बड़े सवालों पर सब मौन

हरिवंश भारत में राजनीति या राजनीतिज्ञ, चैन से रहते हैं. कारण वे मानते हैं कि लोग, समाज या मतदाता भुलक्कड़ हैं. आज तूफ़ान उठा, कल सब शांत. इसलिए भ्रष्टाचार पर अण्णा का आंदोलन हो या कहीं किसी सवाल पर लोग बेचैन हों, राजनीतिज्ञों (खासतौर से सत्तारूढ़ पक्ष) की कोशिश होती है कि मामला सलटा लिया जाये. हां, अगर किसी पक्ष या दल को लगता है कि उसे ऐसे आंदोलन से गद्दी मिलने वाली है, तो वह चुप नहीं बैठता. पर जिन सवालों से राजनीतिक बिरादरी पर खतरा लगता है, उसे बुझाने में सब जुटते हैं. जो सवाल राष्ट्रहित में निर्णायक होते हैं, पर जिनसे तात्कालिक लाभ नहीं मिलनेवाला, उन पर भी सब मौन रहते हैं.

ऐसा ही मामला है, विकीलीक्स द्वारा भारत से जुड़े प्रसंगों का खुलासा. इसने भारतीय राजनीति के सही चेहरे से नकाब हटा दिया है. शासकों के वीभत्स चेहरे तो दिखते ही हैं, पर दक्षिण से लेकर वाम और लालूप्रसाद जैसे मध्यमार्गी भी बेनकाब हो गये हैं. इसलिए इस मुद्दे पर चौतरफ़ा चुप्पी है. इसी तरह दूसरा सवाल है, भारत का 26/11 कांड.16 अप्रैल को भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि हेडली और राणा के प्रसंग पर भारत सरकार के रुख में कोई परिवर्तन नहीं है. इस बयान के ठीक दो दिन पहले, 13 अप्रैल को वाशिंगटन (अमेरिका) से खबर आयी कि गिरफ्तार डेविड हेडली उर्फ़ दाउद गिलानी और तहाउर्र हुसैन राणा ने अमेरिकी अदालत में स्वीकार किया कि पाक की सरकार और आइएसआइ ने भारत में 26/11 कांड करने का आदेश दिया था. राणा ने आतंकवादियों के लिए सारा इंतजाम किया. पाकिस्तानी सरकार और आइएसआइ के कहने पर. डेविड हेडली ने इस प्रकरण में आइएसआइ के शामिल होने के तथ्य भी अमेरिकी अदालत को दिये हैं. इस खुलासे से पाकिस्तान और अमेरिका दोनों स्तब्ध हैं, पर वे कुछ कर नहीं रहे.

भारत मुंबई की इस घटना के बाद से ही लगातार मांग कर रहा है कि दोषियों को सजा मिले, पर आज तक किसी को कोई सजा नहीं मिली. दुनिया के दूसरे देशों में क्या दृश्य है? कोई एक चीनी को मार कर देख ले या किसी अमेरिकी और यूरोपीय नागरिक को मार कर देख ले. पर भारत के जो बेकसूर नागरिक मुंबई में आतंकवादियों के हाथों मारे गये, उन्हें भारतीय सरकार ने, भारतीय राजनीति ने और लोगों ने भी भुला दिया. अब तो इस बात के पुख्ता प्रमाण मिल गये हैं कि पाक सरकार और आइएसआइ ने मुंबई में 26/11 कराया. पर आज तक किसी एक दोषी को सजा मिली है? यह सही है कि भारत-पाक के बीच हल के लिए युद्ध किसी कीमत पर रास्ता नहीं है, पर कोई रास्ता तो निकालना ही पड़ेगा, ताकि निर्दोष भारतीयों की कुरबानी व्यर्थ न हो.

