बड़े सवालों पर सब मौन

हरिवंश भारत में राजनीति या राजनीतिज्ञ, चैन से रहते हैं. कारण वे मानते हैं कि लोग, समाज या मतदाता भुलक्कड़ हैं. आज तूफ़ान उठा, कल सब शांत. इसलिए भ्रष्टाचार पर अण्णा का आंदोलन हो या कहीं किसी सवाल पर लोग बेचैन हों, राजनीतिज्ञों (खासतौर से सत्तारूढ़ पक्ष) की कोशिश होती है कि मामला सलटा लिया जाये. हां, अगर किसी पक्ष या दल को लगता है कि उसे ऐसे आंदोलन से गद्दी मिलने वाली है, तो वह चुप नहीं बैठता. पर जिन सवालों से राजनीतिक बिरादरी पर खतरा लगता है, उसे बुझाने में सब जुटते हैं. जो सवाल राष्ट्रहित में निर्णायक होते हैं, पर जिनसे तात्कालिक लाभ नहीं मिलनेवाला, उन पर भी सब मौन रहते हैं.

भ्रष्टाचारियों की कोई जाति नहीं होती

बिनय बिहारी सिंहहरिवंश जी का कामराज नाडार पर केंद्रित लेख श्रेष्ठतम लेखों में से एक है। हां, केंद्र सरकार भ्रष्ट मंत्रियों की सरकार के नाम से जानी जाती है। अजब बात यह कि राहुल गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं और उनके मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। आजादी के लगभग 25 साल बाद तक कांग्रेस ही केंद्र में सत्तारूढ़ रही। इसी दौरान देश पीछे होता गया। लालफीताशाही का नंगा नाच होता रहा। आम आदमी लगातार हाशिए की तरफ धकेला गया। आज हालत यह है कि अगर आप आम आदमी हैं तो आपकी कोई पूछ नहीं है। सत्ता का हर तंत्र आपको डराएगा, धमकाएगा। आप बेचारे बन कर रहिए। आप गंभीर रूप से बीमार हो गए तो अपने पैसे खर्च कर निजी चिकित्सक से इलाज कराइए। सरकार की आपके प्रति जवाबदेही नहीं है। सरकारी अस्पताल में जाएंगे तो दवा आपको अपने पैसे से खरीदनी पड़ेगी। दवाएं कितनी महंगी हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है।

नवधनाढ्यों की लूट और भोग संस्कृति का प्रतीक है आईपीएल

हरिवंशचरित्र खोता देश! : गांव के स्कूल में सुना. धोती-कुर्ता वाले मास्टर से. भावार्थ था. अगर जीवन में धन चला जाये, कोई चिंता नहीं. मान लो कुछ नहीं खोया. स्वास्थ्य गिरा, तो समझो नुकसान हुआ. पर चरित्र गिरा, तो समझो सब कुछ खत्म. उस अध्यापक की कही यह बात आज (24-4-10) याद आयी. कई खबरें पढ़ कर. यह कथन जैसे एक व्यक्ति पर लागू है, वैसे ही देश पर भी. पिछले कुछेक दिनों की घटनाएं प़ढ़ कर लगता है, इस मुल्क ने चरित्र लगभग खो दिया है. सार्वजनिक जीवन में, नैतिक मूल्य, आत्म नियंत्रण, शर्म, लोक-लाज की जगह ही नहीं बची. गौर करें, 24 अप्रैल के अखबारों में छपी कुछ खबरें :-