गांधी या जेपी नहीं हैं अन्ना!

गिरीशजीअन्ना हजारे-  महात्मा गांधी या जेपी नहीं हैं. लेकिन सच है कि उनके आंदोलन ने देश में ही नहीं, विदेशों में भी लोकतंत्र को लेकर बहस तेज कर दी है. इस माहौल में एक विचारक की ये पंक्तियां ताजी हो गई हैं कि – ‘लोकतंत्र एक ऐसा हैट है जिसे हर किसी ने लगाया है. यह हैट अब शेपलेस हो गया है और हालत यह है कि यह हर किसी के सिर में फिट हो जाता है.’  सरकार कह रही है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है. उसे निर्देशित या ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता. देश के सबसे बडे़ कानून संविधान ने उसे यह स्थिति प्रदान की है. उधर, अन्ना के साथ आंदोलित व्यापक तबका भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हुए देश को इस बीमारी से निजात दिलाना चाहता है.

वह अवाम को जागृत कर देश को ‘दूसरी आजादी के लिए’ लामबंद कर रहा है. विभिन्न पार्टियां, संस्थाएं-  जिनमें ज्यादातर गैरसियासी हैं, लोग, सत्ता तंत्र –  सभी अपने-अपने ढंग से लोकतंत्र को व्याख्यायित कर रहे हैं. लेकिन आंदोलन पर विचार के पूर्व कृपया आंदोलन के साथ ही सुर्खियां बनीं निम्न दिलचस्प खबरों पर गौर करें-

–  भ्रष्टाचार के आरोप में सत्ता से हटे कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने भी अन्ना के आंदोलन को समर्थन की घोषणा करते हुए रैली में भाग लेने की बात कही. इस पर कुछ लोग मुस्कुराए तो अखबारों ने लिखा –  भेडिया अब भेडों के साथ चल पड़ा है. परेशान भाजपा आलाकमान ने निर्देश भेजा – कृपया मंदिरों-मठों में पहले की तरह जाते रहिए. प्रदर्शन में कतई मत जाइए, घर पर ही रहिए.

– उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने लोकायुक्त द्वारा अनेक आरोपों के लिए दोषी पाए गए मंत्री को पद से हटा दिया तो राज्यसभा में न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग में वोटिंग के दौरान बसपा ने सेन के पक्ष में मत दिया. एक बसपा सांसद ने वजह बताई –  लखनऊ से ऐसा ही निर्देश था.

– गुजरात उच्च न्यायालय ने मोदी सरकार को नोटिस जारी करके पूछा कि प्रदेश में वर्षों से लोकायुक्त क्यों नहीं है?

– राज्यसभा में पहली बार भ्रष्टाचार के आरोप में किसी न्यायाधीश (सौमित्र सेन) के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित हुआ.

– अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के अनेक बडे़ अखबारों ने अन्ना के आंदोलन को प्रमुखता से प्रकाशित किया. कई अखबारों ने इसे पहली खबर बनाया और अन्ना को ‘दूसरा गांधी’  भी लिखा.

– पड़ोसी पाकिस्तान के अखबारों ने भी इस बाबत खबरें प्रकाशित कीं. और अन्ना की तारीफ करते हुए पाकिस्तान में भी भ्रष्टाचार से निपटने के लिए ऐसे आंदोलन को जरूरी बताया.

कमोवेश ये सभी सुर्खियां उसी दिन की हैं जिस दिन अन्ना तिहाड़ में तीन दिन रहने के बाद रामलीला मैदान के लिए रवाना होते हैं. यह दिन है –  19 अगस्त. क्या संयोग है? इसी दिन दो दशक पहले सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेब को सत्ता से बेदखल किया गया था. लेकिन एक संयोग और है-  सन् 1917 का. उस साल विश्व इतिहास को नई दिशा देने वाली दो घटनाएं हुई थीं. पहली थी लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक क्रांति. दूसरी थी महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद सत्याग्रह का भारत में पहला प्रयोग बिहार के चंपारण में करना. बोल्शेविक क्रांति को तो दुनिया ने तुरंत देखा और समझा था. लेकिन चंपारण के दूरगामी असर को लोग तब समझ नहीं पाए थे. गांधी ने तब किसानों पर निलहों के अत्याचार के विरोध में गिरफ्तारी के बाद जमानत लेकर रिहा होने और चंपारण से बाहर जाने से इन्कार कर दिया था. उन्होंने अदालत से साफ कह दिया कि यदि उन्हें बलपूर्वक बाहर भेजा गया तो वो फिर से चंपारण लौट आएंगे और यहां से तभी जाएंगे जब उनका काम खत्म हो जाएगा.