इसी तरह एक दूसरा संवेदनशील मामला है, पाकिस्तानी इलाके में चीन द्वारा बसाये जा रहे नगर या कॉलोनी. इसके दूरगामी असर होंगे, पर भारतीय राजनीत में कहीं यह मुद्दा है? पक्ष या विपक्ष, कहीं किसी ने भारत के हित के सवाल पर राष्ट्रीय बहस शुरू की है? इससे ही जुड़ा है, ब्रह्मपुत्र का मामला. नदियों में नद माना जाता है, ब्रह्मपुत्र. अलग शान और सौंदर्य है, ब्रह्मपुत्र का. उस ब्रह्मपुत्र को तिब्बत के आसपास अनेक बांध बनाकर चीन बांध रहा है. चीन पहले से भी अपने जल संसाधन प्रबंधन मामले में अत्यंत गुपचुप काम करता रहा है. दुनिया से नजरें बचाकर. पर अपनी इच्छानुसार. विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन के इस कदम से भारत का उत्तर-पूर्व तबाह हो जाएगा. यह सवाल भी राजनीति में अचर्चित है. आज पूरा तिब्बत चीन के कब्जे में  है. तिब्बत के एक हिस्से से ब्रह्मपुत्र नद निकलता है, तो दूसरी तरफ़ से सिंधु नदी. ये दोनों नदियां भारतीय संस्कृति की प्राण हैं. चीन इन दोनों नदियों पर बड़े-बड़े बांध बनाकर उन्हें अपनी ओर मोड़ रहा है. कभी डॉ लोहिया ने तिब्बत और हिमालय बचाओ का नारा दिया था. आज हिमालय और इन नदियों की चिंता किसी दल को है? इसी तरह विदेशों में पड़ा भारत का काला धन है.

शायद ननी पालकीवाला ने कहा था, अगर मैं अपराधी होता, तो भारत में बसने की कोशिश करता. इस बयान का रहस्य क्या था? वह खुद दुनिया के जाने-माने कानूनविद थे. उनके कहने का आशय था कि भारत अपराधियों के लिए आरामगाह है. कानून कुछ कर नहीं पाता, इसलिए विदेशों में पड़े भारतीय धन को वापस लाने में भी अड़चनें बतायी जा रही रही हैं. हालांकि अमेरिका, जर्मनी या अन्य देश, बांह मरोड़ कर अपने धन को वापस मंगा चुके हैं. पर भारत में आज भी सपना है कि विदेशों में पड़ा भारतीय काला धन कभी मिलेगा या नहीं? आइआइएम बंगलुरू के प्रो आर वैद्यनाथन ने स्विटजरलैंड में पड़े भारतीय धन पर काफ़ी अध्ययन किया है. स्विस बैंक समेत दुनिया में 70 ऐसी जगहें है, जहां भारत का काला धन जमा है. एक अनुमान के अनुसार यह 10 लाख करोड़ के बराबर है. भारत की जीडीपी का 15 फ़ीसदी.

क्या ऐसे सवाल पर संसद बहस कर यह निर्णय नहीं ले सकती कि इस धन का राष्ट्रीयकरण हो? अमेरिका और जर्मनी की तरह हम भी इन 70 जगहों/संस्थाओं/देशों को बाध्य कर अपना धन वापस लायेंगें और यह राष्ट्रीय धन होगा. जैसे 70 के दशक में कोयला का राष्ट्रीयकरण हुआ था, उसी तरह भारतीयों के विदेशों में पड़े काले धन का राष्ट्रीयकरण हो. आज राजनीति में यह मांग और चर्चा कहां है?

सवाल चाहे पाकिस्तान के इशारे पर भारत में 26/11 करने का हो या चीन द्वारा भारत के हितों को प्रभावित करने की चाल हो या खुद भारत का अपने ही अंदरूनी लुटेरों (जिन्होंने भारतीय धन को विदेशों में रखा है)  के खिलाफ़ सक्रिय होने की जरूरत हो, ऐसे अनेक नाजुक सवालों पर भारत की सरकार या भारत की राजनीति के क्या रुख और जवाब हैं? कही इन सवालों पर कोई राष्ट्रीय बहस या समाधान की पहल है? क्या कोई देश अपने हितों से इस कदर अनजान रह सकता है? पर नेता जानते है कि ऐसे सवालों को हल करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे? पर इस झंझट में वे नहीं पड़ना चाहते. वे यह भी जानते हैं कि जनता की स्मृति में ऐसे सवाल नहीं रहते और न इनसे वोट मिलते हैं. इसलिए नेता, व्यवस्था और राजनीति ऐसे अनेक जरूरी सवालों पर जानबूझ कर चुप हैं. पर क्या जनता को भी चुप रहना चाहिए?

लेखक हरिवंश बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है और वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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