ओबामा से भारत को कुछ मिलने वाला नहीं

बी पी गौतमआतंकवाद ऐसा भयावह सच है, जिससे अकेला भारत ही नहीं, बल्कि विश्व जूझ रहा है। दुनिया का खुद को बादशाह समझने वाला अमेरिका भी आतंकवाद से अछूता नहीं है। अमेरिका सहित विश्व के ज्यादातर देशों के नागरिक डर के साये में ही जीवन जीने को मजबूर हैं। ऐसे में अमेरिका भी आतंकवाद खत्म करने का पक्षधर है। वह भी चाहता है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो, पर यह सब करने व कहने में भी वह राजनीतिक और कूटनीतिक हित साध लेता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब अमेरिका गये थे, तब बराक ओबामा ने पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा। उल्टा चीन को एशिया का थानेदार बनाने का सुझाव और रख दिया, इसलिए भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा पूरी तरह विफल ही रही थी, लेकिन मनमोहन सिंह के तौर पर यात्रा बेहद सफल रही, क्योंकि ओबामा ने मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व को लेकर कई तरह के कसीदे गढ़े। राष्ट्र की बात को सर्वोपरि रखने के प्रयास करने के बजाय मनमोहन सिंह भी ओबामा के दिये भोज को अद्भुत बताते हुए और पहला राजकीय अतिथि बनने का गौरव पाकर खुशी-खुशी भारत लौट आये।

अमेरिका ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में एवं उनके कहने के बावजूद पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा, क्योंकि वह पाकिस्तान को डांट देता तो पाकिस्तान के साथ चीन भी नाराज हो जाता। अमेरिका ने दुनिया के सामने खास कर पाकिस्तान और चीन को यह संदेश दिया कि वह भारत के दबाव में कतई नहीं है, उधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राजकीय अतिथि का दर्जा देकर एवं शानदार दावत देकर भारत को यह दिखा दिया कि वह भारत को अन्य देशों के मुकाबले अधिक तरजीह देता है। ओबामा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जरूरी बातों को टालते हुए कह दिया कि मनमोहन सिंह प्रखर व्यक्तित्व के स्वामी हैं।

इतना ही नहीं, भारत को विश्व की उभरती शक्ति बताने की बजाय एशिया की उभरती हुई शक्ति बता कर औकात का अहसास भी करा दिया था, पर अमेरिका की चाल को नजरअंदाज करते हुए आत्म प्रशंसा सुनकर आम आदमी की भांति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गदगद हो गये। यह भी भूल गये कि जिस परमाणु करार को लेकर वाम दलों ने समर्थन वापस ले लिया था और बड़ी मुश्किल से सरकार बची थी। उस परमाणु करार की दिशा में भी एक कदम आगे बढ़ा लें। हालांकि हिचकिचाते हुए मनमोहन सिंह ने इस मुददे को उठाया था, पर ओबामा ने यह कह कर बात टाल दी थी कि समय आने पर डील पर आगे बात की जायेगी और दुनिया ने देखा कि ओबामा की इस बात को अच्छे बच्चे की तरह मनमोहन सिंह मान भी गये थे। अमेरिकी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असैन्य परमाणु व्यापार के बारे में भी कोई बात नहीं की, जबकि वह अच्छी तरह जानते हैं कि जब तक अमेरिका अनिवार्य लाइसेंस पार्ट 810 तक जारी नहीं करेगा, तब तक भारत को असैन्य परमाणु सामग्री प्राप्त नहीं हो सकती।

खैर, यह सब हुआ और किसी ने, मतलब सरकार या विपक्ष ने, कोई आपत्ति नहीं की। उधर स्वागत से अभिभूत मनमोहन सिंह स्वदेश लौट आये तो अमेरिका द्वारा ओबामा के एक पत्र का खुलासा किया गया कि ओबामा ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति को पत्र लिखा है, जिसमें पाकिस्तान से भारत में तनाव कम करने के लिए आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की बात कही गयी है, लेकिन इसी पत्र में पाकिस्तान को खुश करने के लिए लालच भी दिया गया कि अगर वह ऐसा करता है तो अतिरिक्त सैन्य व आर्थिक सहयोग के अलावा सामरिक भागीदारी का भी हकदार होगा। अमेरिका के इस पत्र की भाषा शैली से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पत्र को गंभीरता से लेना या चाहिए या नहीं।

पाकिस्तान की हरकतों से लग भी नहीं रहा कि उसने इस पत्र पर कोई ध्यान भी दिया है। ऐसा अमेरिका ने जानबूझ कर व सोची-समझी चाल के अन्तर्गत ही किया, क्योंकि वह जानता था कि अमेरिका आये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की किसी बात को उसने गंभीरता से नहीं लिया है, जिसका खुलासा भारत में यात्रा की समीक्षा के दौरान सामने आ जायेगा, तो भारत नाराजगी महसूस कर सकता है। इसलिए उसने ऐसा खुलासा कर भारत को खुश करने का प्रयास किया, साथ ही उसने यह भी दिखा दिया कि उसके ऊपर कोई नहीं है। वह जब चाहता है और जिसके विरूद्ध चाहता है, तब ही कुछ कहता है या करता है। ऐसा करने से उसके चीन से भी सम्बंध खराब नहीं हुए। यह बात अलग है कि अमेरिका भी आतंकवाद खत्म करना चाहता है, पर अभी उसे आतंकवाद खत्म करने के लिए अपने विशेष अभियान में और विश्व की उभरती हुई ताकत भारत को रोके रखने में पाकिस्तान की बेहद जरुरत है एवं भारत और पाकिस्तान दोनों पर नकेल कसने के लिए उसे चीन से अच्छा हथियार नहीं मिल सकता। इसलिए एक तीर से तीन निशाने साधने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका की वर्तमान कूटनीतिक चाल न समझ पाने के कारण भारत खुश है, लेकिन भारत को यह याद रखना चाहिए कि अब तक फायदा सिर्फ पाकिस्तान को हुआ है और भारत सरकार ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि नहीं रखा तो आगे भी पाकिस्तान को ही फायदा होता रहेगा।

राजनीतिक हालात बदले नहीं हैं, सब कुछ वैसा है, जैसा मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा के दौरान था, इस लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि बराक ओबामा की यात्रा से भारत को कुछ खास लाभ होने वाला है, पर भारत सरकार के सामने प्रमुख मुद्दा पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, अनिवार्य लाइसेंस पार्ट 810 जारी कराने के साथ परमाणु डील को आगे बढ़ाना ही रहना चाहिए। भारत सरकार किसी एक मुद्दे पर भी बराक ओबामा की सोच परिवर्तित करने में सफल रही, तभी ओबामा की यात्रा भारत के लिए शुभ मानी जायेगी।

लेखक बी पी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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