पैसा देंगे तो अखबार आपके बाप का, कुछ भी लिखिए!

: पेड न्‍यूज के लिए कुत्‍तों की तरह टूट पड़े थे नैतिकता की दुहाई देने वाले अखबारों के एजेंट : खबर नहीं सौदा पटा रहे थे पत्रकार : पिछले 28 सालों से पत्रकारिता से जुड़ा हूं, परंतु बीते दिनों जिस अनुभव से गुजरा वह भड़ास के माध्यम से पूरी पत्रकार बिरादरी के सामने रखना चाहता हूं। मेरे वे साथी जिन्होंने मेरे साथ दस-दस सालों तक बराबर की डेस्क पर बैठकर रोजाना चार-चार, छह-छह घंटे बिताए, वे साथी जो थे दूसरे अखबारों में परंतु कहीं ना कहीं मिला करते थे और बड़े प्यार से बातें किया करते थे, वे अखबार जो नैतिकता और मूल्यों की दुहाई देते हैं, सब बेनकाब हो गए। पैसा ही उनका ईमान, पैसा ही उनका भगवान, पैसा ही उनकी जान और पैसा ही उनकी आन साबित हो गया। निर्लज्जता की पराकाष्‍ठा तो यह है कि मैं दस दिन उनके सामने गिड़गिड़ाता रहा हूं, ‘यार, कुछ तो लिहाज करो, मैं 25-30 सालों से आपके साथ रहा हूं।’ बात नहीं मानने पर उन्हें यह कहने से भी नहीं चूका हूं कि इस सारे मामले को मैं भड़ास4मीडिया डॉट कॉम और अन्य पत्रकारों व मीडिया प्रतिनिधियों के जरिए सामने लाऊंगा, परंतु वे फीकी हंसी हंसते हुए कहते, ‘यार, आप खुद समझदार हो, इसके अलावा और हम कर भी क्या सकते हैं।’ बड़ी ही बेशर्मी से अगले ही पल, ‘… तो कब दे या भेज रहे हो’ का सवाल दाग दिया करते थे।

मामले की जानकारी देने से पहले मैं संक्षेप में अपना परिचय देना चाहूंगा। मेरा नाम राजेंद्र हाड़ा है। मैं अजमेर में रहता हूं। सन 1982 से ही मैं पत्रकारिता से जुड़ा हूं। इस दौरान कई अखबारों में काम किया। कोटा, जयपुर, जोधपुर से जिला स्तर पर निकलने वाले कुछ अखबारों के संवाददाता के अलावा फ्रीलांसर के रूप में जनसत्ता, नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण में न्यूज आर्टिकल्स भी लिख दिया करता था। पढ़ाई के साथ पत्रकारिता जारी थी, परंतु जब यह अहसास हो गया कि अखबार की छह सौ या आठ सौ रूपए की कमाई से गुजारा नहीं हो सकता तो मैंने एलएलबी किया और 1986 में वकालत के साथ दैनिक नवज्योति में विधि संवाददाता के रूप में जुड़ गया। बाद में कुछ ऐसा दौर चला कि वकालत जारी रही और मैं पार्ट-टाइम पत्रकार कहलाते हुए भी पूर्णकालिक की तरह विधि संवाददाता के साथ नवज्योति के उदयपुर, बीकानेर, पाली, सिरोही, आबू रोड डाक संस्करण प्रभारी के रूप में काम करता रहा। पूरे दस साल के बाद सिर्फ आधा घंटा काम के समय को लेकर मैंने नवज्योति से इस्तीफा देकर मार्च 1998 में दैनिक भास्कर, जो एक साल पहले ही अजमेर से प्रकाशित होना शुरू हुआ था, ज्वाइन कर लिया। वहां मैं महानगर प्लस प्रभारी से लेकर बाद में नागौर डाक संस्करण प्रभारी तक रहा। इस बीच वकालत जारी रही। हालात कुछ ऐसे बने कि दिसंबर 2008 में मैंने भास्कर से इस्तीफा दे दिया और पूरी तरह वकालत को समय देने लग गया।