गांधी की यही नैतिक ताकत बाद में खिलाफत, दांडी यात्रा, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और नोआखाली में व्यापक रूप में मुखरित हुई. लेकिन आजाद भारत में अन्ना ने जमानत लेकर रिहा होने से इन्कार करके फिर से उसी नैतिक ताकत को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. संभवतः यही नैतिकता अन्ना का सबसे बड़ा हथियार बन गई और अन्ना इस नैतिक ताकत के प्रतीक. वैसे तो रामलीला मैदान अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है, लेकिन खास यह रहा कि पहली बार देश भर में हुए इस आंदोलन का अनुशासित और आत्मनियंत्रित रूप सामने आया. कहीं तोड़फोड़ नहीं, हिंसा नहीं. मानना होगा कि यह अब तक के राजनीतिक, जातीय या अन्य आंदोलनों से एकदम अलग नजीर है.

स्पष्ट है कि यह पढे़-लिखे मध्यवर्गीय तबके का आंदोलन है जो जाति, मजहब, धर्म, क्षेत्र से अलग हट कर गोलबंद हो रहा है. आज देश में 16 करोड़ लोग मध्यम तबके के हैं-  जो बीस साल पहले के मध्यवर्ग से अलग सोच रखते हैं. 2015 तक इसके 27 करोड़ होने की संभावना है. पहले के सरकारी सेवा आधारित मध्यवर्ग की जगह अब निजी सेवाजनित नए मध्यवर्ग ने ले ली है, जिसकी दृष्टि उदार आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था से प्रभावित है. औसतन इसकी आय 15- 20 हजार से एक लाख रुपए प्रतिमाह है. लेकिन इस तबके की मुखर भागीदारी का तात्पर्य यह नहीं है कि निम्न मध्यवर्ग या अन्य तबकों की भागीदारी इसमें न हो. वैसे भी मध्यवर्ग से ही समाज को हमेशा नेतृत्व मिलता रहा है और वह ही दूसरों का आदर्श भी बनता रहा है. आशय यह है कि किसी पार्टी के विरोध या समर्थन से अलग भ्रष्टाचाररहित समाज के मुद्दे पर समर्थन और भी व्यापक हो जाए तो कोई आश्चचर्य नहीं क्योंकि भारत हमेशा से नैतिक धारा के साथ स्वभावतः जुडता रहा है.

बहरहाल, सुखद संकेत यही है कि अन्ना के अनशन के साथ-साथ सरकार और नागरिक समाज के बीच वार्ता किसी नतीजे पर पहुंचती प्रतीत होती है. माना जा रहा है कि लोकपाल के दायरे से न्यायपालिका को बाहर रखने पर समझौता हो सकता है बशर्ते कि न्यायपालिका की जवाबदारी तय करने के लिए अलग से विधेयक में व्यवस्था हो. इस बात के संकेत पहले भी सरकार की ओर से दिए गए हैं. वैसे जिस लोकपाल को भ्रष्टाचार से निपटने का भारी दायित्व सौंपने की बात हो रही है-  वह भी कोई ‘सुपरपावर’  का प्रतीक न हो जाए-  यह भी विचारणीय है. साथ ही यह भी कि लोकतंत्र आपसी ‘ संतुलन और नियंत्रण’  पर ही आधारित व्यवस्था है. समझौता वार्ता में दोनों ही पक्षों को इसे समझने की आवश्यकता है. अतिवाद से दूर मध्यम मार्गी दृष्टि जरूरी है. वैसे भी भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि हमेशा ही मध्यमार्गी रही है. यह मध्यमार्ग किसी को बुद्ध का सम्यक मार्ग लग सकता है तो किसी को कबीर, नानक, खुसरो और गांधी की धारा. इसी को देश के सत्ता तंत्र के प्रतीक अशोक महान ने दो हजार साल पहले ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ के रूप में अपनाया तो पांच सौ साल पहले अकबर महान ने ‘सुलहे कुल’ के रूप में. विभिन्न धाराओं को समेटता हमारा संविधान भी उसी नैतिक सम्मिलन का प्रतीक है. आज नए माहौल में सत्ता तंत्र, संसद, समाज और सियासत के समानांतर अन्ना जिस नैतिक धारा के प्रतीक हैं-  उसे भी अतिवाद से दूर किसी मान्य हल पर पहुंचना ही होगा.

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

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