीय और राष्ट्रीय सवालों पर बेहतर तालमेल, पारंपरिक जातीय-सांप्रदायिक गोलबंदियों का काफी हद तक हाशिए पर लुढकना और साथ ही चुनाव आयोग की बेहतर भूमिका. हमारे लोकतांत्रिक संघात्मक ढांचे की मजबूती को ही रेखांकित करते हैं. इससे न केवल केंद्र के साथ राज्यों-क्षेत्रीय अंचलों को दृढ संतुलित आधार मिल सकेगा, बल्कि सही अर्थों में ‘लोक’ के ‘तंत्र’ को मजबूती भी मिल सकेगी. जरुरी है कि ये प्रक्रिया आगे भी जारी रहे.

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

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