मुझसे दो साल छोटा मेरा भाई डॉ.प्रियशील हाड़ा एमबीबीएस करने के साथ ही अपना निजी क्लीनिक खोलकर चिकित्सा क्षेत्र में जुट गया। उसकी ईमानदारी, मिलनसारिता के कारण 1995 में भारतीय जनता पार्टी के एक युवा नेता स्वर्गीय वीर कुमार ने उसे जिद कर भाजपा के टिकट पर अजमेर नगर परिषद का चुनाव लड़वा दिया और वह सबसे अधिक मतों से जीता। इसके बाद वह तीन साल अजमेर नगर सुधार न्यास का ट्रस्टी, अनुसूचितजाति-जनजाति वित्त एवं विकास निगम का सदस्य समेत भाजपा संगठन के विभिन्न पदों पर रहा। 1995 से आज तक के इस पूरे राजनीतिक और डॉक्टरी कॅरियर में उसके खिलाफ आज तक एक भी भ्रष्‍टाचार, बदतमीजी, अनैतिकता, चरित्रहीनता या अन्य किसी तरह का आर्थिक आरोप नहीं है। 18 अगस्त 2010 को हुए अजमेर नगर निगम के मेयर चुनाव के लिए भाजपा ने उसे टिकट दिया। अब तक पार्षद मेयर चुना करते थे, पहली दफा जनता को सीधे मेयर का चुनाव करना था। करीब ढाई विधानसभा क्षेत्र के इस मेयर चुनाव में साढ़े तीन लाख मतदाता थे।

अजमेर से छह दैनिक अखबार प्रकाशित होते हैं- दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति, राष्‍ट्रदूत, हिन्दू और न्याय सबके लिए। टाइम्स ऑफ इंडिया और पंजाब केसरी के जयपुर से अजमेर संस्करण निकलते हैं। दो स्थानीय न्यूज चैनल स्वामी न्यूज और सरेराह के अलावा दैनिक भास्कर का रेडियो माई एफएम भी प्रसारित होता है। 8 अगस्त 2010 को टिकट की घोषणा हो गई। मेरे अनुभव को देखते हुए खबरें और विज्ञापन का काम मुझे देखने के लिए कहा गया। मैंने प्रचार की खबरें बनानी शुरू की और ई-मेल से उन्हें भेजने लगा। 9, 10, 11 अगस्त तीनों दिन खबरें भेजता रहा, दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका में एक भी लाइन नहीं छपी। दोनों अखबारों की ओर से उनके मैनेजर, विज्ञापन मैनेजर, विज्ञापन एक्जीक्युटिव, विज्ञापन एजेंसी संचालक यहां तक कि पत्रकार और फोटोग्राफर मुझसे संपर्क करने लगे। व्यक्तिगत मुलाकातें हुई। टिकट मिलने की बधाइयों और हाल-चाल के बाद मैंने उन्हें खबरें नहीं छपने का उलाहना दिया। सभी के शब्द अलग-अलग थे, संदेश एक ही था, पैसा दे दो, विज्ञापन तो छपेंगे ही खबरें भी छपनी शुरू हो जाएंगी। दोनों की मांग शुरू हुई छह-छह लाख रूपए से। इतना पैसा कहां से लाएं और वह भी खबरें छापने के लिए। एक दिन फिर इसी उधेड़बुन में निकल गया। इधर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ता जा रहा था।

सामने वाले प्रत्याशी के बड़े-बड़े विज्ञापन और खबरें छप रहीं थी और हम इस तरह मीडिया से गायब थे, जैसे चुनाव ही नहीं लड़ रहे हों। फिर तो सारा-सारा दिन सौदेबाजी में बीतने लगा। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ता जा रहा था। मैं मीडिया प्रतिनिधियों को बताता था कि विज्ञापन की दर बताएं, मैं जितना हो सकता है विज्ञापन के पैसे के बारे में आपको बता देता हूं, परंतु खबरों के लिए पैसा कौन सा पत्रकारिता धर्म है। भास्कर का कहना था, ‘रोज तीन कॉलम खबरें, एक तीन कॉलम का फोटो और राइट हैंड पेज पर एक अच्छा विज्ञापन।’ खबर में आप चाहे जो लिखो, एक लाइन नहीं कटेगी। पत्रिका के संपादक को विज्ञापन की दर बताने के लिए कहा तो उन्होंने कहा, ‘यार, हाड़ा जी आप तो पुराने मित्र हो अब आपसे क्या सौदेबाजी, मैं फलां को भेज रहा हूं, आप तय कर लेना।’

