बाबा रामदेव की दस गल्तियां

अन्ना हजारे के आंदोलन को भले ही अभी पूर्णतया सफल कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस आंदोलन ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. इस आंदोलन को जितना जनसमर्थन मिला उतना समर्थन बाबा रामदेव के आंदोलन को नहीं मिल पाया. बाबा रामदेव सरकारी चालों में ऐसा उलझे की सुलझना मुश्किल सा ही लग रहा हैं. बाबा, बाबा हैं और अन्ना, अन्ना. दोनों अलग-अलग तरह से आमजन के काफी करीब रहें हैं. बाबा रामदेव ने जिस तरह से अपना आंदोलन आगे बढ़ाया हैं उसके बाद उन्हें बाबा रामदेव न कहकर भोले बाबा कहना ज्यादा उचित होगा.

1. पॉलिटिकल पार्टी बनाने का एलान करना बाबा रामदेव की पहली गलती मानी जा सकती हैं. बाबा सिर्फ बाबा ही रहते और लोगों को योग के साथ-साथ राजनैतिक रूप से सचेत करने के प्रयास करते रहते तो ज्यादा ठीक होता. बाबा का ये एलान उनकी शानदार छवि के चलते राजनैतिक दलों को चुभने लगा था. राजनैतिक गंदगी में उतरना बाबा की पहली गलती मानी जा सकती है.

2. इसे अन्ना आंदोलन का प्रभाव कहें या बाबा की जिद, कि बाबा रामदेव ने चार जून को रामलीला मैदान में अनशन का एलान कर दिया. रामलीला मैदान किराये पर लिया, लेकिन योग शिविर करने के लिए. उन्हें परमिशन भी मिली सिर्फ पांच हजार लोगों के लिए योग शिविर लगाने की. बाबा यहां भी मात खा गए. पांच हजार की जगह लाखों को न्यौता दिया और लोगों को योग करवाने की जगह सरकार को शीर्षासन करवाने की जिद पकड़ ली. इन छोटी-छोटी बातों ने ही बाबा को रामलीला मैदान से मार भगाने का मौका सरकार को दे दिया. बाबा की यह गलती दूसरी गलती मानी जा सकती है.

3. चलिए मान लिया कि बाबा ने सरकार को शीर्षासन करवाने की ठान ली पर मांगे भी ऐसी रखी कि सरकार का दम निकाल छोड़े. पहली मांग की बात करें तो बाबा चाहते हैं कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन सरकार वापस लाएं और इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाएं. लेकिन ये काम किसी भी सरकार के लिए इतना आसान नहीं है. पहले तो उन लोगों के नाम पता करना, फिर संबंधित देश में ये साबित करना कि ये काला धन है और फिर उसे देश में वापस लाना एक ऐसा काम है जो कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही संभव हैं, अनशन शुरू कर मांगें न मानने तक अड़े रहने की धमकी बाबा की तीसरी गलती मानी जा सकती है.

4. बाबा चाहते हैं कि काले धन को रोकने के लिए सरकार पांच सौ और हजार के नोटों पर रोक लगाएं. ये मांग भी इतनी आसान नहीं थी कि बाबा अनशन पर बैठे और सरकार मान जाएं कि ये नोट ही बंद कर दिए जाएं. ये एक विचारणीय मुद्दा हो सकता है, लेकिन बाबा का अनशन कर सरकार पर दबाव बनाना बाबा की चौथी गलती मानी जा सकती है.

5. बाबा चाहते हैं कि प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता करें. लेकिन बाबा को ये कौन समझाएं कि ये मांग इतनी आसान नहीं है. इसके लिए पूरे चुनावी तरीके को बदलना होगा. इस मामले पर इतनी जल्दबाजी में सरकार पर दबाव बनाना बाबा की पांचवी गलती मानी जा सकती है.

6. चलिए माना कि बाबा कि मांगों में काफी दम है, ये आने वाले दिनों में देश की तस्वीर बदलने का दम रखती है. लेकिन जब बाबा ने अनशन शुरू कर दिया और देर रात पुलिस ने जनरल डॉयर से प्रेरणा लेकर रामलीला मैदान को जलियांवाला मैदान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी,  तब बाबा रामदेव गिरफ्तारी देने से क्यों घबराएं? क्यों बाबा माता-बहनों के कपड़े पहनकर चोरों की तरह भागे. इसे बाबा रामदेव की एक और गलती माना जा सकता है.

7. बाबा को जब दिल्ली से भगा दिया गया तब भी बाबा का अनशन पर अड़े रहना समझ से बाहर है, ये एक मौका था कि बाबा अपनी पुरानी गलतियों से कुछ सीखते और आंदोलन का तरीका बदलते लेकिन बाबा है कि मानते नहीं.

8. बाबा ने अपने ट्रस्टों की सपंत्तियों की घोषणा करने में भी काफी हड़बड़ी दिखाई. आधी-अधूरी जानकारियों के साथ बालकृष्ण महाराज मीडिया के सामने फेल होते नजर आए. अपनी कंपनियों की संख्या का भी उन्हें ठीक से पता नहीं था. इतनी बडी सपंत्ति की घोषणा साफ-सुथरी और विशेषज्ञों की मदद से की जाती तो बेहतर होता.

9. बाबा अपने आंदोलन की दिशा को तय करने में कानूनी रूप से काफी कमजोर नजर आएं, कानून के जानकारों की सलाह बाबा के आंदोलन को एक नई दिशा दे सकती थी.

10. बाबा को दिल्ली की अंधी, गूंगी और बहरी सरकार ने अब भूखे मरने के लिए छोड़ दिया हैं, बाबा को अपने आप को संभालना होगा. महात्मा गांधी की तर्ज बाबा का उपवास, गांधी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली सरकार के लिए कुछ भी मायने नहीं रखता है. बाबा को एक बार फिर से लोगों के सामने आना होगा, अपने उपवास की जिद को छोड़ना होगा. अगर बाबा ऐसा नहीं करते है तो ये बाबा कि आखिरी गलती होगी.

लेखक उमेश शर्मा एक न्‍यूज चैनल में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं.

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