मुझे बड़ा अच्छा लगा कि कितना साफ-सुथरा मामला नजर आ रहा है। जो सज्जन आए उन्होंने आते ही अपनी कीमत बता दी। साथ ही मेरी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘सामने वाले यानी भास्कर से कितने में सौदा पटा।’ मैंने बताया कि संपादक जी ने मुझे विज्ञापन की दर बताने की बात कही थी, तो वह ऐसे देखने लगा जैसे मेरे सिर पर सींग उग आए हों। उसका एक ही जवाब था, ‘सर आप इतने सालों से मुझे जानते हैं, मैं आपसे क्या कहूं, मुझे तो आदेश मिला है इतना पैसा ले आओ।’  मेरे इस जवाब पर कि इतनी तो हमारी हैसियत ही नहीं है। विज्ञापन के लिए इतना है, चाहो तो एकमुश्त ले जाओ। उसने कहा, ‘सामने वाला जो दे रहा है, उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है।’ फिर उसने संपादक से बात की। संपादक के कहने पर वह लौट गया।

इसी बीच टाइम्स ऑफ इंडिया की एक महिला मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव का फोन आया। उसने टाइम्स ऑफ इंडिया के अजमेर प्लस पर एक विज्ञापन और एक इंटरव्यू छापने की बात कही। बात अंतिम हो गई। विज्ञापन का आधा पैसा एडवांस एक विज्ञापन एजेंसी वाला आकर ले गया। जब विज्ञापन छपने में दो दिन बचे तब मैंने याद दिलाया कि इंटरव्यू लेने अभी तक कोई नहीं आया है। उसी महिला का कहना था, ‘पेज तो फाइनल हो गया। अब कुछ नहीं हो सकता।’ उसे याद दिलाया गया कि आधा पेमेंट अभी बकाया है। इस बातचीत के दौर में 12 अगस्त हो चुकी थी। हमारे समाचार या तो प्रकाशित नहीं हो रहे थे या हो रहे थे तो नाम मात्र के। मेरी जिद थी कि विज्ञापन के बतौर छह दिन के करीब डेढ लाख रूपए बनते हैं, वे मैं दे सकता हूं। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का दबाव बढ़ता जा रहा था। सब मुझसे एक ही सवाल पूछ रहे थे, हमारी खबरें क्यों नहीं आ रही है? खबरें क्यों नहीं आ रही है, इसकी वजह आठ-दस लोगों तक सीमित थी?

कैसे करें, क्या करें, कहां से पैसा लाएं? सारे अखबारों की मांग पूरी करता तो करीब पंद्रह लाख रूपए की जरूरत थी। कुछ पार्टी नेता सामने आए। उन्होंने मध्यस्थता की और मीडिया की मांग पूरी की गई। जो कुछ दिया गया, उस पर उनका अहसान यह था कि यह तो कुछ भी नहीं है, पर चलो ठीक है। इसके बाद हमारी खबरें छपने लगी। जितना पैसा, उतने स्पेस के आधार पर। रोजाना की खबर के साथ अगले दिन का कार्यक्रम भी भेजा जाता था, परंतु वह नहीं छापा जाता था। 16-17 अगस्त को सभी का दबाव आने लगा बकाया पैसा भी दे दो। उन्हें याद दिलाया कि कुछ तो सब्र करो, अभी तो चुनाव में समय है। पत्रिका का कहना था कि आपने जितना पैसा दिया है, उससे ज्यादा विज्ञापन स्पेस आपको दे चुके हैं, अब तो आप पर ज्यादा बकाया हो गया है। विज्ञापन स्पेस किस दर से और कितना तय हुआ और किसने किया, इन सवालों का कोई जवाब उनके पास नहीं था।

मैं बीच-बीच में उन्हें कहता भी रहा कि चुनाव का परिणाम चाहे हमारे पक्ष में आए या खिलाफ परंतु मैं परिणाम के बाद इस मुद्दे को भड़ास4मीडिया डॉट कॉम जैसे मंच पर उठाउंगा। पैसा दिया गया और मेरे हाथ से दिया गया, मैं यह स्वीकार करता हूं, इसके लिए सजा भी भुगतने को तैयार हूं परंतु साथ ही उन्हें भी सजा भुगतनी होगी, जिन पत्रकारों ने मुझे इसके लिए मजबूर किया। ऐसे हालात किए कि चुनाव में माहौल नहीं बनने का दोषी मुझे ठहरा दिया जाए। हम चुनाव हार चुके हैं। चुनाव हमने व्यक्तिगत छवि के आधार पर लड़ा था। आचरण में भी इसे अपनाया। घर की दो गाडियों में चुनाव प्रचार किया। शराब की एक बोतल तक ना खरीदी ना किसी को दी, ना ही कार्यकर्ताओं को पैसा दिया। जो दस-पंद्रह साथी चुनाव में लगे उनका खाना घर की महिलाएं ही बनाती थी। यह स्थिति सारे अखबारों को और अजमेर की जनता को पता है।

मुझे सब्र है इस बात का कि चुनाव हारने के बावजूद कोई मुझे इसका दोषी नही ठहरा रहा है कि कम खबरों या कम विज्ञापन हमारी हार का कारण है, क्योंकि अब ज्यादातर को पता लग चुका है कि खबरों के लिए हमने जो कुछ इन अखबारों को दिया, वह सामने वाले ने जो दिया उसके मुकाबले कुछ नहीं है। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि इन अखबारों के संपादक अपने अग्रलेखों में नैतिकता और सदाचरण की बातें लिखने का साहस कैसे जुटा लेते हैं। खबरों के लिए पैसा लेने और उसके लिए ब्लैकमेल करते समय इनके मूल्यों को क्या हो जाता है? और वे पत्रकार, जिन्हें मैं अब अपना साथी कहने में जलालत महसूस कर रहा हूं, किसी कारखाने में हो रहे अवैध उत्पादन, किसी मजदूर को मिलने वाली कम तनख्वाह या सुविधा की बात पर तो खबरें बना सकते हैं, क्या कभी अपनी बिना साप्ताहिक अवकाश की ड्यूटी, बिना ओवरटाइम भुगतान की नौकरी, बिना नियुक्ति पत्र की संपादकीय और अवकाश के बदले भुगतान नहीं होने के बारे में लिखना तो दूर, क्या कभी इस बारे में अपने मालिकों से बात करने का साहस भी रखते हैं। ऐसे बिना रीढ़ की हड्डियों वालों को अपना साथी कहने में मुझे शर्म नहीं आएगी तो और क्या होगा?

अब मुझे महसूस हो रहा है कि अजमेर जैसे देश के पहले साक्षर जिले और स्वामी दयानंद सरस्वती के समय की पत्रकारिता वाले स्थान के पत्रकारों की जमात के कारनामों को सामने लाने का वक्त आ चुका है। अजयमेरू प्रेस क्लब का मामला हो या यूआईटी कॉलोनी की पत्रकार कॉलोनी में भूखंडों की बंदरबांट का या जनता के लिए बने सामुदायिक भवन को प्रेस क्लब के नाम पर हड़पकर उसे किराए पर देने का, ऐसे पत्रकारों के भी ऐसे कई उदाहरण हैं, जो किसी प्रदेश स्तरीय अखबार के अजमेर संवाददाता थे और 1200 रूपए की पगार पाते थे या फिर अपना सौ-डेढ सौ प्रतियों वाला साप्ताहिक या पाक्षिक निकालते थे, कमाई उनकी क्या होती थी, आप खुद अंदाजा लगा लें या फिर किसी स्थानीय अखबार के संवाददाता थे और 1500-2000 रूपए महीना कमाते थे, परंतु इनमें से कई के आलीशान बंगले बन चुके थे। उनके बेटे महंगी फीस वाली अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते थे। अब यह सब सामने लाने का वक्त आ गया है ताकि किसी और को ब्लैकमेलिंग का शिकार ना होना पड़े।

लेखक राजेन्‍द्र हाड़ा अजमेर में वकालत करते हैं तथा लगभग तीन दशक से पत्रकारिता से जुड़े हैं. राजेन्‍द्र हाड़ा जी से संपर्क उनकी मेल आईडी rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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